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Kalpesh Patel

Classics Thriller

4.5  

Kalpesh Patel

Classics Thriller

ज्योति बनी ज्वाला.

ज्योति बनी ज्वाला.

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ज्योति बनी ज्वाला.

 दो दुश्मनों का प्यार और एक अधूरी मोहब्बत, एक खौफनाक साज़िश, एक रहस्य...

मुंबई — रात के बारह बजे।

धुंध से ढकी मुंबई की पुरानी मिल-कॉलोनी में सन्नाटा पसरा था। कभी सैकड़ों मजदूरों की आवाजाही से गूंजने वाली ये गलियाँ अब खंडहरों, जंग लगे लोहे और टूटे हुए सपनों का कब्रिस्तान बन चुकी थीं।

उस रात वहाँ दो लोग मौजूद थे।

गोविंद और ज्योति।

दोनों के हाथों में बंदूकें थीं। दोनों की निगाहें एक-दूसरे पर टिकी थीं। और दोनों के दिलों में पाँच साल पुरानी नफरत आज भी जिंदा थी।

गोविंद भारतीय खुफिया विभाग का अंडरकवर अधिकारी था। ज्योति अंतरराष्ट्रीय अपराध सिंडिकेट की सबसे खतरनाक शूटर।

पाँच साल पहले एक गुप्त ऑपरेशन में गोविंद ने अपनी पूरी टीम खो दी थी। उस ऑपरेशन की आखिरी तस्वीर में ज्योति दिखाई दी थी—हाथ में बंदूक और चेहरे पर बेदर्दी।

उधर, ज्योति के भाई की मौत का जिम्मेदार गोविंद को बताया गया था। उसके पास भी एक तस्वीर थी, जिसमें गोविंद उसके भाई पर बंदूक ताने खड़ा था।

दोनों के पास अपने-अपने सच थे।

और दोनों का मकसद एक ही था—बदला।

## 1. मौत के निशाने पर

“आखिर मिल ही गईं तुम, ज्योति!”

गोविंद की आवाज़ में पाँच साल का गुस्सा जमा था।

ज्योति ने हल्की-सी मुस्कान के साथ अपनी बंदूक उठाई।

“तुम्हें लगता है, सिर्फ तुम मुझे ढूँढ़ रहे थे? मैं तो उस दिन से तुम्हारा इंतजार कर रही हूँ, जिस दिन मेरे भाई की लाश मिली थी।”

“तुम्हारी वजह से मेरे छह साथी मारे गए!”

“और तुम्हारी वजह से मेरा भाई!”

दोनों की उँगलियाँ ट्रिगर पर कस गईं।

अचानक बिजली चली गई।

चारों तरफ अँधेरा छा गया। उसी पल एक गोली चली। गोली दीवार से टकराई और धुंध में खो गई।

“गोविंद!” अँधेरे में ज्योति की आवाज़ गूँजी। “अगर मुझे मार दोगे, तो उस सच तक कभी नहीं पहुँच पाओगे, जिसने हम दोनों की जिंदगी बर्बाद की है।”

गोविंद ने अपनी टॉर्च जलाई।

ज्योति जमीन पर पड़ी थी। उसके हाथ में एक काली फाइल थी।

“ये क्या है?”

“तुम्हारी टीम की मौत का असली सच।”

गोविंद ने फाइल खोली। उसमें कुछ तस्वीरें, गुप्त संदेशों की प्रतियाँ और ऑपरेशन से जुड़ी रिपोर्टें थीं।

एक तस्वीर देखकर उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

उसमें उसकी टीम पर हमला करने वाला आदमी साफ दिखाई दे रहा था।

वह ज्योति नहीं थी।

वह कोई तीसरा आदमी था, जिसकी पहचान तस्वीर में छिपी हुई थी।

गोविंद ने दूसरी तस्वीर देखी। उसमें ज्योति के भाई के साथ वही आदमी खड़ा था।

“ये कौन है?” गोविंद ने पूछा।

ज्योति की आवाज़ पहली बार काँपी।

“यही वह आदमी है, जिसने हमें एक-दूसरे का दुश्मन बनाया।”

“नाम?”

ज्योति ने उसकी आँखों में देखा।

“विक्रम राणा।”

गोविंद के लिए यह नाम अनजान नहीं था। विक्रम राणा एक समय भारतीय खुफिया विभाग का वरिष्ठ अधिकारी था। पाँच साल पहले उसने अचानक इस्तीफा दे दिया था। उसके बाद वह अंतरराष्ट्रीय अपराध जगत में सक्रिय हो गया था।

गोविंद ने फाइल बंद कर दी।

“अगर ये सच है, तो मैं तुम्हें गिरफ्तार करूँगा।”

ज्योति ने अपनी बंदूक नीचे कर ली।

“पहले सच साबित कर लो। उसके बाद मुझे हथकड़ी पहना देना।”

वह मुड़ी और अँधेरे में आगे बढ़ गई।

गोविंद ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की।

उस रात पहली बार उसने अपने दुश्मन पर गोली नहीं चलाई।

## 2. दुश्मनी की राख में

अगले कुछ दिन दोनों ने एक-दूसरे से छिपते हुए नहीं, बल्कि एक-दूसरे के साथ मिलकर बिताए।

गोविंद के पास सरकारी खुफिया नेटवर्क की जानकारी थी। ज्योति के पास अपराध सिंडिकेट के भीतर की पहुँच। दोनों को मालूम था कि विक्रम तक पहुँचने के लिए उन्हें अपनी सबसे पुरानी दुश्मनी से आगे बढ़ना होगा।

लेकिन भरोसा इतनी आसानी से पैदा नहीं होता।

एक रात, दक्षिण मुंबई की एक पुरानी इमारत में छिपे हुए, गोविंद ने ज्योति से पूछा, “तुमने ये फाइल पहले मुझे क्यों नहीं दी?”

ज्योति कुछ देर खिड़की से बाहर देखती रही।

“क्योंकि मुझे भी यकीन नहीं था कि इसमें लिखा सच है या एक और जाल।”

“और अब?”

“अब भी पूरा यकीन नहीं है।”

गोविंद हँस पड़ा।

“कमाल है! हम एक-दूसरे पर भरोसा भी नहीं करते और एक-दूसरे की जान भी बचा रहे हैं।”

“भरोसा करने के लिए तुम्हारे पास क्या है, गोविंद? एक सरकारी पहचान, जो तुम्हें दुनिया से झूठ बोलने की इजाजत देती है? या वो अतीत, जिसे तुम हर रात भूलने की कोशिश करते हो?”

गोविंद की मुस्कान गायब हो गई।

“मेरे साथी मारे गए थे। मैं उन्हें बचा नहीं सका।”

ज्योति ने पहली बार उसे गौर से देखा। उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं, थकान थी।

“मेरे भाई की मौत के बाद मैं भी हर रात यही सोचती थी कि काश, उस दिन मैं उसे रोक लेती।”

दोनों के बीच कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।

वे दोनों अलग-अलग रास्तों पर चलने वाले ऐसे इंसान थे, जिनके जख्म एक जैसे थे।

और शायद यही उनकी दुश्मनी की सबसे बड़ी विडंबना थी।

## 3. एक अनचाहा एहसास

विक्रम के एक गुप्त ठिकाने का पता लगाने के दौरान दोनों एक पुराने गोदाम में फँस गए।

बाहर विक्रम के आदमी मौजूद थे। निकलने का रास्ता बंद था। मोबाइल सिग्नल गायब था और रात गहराती जा रही थी।

ज्योति के हाथ पर गोली की खरोंच थी। गोविंद ने अपनी जेब से रूमाल निकालकर उसके घाव पर बाँध दिया।

“तुम्हें मेरी चिंता करने की जरूरत नहीं,” ज्योति ने कहा।

“मुझे तुम्हारी चिंता नहीं है। मुझे बस अपने मिशन की चिंता है।”

ज्योति मुस्कुराई।

“झूठ बोलते वक्त तुम्हारी आँखें तुम्हारा साथ नहीं देतीं।”

गोविंद ने जवाब नहीं दिया।

कुछ देर बाद ज्योति ने पूछा, “अगर पाँच साल पहले हमें सच पता चल जाता, तो क्या हम दुश्मन नहीं बनते?”

गोविंद ने दीवार से पीठ टिकाई।

“शायद नहीं।”

“और अगर हम उस दिन मिले ही नहीं होते?”

“तो शायद हम दोनों आज भी किसी और की कहानी में खलनायक होते।”

ज्योति की आँखें नम हो गईं। उसने तुरंत चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया।

गोविंद ने पहली बार उसके भीतर छिपे दर्द को महसूस किया। वह औरत, जिसे उसने हमेशा एक बेरहम शूटर समझा था, अपने अतीत की कैदी थी।

उस रात गोविंद ने उसका हाथ थाम लिया।

ज्योति ने हाथ नहीं खींचा।

बाहर गोलियों की आवाजें गूँज रही थीं, मगर उन दोनों के बीच एक अजीब-सी शांति उतर आई थी।

“अगर हम यहाँ से जिंदा निकले,” ज्योति ने धीमे से कहा, “तो क्या तुम मुझे फिर से अपना दुश्मन मानोगे?”

गोविंद ने उसकी तरफ देखा।

“मैं नहीं जानता कि कल क्या होगा। लेकिन आज मैं तुम्हें मरने नहीं दूँगा।”

ज्योति की आँखों में पहली बार नफरत के अलावा कोई और एहसास दिखाई दिया।

मोहब्बत शायद इसी तरह जन्म लेती है—बिना किसी वादे के, बिना किसी इजहार के, सिर्फ उस पल में जब किसी की जिंदगी अपनी जिंदगी से ज्यादा जरूरी लगने लगे।

## 4. असली शिकारी

दोनों ने आखिरकार विक्रम राणा का ठिकाना ढूँढ़ निकाला।

वह मुंबई के बाहरी इलाके में स्थित एक बंद पड़ी मिल के परिसर में छिपा था। वहाँ से अंतरराष्ट्रीय अपराध सिंडिकेट के लिए गुप्त लेन-देन और हथियारों की तस्करी का नेटवर्क चलाया जा रहा था।

गोविंद ने विभाग को सूचना भेजने की कोशिश की, लेकिन उसे जल्द ही पता चल गया कि उसके पुराने संपर्कों में भी कोई विक्रम के लिए काम कर रहा था।

विक्रम को उनके आने की खबर पहले ही मिल चुकी थी।

जब गोविंद और ज्योति मिल के भीतर पहुँचे, तो चारों तरफ लगे स्पीकरों से विक्रम की आवाज़ गूँजी।

“स्वागत है, गोविंद! और तुम्हारा भी, ज्योति। मुझे खुशी है कि आखिरकार तुम दोनों ने एक-दूसरे को मारने के बजाय मेरी तलाश करना सीख लिया।”

गोविंद ने बंदूक उठाई।

“खेल खत्म हो चुका है, विक्रम!”

“खेल?” विक्रम हँसा। “तुम दोनों मेरी सबसे कामयाब चाल थे। मैंने तुम्हें अलग-अलग झूठ दिखाए, तुम्हारे गुस्से को हवा दी और तुम दोनों ने मेरे लिए एक-दूसरे को खत्म करने की तैयारी कर ली।”

ज्योति की आँखों में आग उतर आई।

“मेरे भाई को क्यों मरवाया?”

“क्योंकि वह मेरे रास्ते में आ रहा था। और तुम्हारे साथी, गोविंद? उन्हें भी रास्ते से हटाना जरूरी था। तुम्हारी टीम ने मेरे नेटवर्क के बारे में जान लिया था।”

गोविंद की मुट्ठियाँ कस गईं।

“तुमने अपने ही विभाग से गद्दारी की!”

“मैंने सिर्फ ताकतवर बनने का रास्ता चुना। तुम लोग वफादारी के नाम पर अपनी जिंदगी बर्बाद करते रहे।”

अचानक ऊपर की छत पर रोशनी जल उठी।

विक्रम वहाँ खड़ा था। उसके दोनों ओर हथियारबंद आदमी थे।

“अब तुम दोनों की कहानी खत्म होती है।”

गोलियों की बौछार शुरू हो गई।

गोविंद और ज्योति ने एक-दूसरे की ढाल बनकर मुकाबला किया। वे अब दो दुश्मन नहीं थे। वे दो ऐसे लोग थे, जिन्हें आखिरकार पता चल गया था कि असली दुश्मन कौन है।

गोविंद ने एक हमलावर को निहत्था किया, जबकि ज्योति ने दूसरे को आगे बढ़ने से रोक दिया।

कुछ ही मिनटों में गोदाम धुएँ और चीखों से भर गया।

विक्रम पीछे हटते हुए छत के दूसरे हिस्से की ओर भागा।

ज्योति उसके पीछे दौड़ी।

“ज्योति, रुको!” गोविंद चिल्लाया।

लेकिन वह नहीं रुकी।

छत के किनारे विक्रम ने अपनी बंदूक उठाई। दोनों के बीच कुछ ही कदमों का फासला था।

“तुम अपने भाई का बदला लेने आई हो?” विक्रम ने व्यंग्य से पूछा।

ज्योति ने बंदूक तान दी।

“नहीं। मैं उस झूठ का अंत करने आई हूँ, जिसने मेरी जिंदगी छीन ली।”

विक्रम ने गोली चलाई।

ज्योति झुक गई। उसकी जवाबी गोली विक्रम के कंधे में लगी। वह लड़खड़ाकर जमीन पर गिर पड़ा।

लेकिन गिरते हुए उसने एक आखिरी गोली चला दी।

गोविंद, जो ज्योति तक पहुँचने की कोशिश कर रहा था, उस गोली की चपेट में आ गया।

गोली उसके सीने में लगी।

“गोविंद!”

ज्योति दौड़कर उसके पास पहुँची। उसने उसे अपनी बाँहों में थाम लिया।

गोविंद की साँसें भारी हो रही थीं।

“तुम... ठीक हो?” उसने मुश्किल से पूछा।

ज्योति की आँखों से आँसू बहने लगे।

“तुम्हें अपनी जान की पड़ी है और पूछ मुझसे रहे हो?”

गोविंद हल्का-सा मुस्कुराया।

“आदत है... दूसरों को बचाने की।”

ज्योति ने उसका हाथ अपने दोनों हाथों में पकड़ लिया।

“तुम मेरे दुश्मन नहीं थे, गोविंद। कभी नहीं। हम दोनों को दुश्मन बनाया गया था।”

गोविंद ने उसकी आँखों में देखा।

“और तुम... मेरी कमजोरी बन गई हो।”

“ऐसा मत कहो।”

“क्यों? एक खुफिया अधिकारी को भी किसी से प्यार करने का हक नहीं है क्या?”

ज्योति रोते हुए मुस्कुराई।

“है। लेकिन उसे खोने का हक नहीं है।”

गोविंद कुछ कहना चाहता था, मगर उसकी आँखें बंद होने लगीं।

दूर से पुलिस के सायरन सुनाई देने लगे।

ज्योति ने उसके माथे को चूमा।

“तुम्हें कुछ नहीं होगा। सुन रहे हो? मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगी।”

गोविंद की उँगलियों ने उसकी हथेली को आखिरी बार दबाया।

फिर उसका हाथ ढीला पड़ गया।

“गोविंद!”

उसकी चीख सुनसान मिल की दीवारों से टकराकर लौट आई।

## 5. वह औरत जो गायब हो गई

गोविंद की आँखें अस्पताल में खुलीं।

सफेद छत, मशीनों की आवाजें और सीने में उठता दर्द—उसे धीरे-धीरे याद आया कि वह कहाँ है।

पास खड़े डॉक्टर ने कहा, “आप खतरे से बाहर हैं। गोली दिल से कुछ दूरी पर लगी थी। आपकी किस्मत अच्छी थी।”

गोविंद ने पहला सवाल पूछा, “ज्योति कहाँ है?”

डॉक्टर ने जवाब नहीं दिया।

कुछ देर बाद कमिश्नर राठौड़ कमरे में आए।

“विक्रम राणा गिरफ्तार हो चुका है। उसके नेटवर्क के कई लोग पकड़े गए हैं। तुम्हारी रिपोर्ट ने बहुत बड़ा मामला खोल दिया है।”

“मैंने ज्योति के बारे में पूछा है।”

कमिश्नर कुछ पल चुप रहे।

“जब हमारी टीम मिल पहुँची, तब तक वह वहाँ से जा चुकी थी। हमने आसपास तलाश की, लेकिन उसका कोई सुराग नहीं मिला।”

“उसने मुझे छोड़ दिया?”

कमिश्नर ने गंभीर स्वर में कहा, “शायद वह तुम्हें बचाना चाहती थी। या शायद उसे लगा कि उसके अतीत की वजह से तुम्हारी जिंदगी फिर खतरे में पड़ सकती है।”

गोविंद ने खिड़की की ओर देखा।

जिस औरत को पकड़ने के लिए उसने पाँच साल बिता दिए थे, उसी औरत को अब वह अपनी जिंदगी में वापस चाहता था।

लेकिन ज्योति जा चुकी थी।

कम से कम दुनिया को यही लगता था।

तीन महीने बीत गए।

गोविंद फिर से अपनी ड्यूटी पर लौट आया। विक्रम राणा के खिलाफ मुकदमा चल रहा था। अपराध सिंडिकेट का नेटवर्क टूट चुका था। विभाग में गोविंद की बहादुरी की चर्चा थी।

लेकिन हर रात, जब वह अपनी मेज पर अकेला बैठता, उसकी नजर उस छोटी-सी चीज पर टिक जाती जो अस्पताल से लौटते समय उसके सामान में मिली थी।

एक चाँदी की अंगूठी।

ज्योति की अंगूठी।

उसके साथ एक कागज का छोटा-सा टुकड़ा था, जिस पर सिर्फ एक पंक्ति लिखी थी—

**“कुछ लोग जिंदगी में रहने के लिए नहीं, जिंदगी बदलने के लिए आते हैं। मुझे भूलने की कोशिश मत करना... लेकिन मेरा इंतजार भी मत करना।”**

नीचे कोई नाम नहीं था।

गोविंद ने उस कागज को कई बार पढ़ा।

वह समझ नहीं पाया कि यह विदाई थी या किसी अनकहे वादे की शुरुआत।

## 6. आखिरी संदेश

एक रात गोविंद अपने कार्यालय में बैठा था। बाहर बारिश हो रही थी। अचानक उसके सुरक्षित कंप्यूटर पर एक नया संदेश आया।

कोई प्रेषक नहीं।

कोई पता नहीं।

सिर्फ एक तस्वीर।

तस्वीर में समुद्र किनारे बनी एक पुरानी इमारत थी। सामने खड़ी एक औरत ने अपना चेहरा कैमरे से दूसरी तरफ कर रखा था।

उसकी कलाई पर वही चाँदी का कंगन था, जिसे गोविंद पहचानता था।

तस्वीर के नीचे एक संदेश लिखा था—

**“मिशन खत्म हुआ है, गोविंद। कहानी नहीं।”**

गोविंद की साँस थम गई।

उसने तुरंत संदेश का स्रोत खोजने की कोशिश की, लेकिन कुछ ही सेकंड में पूरा डेटा मिट गया।

स्क्रीन पर सिर्फ एक अंक बचा था—

**2**

गोविंद कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।

क्या यह किसी नए मिशन का संकेत था? क्या ज्योति किसी नए खतरे में थी? या वह उसे अपने पीछे आने से रोकने के लिए कोई पहेली छोड़ गई थी?

उसने खिड़की से बाहर देखा। बारिश के पार मुंबई की रोशनियाँ धुंधली दिखाई दे रही थीं।

उसके होंठों पर एक हल्की मुस्कान आई।

“तुम जहाँ भी हो, ज्योति... इस बार मैं तुम्हें ढूँढ़ने आऊँगा।”

लेकिन उसे यह नहीं मालूम था कि उसी रात शहर के दूसरे छोर पर, एक अँधेरे कमरे में, ज्योति भी उसी तस्वीर को देख रही थी।

उसकी मेज पर गोविंद की एक तस्वीर रखी थी।

उसने तस्वीर को धीरे से छुआ और फुसफुसाई—

“माफ करना, गोविंद। अगर तुम मेरे करीब रहे, तो वे तुम्हें फिर निशाना बनाएँगे।”

उसने मेज की बत्ती बुझा दी।

अँधेरे में उसका फोन एक बार चमका।

एक नया संदेश आया था—

**“लक्ष्य नंबर दो सक्रिय है। अगला आदेश शीघ्र मिलेगा।”**

ज्योति का चेहरा सख्त हो गया।

उसने बंदूक उठाई।

गोविंद को बचाने के लिए उसने उससे दूरी बनाई थी। लेकिन अब कोई ऐसी साजिश शुरू हो चुकी थी, जो उन दोनों को फिर एक ही रास्ते पर ला सकती थी।

और इस बार दुश्मन कौन था—यह जानने के लिए उन्हें सिर्फ अपनी बंदूकें नहीं, अपने दिल भी दाँव पर लगाने पड़ने वाले थे।

कहानी खत्म नहीं हुई थी।

क्योंकि कुछ मोहब्बतें मिलन से नहीं, इंतजार से जिंदा रहती हैं।


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