चिथड़े
चिथड़े
आगे-आगे एक वृद्ध महिला और पीछे-पीछे उनका बेटा वरूण पुकारता जा रहा था, रुको माँ, रुको, पर माँ की आंँखें उस चिथड़े पर गड़ी थी जो हवा से उड़ रहा था।और जब चिथड़ा हाथ में आ गया तो वे उसे सहलाती हुई बेटे के साथ घर की ओर चल दीं।
मैं थोडे़ दिन पहले ही वरुण जी की पड़ोसन बनी थी। मेरे पति और वरुण जी एक साथ ही काम करते थे। मैं अक्सर उनकी माँ को चिथड़े लिए देखती थी पर इसके पीछे का कारण नहीं जानती थी। चिथड़ों से उन्हें प्यार जरुर था पर वे हरदम टीप-टाप रहती थीं।
जिस दिन की यह घटना थी मैं उनके घर किसी काम से गयी थी। उनकी बहू ने हैरान-परेशान दरवाजा खोला मेरे पूछने पर रुआँसी हो गईं। तब तक उनके पति माँ के साथ घर आ गये। माँ चिथड़े को सहलाती अपने कमरे में चली गईं। उनकी पत्नी चाय बना कर ले आयीं। मेरे पूछने पर वरुण जी ने बताया, उनकी पाँच साल की एक प्यारी सी बहन थी अन्नू सबकी जान। एक दिन खेलने निकली तो लौटी नहीं।
बहुत खोज-बीन के बाद अगले दिन उसकी लाश रेलवे ट्रैक पर मिली। नराधमों ने उस नन्हीं सी जान के साथ भरपूर खिलवाड़ किया था और उसके चिथड़े-चिथड़े कर रेलवे ट्रैक पर फ़ेंक दिया था। पापा इसी ग़म में चल बसे और माँ तबसे चिथड़े बटोरने लगीं। हरदम दरवाज़ा बंद रखता हूँ पर आज बच्चों की गलती से खुला रह गया और ये बाहर निकल गयीं।
बहू ने कहा, न जाने माँ को क्या मिलता है।
तभी एक जोरदार आवाज आयी, क्या मिलता है ? फिर मेरी ओर मुड़ कर कहने लगीं, आप समझा दो इन्हें अरे मैं चिथड़े नहीं अपनी बिटिया को बटोरती हूंँ। न जाने कितने चिथड़े उसके हुए होंगे। मैं उन्हें बटोरती हूँ, सहलाती हूँ, प्यार करती हूँ और अपनी नन्हीं सी बेटी को दिलासा देती हूँ क्या गलत करती हूँ ? और रोते हुए कमरे में चली गईं। मैं विमुढ सी उन नराधमों पर लानत भेजती हुई घर आ गई।
