चिट्ठी का सच
चिट्ठी का सच
ये कहानी उस समय की है जब मोबाइल चलन में नहीं था। समझिये 70 के दशक की है।
वसुधा एक पढ़ी-लिखी और शान्त प्रकृति की लड़की थी। उसकी शादी विवेक से हुयी
थी।विवेक बहुत ही योग्य और प्रतिभासंपन्न थे। 4 भाई 2 बहनों में सबसे छोटे।उसके पिता गांव के प्रतिष्ठित व्यक्तियों में से थे वे अभी भी। सभी भाई-बहनों की शादी हो चुकी थी बाल-बच्चे वाले थे। नौकरी के चलते शहरों में रह रहे थे पर होली दीवाली रक्षाबन्धन में सब गांव में आकर मनाते आपस में बहुत ही स्नेह और प्यार था।
हां उनके माता-पिता बहुत ही अनुशासन प्रिय सख्त थे पर अंदर से नरमदिल। उनके यहां उल्टी परिपाटी थी किसी गल्ती के लिए बेटे-बेटियों को डांट पड़ती बहुएं अपने आप सतर्क हो जातीं। सास अभी भी सुबह उठकर हलवाहे के साथ में अपने सामने गाय भैंस के काम करातीं। शादी के बाद 1 हफ्ते बाद वसुधा भी मायके लौट आई सबके साथ बहुत अच्छा लगा।
दुबारा विदा का मुहूर्त शुक्रास्त के कारण 2 माह के बाद बना था। माता-पिता की छोटी संतान होने के कारण विवेक को कुछ अधिक ही लगा होता विवेक ने सोचा वसुधा को बाद में तो फिर शहर में ही रहना है अच्छा हो कुछ दिन मां के साथ रह लेगी इसलिए उन्होंने अपनी भी छुट्टी 15 दिन की ले ली वसुधा को एक महीने गांव में रहना
था।
वसुधा के मायके से आते ही विवेक भी आ गए पर यह क्या वसुधा तो शहर की पली-बढ़ी देर रात तक फोन में बिजी रहना सुबह लेट उठने की दिनचर्या सास को न भाती। उन्होंने सीधे तो कुछ न कहा पर विवेक ने कह दिया।
विवेक ने कहा," वसुधा यह ठीक नहीं लगता मां इस उम्र में भी जल्दी उठ जाती हैं कह बात अधूरी छोड़ दी।
वसुधा बोली ," तो क्या मैं भी सुबह से उठ जाऊं मां को तो नींद नहीं आती। रसोई में भी बिना नहाए घुसने की अनुमति नहीं थी। उसे ये सब बन्धन लगते। नियम कोई ऐसे कठिन भी नहीं थे जिनके पालन करने में कोई कठिनाई थी बस यह था कि वसुधा मन बना कर ही चली थी कि गांव वाले गंवई, लकीर के फकीर होते हैं
जबकि वसुधा स्वभाव से भी अच्छी थी उसके पिता भी यह बात समझते थे। एक दिन वसुधा ने एक पत्र लिखा ,
"आदरणीय पापा जी मैं यहां पर बिल्कुल नहीं रह सकती यह कैसा घर है मुझे बिल्कुल नहीं अच्छा लगता ना यहां पर कोई चीज की छूट है न स्वतंत्रता। रसोई में नहा कर घुसना बड़ों के सामने हंसना भी नहीं कैसा घर है ?हर काम में पाबंदी आप मुझे तुरंत ले जाइए ,एक संक्षिप्त सा पत्र लिफाफा में डाल, पिता का पता लिख विवेक को दे दिया ,वे गांव के डाकघर में डाल आये।
डाकघर से पत्र 1 हफ्ते में 1 बार मुख्य डाकघर का डाकिया लेने आता था सोमवार को। पत्र मंगल को पोस्ट हुआ था अब तो पूरे 7 दिन बाद निकलेगा। कुल मिलाकर 15 दिन तो लग ही जायेंगे।
धीरे-धीरे वसुधा को घर अपना सा लगने लगा।एक दिन वह सासू मां के पास पूजा घर में बैठी तो उसने देखा वे संस्कृत की किताबें पढ़ रही थीं। उनकी दिनचर्या एक गृहिणी की होते हुए भी बहुत सधी हुयी थी। एक शाम चार बजे उसने देखा गांव की बहुत सी लड़कियाँ बैठक में आकर बैठी हैं। तब उसे विवेक ने बताया मां निःशुल्क 10व12वीं की लड़कियों की अंग्रेजी की कक्षा लेती हैं उसे ये जानकर आश्चर्य हुआ मां जी इलाहाबाद विश्वविद्यालय की पोस्ट ग्रेजुएट हैं। मात्र बाबू जी के कारण उन्होंने इण्टर कालेज की नौकरी छोड़ दी थी।
उनके जाते मां की प्रौढ़ शिक्षा कक्षा के विद्यार्थी आ गये। हफ्ते में 2 दिन ये कक्षा बन्द रहती तो सिलाई-कढ़ाई की कक्षा होती। अब विवेक के जाने का दिन आ गया।वसुधा दुखी तो थी पर सास के साथ रहने का कुछ समय मिलेगा खुश थी।
वसुधा के पापा जी ने पत्र पढ़ उसकी मां को दे दिया। वे बहुत ही चिन्तित हो गयीं। उनका मन पहले भी गांव में शादी करने का नहीं था। अब तो उन्होंने वसुधा के पापा को तुरन्त निकलने को कहा। वह भी चिन्तित थे साथ में वसुधा के छोटे भाई व ड्राइवर के साथ अपनी गाड़ी से निकल लिए। 10-12 घंटे के सफर के बाद उसके पापा जी उनके घर पहुंच गये।
नौकर ने बताया बहू जी काकी जी के साथ खेत पर गयीं हैं। अब तो वे और परेशान थे ,उन्हें लगा कहीं विवेक की मां खेत खलिहान के काम तो नहीं कराने ले गयीं। नौकर को साथ बैठा वे सीधे खेत को निकल गये। जाकर देखा सास-बहू मजे से हंस-हंस बात करते, धूप सेंकते हुए अपने बागान के अमरूद खा रही थीं।
वे दूर से वसुधा को देख रहे थे उसके चेहरे पर कहीं कोई परेशानी नहीं दिख रही थी। आगे बढ़कर उन्होंने समधन जी की पैरी-पैरा की। वसुधा ने ही पूछ लिया ,बाबू जी आप और सुबोध अचानक।
वे बात बनाते हुए बोले, हां बेटा पास के शहर में कुछ ऑफिशियल काम था सोचा 1 घंटे का रास्ता है तुम्हें सरप्राइज दे दूं। शायद इन 20 दिनों में वसुधा दुख और गुस्सा में लिखे पत्र को भूल चुकी थी।
घर आकर वसुधा व उसकी सास ने मिलकर खाना बनाया ससुर जी किसी काम से बाहर गये थे ,रात में वे भी आ गये दोनों ने साथ बैठकर खाया। कमरे में वसुधा दूध देने को आई तो बस अम्मा जी ऐसी हैं, बाबू जी बहुत ही अच्छे हैं। हम दोनों सास-बहू खूब मजे करते हैं। बाबू जी मां जी कैसी हैं उन्हें भी ले आये होते।
अब बाबू जी चिट्ठी का सच बताकर वसुधा को दुखी नहीं करना चाहते थे कि वे पत्र मिलते ही मां के कहने से चले आये उसे तो 1-1 दिन भारी पड़ रहा होगा।
उन्होंने कहा ,"बेटा !! उनको तो 2 दिन को बोलकर आया था। यहां आने का पता भी नहीं है 1 दिन लेट हो जायेगा ,मैं कल ही निकल लूंगा।
"बाबू जी 1 दिन रुककर जाइये"।
"बेटा फिर कभी, तुम्हारी मां जी परेशान होंगी।"
मित्रों चिट्ठी का यही मीठा सच है। आज ससुराल जाते ही बिटिया ने फोन पर शिकायत की माता-पिता ने सवाल-जवाब शुरू कर दिए। ये भी नहीं सोचते हर घर के उसूल होते हैं समझने में समय लगता है बस बेटी को समझाने की बजाय हां में हां मिला शह देते हैं तुम चिन्ता न करो हम देख लेंगे। रिश्ता पनपने से पहले कटुता से भर जाता
है।
आज की लड़कियों की आदतें बड़ी उम्र में शादी होने से परिपक्व हो चुकी होती हैं सामंजस्य करना ही नहीं चाहतीं बस सामने वाले को ढालना चाहतीं हैं।
पहले जबतक पत्र पहुंचता माता-पिता के ऐक्शन लेने तक वह बात ही निकल चुकी होती। यही सबसे सुखद सच था चिट्ठी का।
