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Amit Tiwari

Inspirational Children


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Amit Tiwari

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नीलकण्ठ की उड़ान

नीलकण्ठ की उड़ान

3 mins 320 3 mins 320

क्या होगा अगर उड़ान थोड़ी ऊँची भरी जाए, आसमान की ऊँचाइयों को और नापा जाये हमारी उड़ान कितनीं छोटी और नीची रहती है बहुत देर से नीलकंठ यही सोच रहा था तभी नीला नाम का एक दूसरा कबूतर फड़फड़ाते हुए उसी डाल पर जहाँ नीलकंठ बैठा था आकर नीलकंठ के पास बैठ गया और पूछने लगा क्या सोच रहे हो नीलकंठ भाई खोये खोये से लग रहे हो । 

नीलकंठ ने नीला को देखते हुए कहले लगा की नीला भाई मैं यही सोच रहा था की हम कितनी कम ऊँचाई तक ही उड़ पाते हैं क्या हो अगर और ऊपर तक जा पाएं और वहां बहती ऊपर की हवा का सामना करें वहां से नीचे देखें कैसा अनुभव होगा ना ।यह बात सुनकर नीला बोल पड़ता है अरे दिमाग तो ठिकाने पर है तुम्हारा जहाँ तक उड़ पाते हो वहीँ तक उड़ो ज्यादा ऊपर उड़ोगे तो पंख जल जाएंगे और फिर किसी काम के नहीं रहोगे फिर वहाँ की हवा का दबाव हम न सह पाएं तो सीधे नीचे ही गिर जायेंगे इसलिए मैं कहता हूँ ज्यादा बड़े सपनें नहीं देखने चाहिए जितना उड़ पाते हो उतना उड़ो अपना काम साधो और आराम करो ।

नीलकंठ को यह बात हजम नहीं हुई और आसमान की तरफ ताकता रहा की जैसे कोई गहरा नाता हो उसका उसके उड़ने और आकाश से लेकिन कुछ समझ भी नहीं आ रहा था की क्या करे? डर भी लग रहा था और तभी उसने अपने पंख को जोर से फड़फड़ाया और उड़ गया आकाश की तरफ ऊपर और ऊपर उठता रहा डर तो लग रहा था लेकिन ठान रखा था की जितने ऊपर उड़ते हैं उससे दो या तीन गुना ऊपर जाकर रहेंगे और उड़ते उड़ते अपनी उड़ने की सामान्य ऊंचाई को पार कर गया लेकिन नीलकंठ को अभी और ऊपर जाना था सो ऊपर उठता गया।

ऊपर अब तक वह बहुत ऊपर आ चुका था पंखो में सूरज की धूप तेज लग रही थी शरीर थक कर जवाब देने लगा था लेकिन जब उसने नीचे देखा तो उसकी आँखे चमक उठी ऐसा नजारा उसने कभी नहीं देखा था अपने पूरे जीवन में और शायद कभी देख भी नहीं पाता अगर आज इतने ऊपर नहीं आता वो देखता है जो नदी थोड़ी दूर जाकर ख़त्म हुई दिखती थी वो कितनी दूर तक डोर की तरह खींची जा रही है जिस पहाड़ को दिवार समझता था की इसके आगे नहीं जाना है वो पहाड़ कितने छोटे दिखते है उसके पार भी वैसा ही आसमान है जैसा इस पार, उधर भी उतनी ही हरियाली जमीन है जितनी की इधर लेकिन कभी वहां जाने की कोशिश ही नहीं की कितने छोटे में सिमट कर रह गयी थी दुनिया इतना सोचते सोचते उसे एहसास हुआ की वह अब थकने लगा है और फिर नीचे की तरफ का रुख कर लिया और थोड़ी ही देर में फिर नीला के बगल उसी डाल पर आकर बैठ गया।

उसको देखते ही नीला ने पूछा अरे नीलकंठ भाई तुम तो सच में ऊँचे आसमान का गोता लगा आये ठीक तो हो ।नीलकंठ ने कुछ जवाब नहीं दिया बस उसकी तरफ देखा इस बार नीलकंठ के चेहरे पर एक अलग ही आभा थी आँखों में अद्वितीय चमक ऐसे जैसे सबकुछ बदल गया हो दुनिया नयी सी लग रही हो नीला नीलकंठ की तरफ देखकर थोड़ा झेंपा जरूर लेकिन उसका यह बदलाव देखकर रहा न गया और पूछा अच्छा बताओ कैसा लगता है उस ऊंचाई तक जाकर? लेकिन अब तक नीलकंठ की थकान ख़त्म हो गयी थी उसने एक ऊँची छलांग लगायी आसमान की तरफ और जोर से चिल्लाते हुए कहा नीला भाई चलोगे पता करने की वहां जाकर कैसा लगता है? और यह कहते कहते नीलकंठ आसमान की ऊँचाइयों में खो गया।    


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