Amit Tiwari

Abstract Tragedy


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Amit Tiwari

Abstract Tragedy


चप्पल

चप्पल

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चमकी अपनीं माँ का हाथ थामे पीछे पीछे चली जा रही थी लोग उसे देखकर हँस भी रहे थे लेकिन उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था की क्यों हंस रहे थे। एक ऊँगली को दाँतों के बीच दबाने की कोशिश और कभी मुंडी ऊपर करके सबको निहार लेती तो कभी नीचे मुंडी गड़ा लेती थोड़ी लजा रही थी शायद तभी किसी ने चमकी की माँ से पूछा अरे ये चमकी इतने बड़े बड़े चप्पल पहनकर क्यों जा रही है और वो भी दोनों पैर के अलग अलग, बाबू जी जो घर में जो मिला वो पहन कर चली आयी ये, इसको ध्यान नहीं रहता की किसका चप्पल पहनना है और किसका नहीं पहनना। बाबूजी भी मुंडी हिलाकर मुस्काये और भीतर चले गए।

चमकी की माँ को देर हो रही थी उसे आज मैनेजर साहब के घर जल्दी जाना था मेहमान आने वाले थे कल शाम को ही फोन करके मेम साहब ने बता दिया था लेकिन एक तो चमकी जो बहुत छोटी थी उसको भी साथ लाना पड़ा क्यूंकी घर में देखने वाला नहीं था ये तो रोज सुबह ही काम खोजने निकल जाते हैं। चमकी को अभी अकेले रहने की समझ कहाँ थी हो जाएगी तीन चार साल में तब जाकर छुट्टी मिलेगी और ऊपर से इसने किसका किसका तो चप्पल लटका रखा है, लेकिन और करे भी तो क्या करे इसके पास खुद का तो है नहीं इसी महीने दिलाने वाली थी की इनकी मजदूरी भी बंद हो गयी,काम तो बंद हो गया फैक्ट्री का मालिक बोलता है अभी कुछ वक़्त और लगेगा काम चालू होने में और जो पहले की मजदूरी का पैसा था उसमें से भी कुछ पैसा रोक के रखा है कहता है पैसे ख़तम हो गए काम दुबारा चालू होगा तो पूरा पैसा मिल जाएगा।

लेकिन ये पेट तो नहीं जानता की पैसा कब मिलेगा कब नहीं रोज खाना मांगता है और तीन जगह से घर का काम भी छूट गया है डर सताता रहता है की कहीं जिन घरों से काम मिला है वो भी न छूट जाए।

यह सोचते सोचते चमकी की माँ मैनेजर साहब के घर पहुँच गयी और झट से चमकी को सीढ़ियों पर बैठाकर काम में जुट गयी। चमकी सीढ़ी की दीवार से लगकर बैठ गयी, जैसे की उसे पता हो कि क्या करना है| तभी मैनेजर साहब का बेटा अपनीं खेलने वाली ऑटोमैटिक गन लेकर आया और इधर उधर चलाने लगा उसने चमकी की तरफ एक नज़र देखा फिर अपनीं गन लेकर बाहर चला गया जैसे उसे पता हो की चमकी यहाँ क्यों बैठती है।

चमकी अपनीं पलकें झपकाते हुए उसको देखती है और दूसरी नज़र उसकी ऑटोमैटिक गन पर पड़ती है उसे थोड़ी देर देखती है लेकिन एकदम शांत बैठी रहती है की जैसे उसकी आँखें भी कुछ नहीं कहना चाहती बस एक दम चुप और तभी चमकी की माँ आ जाती है चमकी सीढ़ियों से दो बार घिसटती है और खड़ी हो जाती है और अपनीं माँ का हाथ पकड़ कर फिर वही बड़े बड़े चप्पल पैर में डालती है और पीछे पीछे चल देती है जो भी उसे देखता है वो मुस्कुराता है उसकी बचपने की मासूमियत लोगों को लुभाती है लेकिन चमकी के लिए तो वो चप्पल थें बस क्यूंकि उसके पास अपने चप्पल नहीं थे।

चमकी घर पहुंच जाती है रोज वो अपनीं माँ के साथ सुबह शाम ऐसे ही जाती है घरों में जहाँ उसकी माँ काम करती है, रोज वो नयी नयी चीजें देखती है और वापस घर आ जाती है लेकिन आज तक उसने उन चीजों में से किसी भी चीज के लिए जिद नहीं किया जैसे उसे पता हो की उसे क्या नहीं मांगना। इतनी छोटी उम्र में भी इतना सबकुछ कैसे जानती है चमकी ?          


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