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Gairo

Action Fantasy Thriller


3  

Gairo

Action Fantasy Thriller


छूटन

छूटन

25 mins 257 25 mins 257

 

सुबह के डेढ बजे थे, या कहें कि रात के । उसके लिए तो रात ही थी, और इसी रात मे उठी थी एक अधूरी तलब जिसने ग को भयानक सपने से भरी एक विचलित निंद्रा से जगा दिया था । उसे इस लत का आभारी होना चाहिए था, जिसने उसे एक विषैली नींद से जगा दिया था, परन्तु वह नहीं था।ऐसी क्या वस्तु हो सकती थी जो उसे तलब के मारे किसी नींद से जगा सकती थी? ये सोचकर उसने इसके कारणों पे, अर्ध निंद्रा की अवस्था में, मथना शुरू किया?

 

बीड़ी? सिग्रेट? किंतु धुम्रपान और शराब को तो वो सात साल पहेले ही छोड़ चूका था । तो अब कैसी तलब? उसे खुद यह पता लगाने में कुछ समय लगा।नींद और कुस्वप्न के सामर्थ्य से उसकी अनुभूति के परकार की सुइंयाँ हिली हुईं थी।

 कैफ़ीन” ग स्वयं से बड़बड़ाया और तुरंत उठकर रसोई की दिशा में प्रस्थान करने लगा।

 

उसने अपने, पुंज अत्पादित, सुलभ, स्टील के पतीले को पर्तनों के बाड़े से निकाल कर गैस-चूल्हे पर धर दिया।तत पश्चयात उसने सामने की सिल्ली पर रखे भूरे रंग के एक डब्बे, जिसमें, अमूमन उसने, इंस्टेंट कॉफ़ी रखी रहती थी, को खोला।डब्बे में कॉफ़ी पाउडर के, बस अवशेष मात्र, कुछ ही कण बाक़ी बचे थे और उस डब्बे में, लगभग २० ग्राम का, एक छोटा पैकेट पड़ग ने उसे बाहर निकालकर पढ़ा।

 

उस पर लिखा था कॉफ़ीलि: निऊ, इम्प्रूव्ड, 100%, प्योरली मेड इन अवर फार्म्स, कॉफ़ी।

 

ये देखते ही ग ने कहा "ये क्या बकैती है? अबे यार ,ये आकांशा भी न क्या क्या गंद भर देती है मेरे किचन में, अगली बार आने दो साली को, ऐसा बेस्वाद ज़हर न खिलाया तो मेरा नाम भी..."|

 "आह..." ग गर्राया "पीनी ही पड़ेगी और कर भी क्या सकते है।"

 

उसने पैकेट फाड़ा और उस नए उपभोज्य की एक चमच भर पतीले में उड़ेल दी और फिर उसमे एक तिहाई प्याला पानी डालने के उपरानग ने लाइटर से चूल्हे को सुलगा दिया।

 

“अरे तेरी ! पहले पढ़ तो लूँ इसमें क्या है।कहीं फिर वही घास-फूस वाला गोबर न गटकना पड़ जाये, लास्ट टाइम की तरहं ग ने अपने, पूर्वाभासों की चेतावनियों से भरे विचारों से, उपजी हुई टंकार, से सक्रिय होते हुए कहा।

 

इस बार उसने छिद्रान्वेषी ढंग से उस पैकेट का निरिक्षण किया।वो एक सुनहरे-भूरे रंग की पुड़िया थी।वैसा ही चमकीला, भूरा रंग जैसा दरवाज़ों और दीवारों के निचली ओर के हाशियों में तब किया जाता है जब वो उभरा भाग संगेमरमर या अन्य किसी पत्थर के नहीं बना होता है।ऐसे रंग निचले-मध्यम वर्ग के घरों में अधिक देखने को मिलते हैं ग खुद भी ऐसे ही एक परिवार से था इस लिए ही उस रंग ने ग के बचपन के गृह-विरह की स्मृतियों को जगा दिया था।उस छोटे खरीते की चमक उसके बो.पी.ई.टी.(BoPET) पदार्थ की बनावट के कारण भी थी।उसने पुलिंदे के पीछे छपे अंतर्वस्तुओं और विषय-सूची को पढ़ना शुरू किया।

 

उससूची में कैफ़ीन की संतोषजनक मात्रा देख, ये कहते हुए "चलो कम से कम काम चलाऊ तो ह", उसने उस अभागे पैकेट को वापस डब्बे में डाल दिया।

 

"मुझे इसमें अदरक भी डालनी चाहिए" उसने जिज्ञासु-पने में, एक नए विचार से खेलते हुए, कहा।

 

अगर यह परामर्श किसी और व्यक्ति ने उसके सामने रखा होता तो ग ऐसी बात करने वाले वक्ता का, बड़ी निर्ममता से, खूब मखौल उड़ाता।किन्तु अब, जब ये अपरंपरागत विचार उसके ही मस्तिष्क की उपज थी तो उसे इस वित्ति पर अमल करना ही था।उसने झट से अदरक के गुच्छे से एक कौर तोड़ा और बेलन के सहारे, तीन, द्रुत चोटों से टुकड़े को मसल कर पतीले में प्रवाहित कर दिया।थोड़ी ऊंचाई से गिरने के कारण अदरक के थपके से पानी के कुछ छींटे पतीले की ऊपरी, अंदरूनी सतह पर जा लगे।सतह बहुत गर्म थी तो बूँदें, हिस्स की ध्वनि के साथ, तुरंत उद्वाष्पित हो गईं।कॉफ़ी मद्धम आँच पर धीरे धीरे खौलने लगी थी।उसने बर्तन से निकलती भाप को सूँघा पर उसे किसी ख़ुशबू का अहसास नहीं हुआ।एक बार फिर, उसने एक गहरी साँस खींचते हुए पतीले से उद्भव हो रही उस नई, अनजानी गंध को सूँघने का श्रमिक प्रयत्न किया।एक पल के लिए वह उस अद्भुत ख़ुशबू के उल्लास में खो गया और फिर बड़े तीव्र वेग से उस द्रव्य का धुआँ उसके नाक में चढ़ गया था।वह खाँसा , फिर छींका जिससे उसकी नाक लाल हो गई और आँखों में आँसू उतर आये थे।

"कुछ ज्यादा ही तेज खीँच ली लगता है" ग ने अनिरंतर रूप से खांसते हुए कहा।

 

पतीलें में कॉफ़ी अभी भी हलकी उबल रही थी तो समय काटने के लिएग ने रसोईघर के अन्दर-बाहर लघु टहलें लगानी प्रारंभ कर दीं थी।रसोई की दहलीज से निकास पाते ही बगल की दिवार से सटी, एक छोटी, मैली चिलमची के एक फूट ऊपर एक कुत्सित दर्पण टंगा हुआ था।रसोई में जगे एल.ई.डी. बल्ब से पड़ती चटक रौशनी ने आईने के भीतर का एक विचित्र प्रतिबिंब प्रदर्शित किया।

 

“अरे वाह! इस रौशनी में मै कितना गोरा और बढ़िया दिखाई देता हूँ”ग ने मंदाश्चार्य के बाद उत्पन्न हुए दंभ को भरते हुए, प्रसन्नता से कहा।

 

वह कुछ पलों के लिए अपनी अस्मिता में खो गया।इतने में, पतीले में उबल रही कॉफ़ी अपनी, निरंतर तीव्र होती, उबाल की ध्वनि का उल्लेखनीय ढंग से बखान करने लगी।जिसके परिणाम स्वरुपग का ध्यान (या उसका सम्पूर्ण अभाव) भंग हो गया था।वह झट से अंदर की ओर दौड़ा और लपक कर चूल्हे का नॉब बंद कर दिया।

 "हुंह, दूध तो डाला ही नहीं था।तो फिर इतने उतावलेपन से क्यों भगा गैस बंद करने को?” ग ने, अपनी शून्यमनस्कता के प्रति खीजते हुए, अपने आप को टोका।

 

उसने एक कपड़े से गर्म पतीले को उठाकर आधी कॉफ़ी एक प्याले में डाल दी और फिर पतीले के मूहँ को, उतनी ही परिधि की एक छोटी परात से ढक लिया।अब वह वहीँ खड़ा हो कर अपने बारे में सोचते हुए उस पेय तरल की चुस्कियाँ मारने लगा।

 

जैसे ही कॉफ़ी का पहला घूँट उसके स्वाद कलिकाओं के ऊपर फैला उसने अपने गले से आवाज़ के साथ साँस छोड़ते हुएआह! वाह!"।

 

वह बाकि की कॉफ़ी को, उसकी उष्मा से अपनी जीभ जल जाने के भय से मुक्त होकर, कुछ ही घूँटों में गटक गया था।चाय या कॉफ़ी पीने के बाद वह, बहुधा, कुल्ला किया करता था किन्तु इस कॉफ़ी को ख़त्म करने के बाद यह ऐसा नहीं करना चाहता था।वह उस अद्भूत स्वाद को अपनी जिव्हा पर तब तक बनाए रखना चाहता था जब तक उसकी कर्णमूल ग्रंथियों से स्राव होता लार उस स्वाद को वहाँ से सम्पूर्णतः बहा नहीं देता।इसके पश्च्यात, लगभग यांत्रिक रूप से, वह रसोई से बाहर, और दर्पण की ओर वापस चला गया।वह एक बार फिर अपने चेहरे को गर्व से निहारने लगता।वह इस कदर अपने मुखमंडल के पर्यवेक्षण में लग गया मानो कोई मज़दूर किसी खान में हीरा खोज रहा हो। इसी प्रक्रिया में जब वह अपने मुंड को टटोल रहा था तब, एकाएक, उसकी आखों पर कुछ चमका।आख़िरकार, काले बालों की उस खान के भीतर उसे हीरा मिल ही गया।परन्तु खान के मज़दूर को हीरे मिलने की कोई ख़ुशी नहीं हुई, अपितु कड़वी सचाई से लबरेज़, काले बादलों (या बालों) का साया उसके चक्षुओं के समक्ष छा गया था।और देखते ही देखते उस खान में से और भी बहुत सारे रत्नों की खोज यही नहीँ खदान की हर संभव दिशा में छितरी हुई, बिलकुल ऐसी ही दिखने वाली, बहुमूल्य वस्तुओं की प्राप्ति होने लगी थी।सत्य के इस अमूल्य धन को देखकर ग की आखें चौंधिया गयी, इसकी गणना कर उसका माथा चकरा गया, कर्ण उष्म रक्त से लाल होने लगे, पग स्वचालित रूप से डगमगाने लगे।डाँवाँडोल होते हुए वह सभाकक्ष में रखी कुर्सी पर बैठ गया।

 

“क्यूँ यार?” उसने बड़े अचंभे से रंज किया।


 उसने सामने रखे मेज़ पर दोनों कोहनियाँ टिकाकर, अपने सर को हाथों की बनी की टोकरी में ठूस दिया था।अपनी उँगलियों से अपने मूहँ को भीचे वह कुछ कुड़बुड़ा रहा था, जो मुख के मीचे होने के कारण अश्राव्य था।किन्ग के कपाल को, उसकी जालीनुमा उँगलियों के बाड़े में हिलोरे खाता देख यह स्पष्ट हो गया था की वो जो कुछ भी बुदबुदा रहा था वो प्रीतिकर नहीं था।एक ऐसी आविर्भाव हुई सच्चाई से उसका अब साक्षात्कार हो चुका था जिसने उसके आत्म्पूजा के बुलबुले को फोड़ दिया था।जिसके प्रज्ञान स्वरुप, दशकों में विकसित होकर बने, उसके स्वयं के प्रति के दृष्टिकोण की बुनियाद हिल चुकी थी।उसने अपनी उँगलियों को अपने होठों के स्तर तक नीचे खींचा जिसके साथ-साथ उसके चेहरे की चमड़ी भी खिंच गईथी।उसकी आँखें फटी हुई लग रही थी पर वह आश्चर्यचकित नहीं था।उसके चक्षुओं का श्वेत भाग रक्त की लाल लकीरों से सराबोर था पर वह क्रोधित भी नहीं था।उसने एक लम्बी आँह भरी, जब उसकी नज़र मेज के कोने पर धुल चाटते लैपटॉप पर पड़ी। 

अपने हाथों को लैपटॉप पर फैंकते हुए उसने उसे चालू किया।कंप्यूटर के चित्रपट पर मशहूर सामाजिक नेटवर्किंग वेबसिंक.इंक के चिह्न पर क्लिक किया।


सिंक.इंक

इस वेबसाईट की स्थापना पंद्रह साल पहले 15 साल के एक अंग्रेज़लड़क रूरैर्ट हुलियन हैच्किंग्स ने की थी।वह एक अति मेधावी बालक था जिसने 13 वर्ष की आयु में उच्च माध्यमिक विद्यालय से स्नातकता ग्रहण कर ली थी।चौदह साल की उम्र में उसने अपने देश के सबसे प्रख्यात विश्वविद्यालय 'दि रॉयल यूनिवर्सिटी ऑफ़ ब्रिटानिका' में दाखिला लेकर, वहाँ से उसी वर्ष के अंत में ड्रॉपआउट भी कर लिया था।डेढ़ साल के अंदर, अपने उसी महाविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक तथा एक और वरिष्ठ विद्यार्थी (जो खुद भी अंतिम वर्ष का ड्रॉपआउट था) के साथ,सिंक.इंक के बीटा संस्करण को ऑनलाइन कर दिया था।इसके एक महीने के भीतर ही उस वेबसाइट पर बीस लाख ग्राहक सदस्यता ले चुके थे।ये तीनो व्यक्ति मात्र दस वर्ष के कम अंतराल में अरब पति हो गए थे।

 

डॉ. एल. टी. कोव्बयूर्गर, जो ब्रिटानिका में व्यवहार विज्ञान के प्राध्यापक थे, सामाजिक प्रतिमानों तथा जन व्यवहार मनोविज्ञान में पीएच.डी. थे, की तीन वर्ष पूर्व आँतों के कर्क रोग से मृत्यु हो गयी थी।जिसके परिणाम स्वरुप उनके हिस्से के ३०% शेयर उनकी इकलौती कन्या डॉ. मैगी कोव्बयूर्गर को चले गए जिसने एक साल बाद 40% शेयर के मालिक हैच्किंग्स से प्रेमविवाह कर लिया था।

 

प्रारंभिक तौर पर कंपनी का बाक़ी तीस प्रतिशत हिस्सा स्वीडिश मूल के अंग्रेज़ नागरिक, कुख्यात, हान्ज़ हिब्बिट्सइष्टाइन का था।दुनिया के महानतम हैकर्स में एक नाम इनका भी शुमार हुआ था जब उसने विश्व ओपन ग्रे हैट हैकिंग टूर्नाम में लगातार दो बार प्रथम स्थान पाया था।उसकी निर्दयी हैकिंग पद्यति और आक्रामकता की वजह से इन्टरनेट पर उसे "डार्क हैट” और "स्कीन ष्टाइन” जैसे बहुचर्चित नामों से जाने लगा था।एक बार कोरियाई हैकर्स के एक गुट ने सिंक.इंक को हैक कर लिया था।बदले की भावना में भड़कते हान्ज़ ने अकेले ही उस गुट का इन्टरनेट से सफाया कर दिया था।अगर प्रचलित अफ़वाहों की माने तो उसने न सिर्फ़ उनके कृत्रिम इन्टरनेट-जीवन का वध किया था बल्कि उनके देश में भाड़े के हत्यारों को उनके पीछे लगा दिया था।पर यह जानने के बाद की वे सभी कॉलेज के बच्चे हैं अपना कातिलाना अनुबंध वापस ले लिया था।उसके संभंध जगत के सबसे खुख्यात, अनैतिक गुट 'डार्क आर्मी' से भी बताये जाते हैं।यदि षड्यंत्र सिद्धांतकारों की माने तो हिब्बिट्सइष्टाइन डार्क आर्मी की कठपुतली हसिंक.इंक विश्व-समाज में उनके गोपनीय घुसपैठ की एक महत्वपूर्ण बिसात।डॉ. कोव्बयूर्गर के देहांत के कुछ हफ़्ते बाद ही अपने राष्ट्रिय बैंक को हैक करने की कोशिश व बाहरी ताकतों से मिलकर अंग्रेज़ी ख़ुफ़िया महकमे के रहस्य उजागर करने के अपराध में उसे २ करोड़ पाउंड्स का जुरमाना और 10 वर्ष की कैद हुई थी।बाद में बाक़ी गुनाहगारों को पकड़ने में सरकार की मदद करने और आजीवन, नवगठित, ए.आई.आई.सी. - इन्टरनेट विरोधी घुसपैठ दल (एंटी इन्टरनेट इन्फिल्टरे के सलाहकार के रूप में काम करने को राज़ी होने पर उसे केवल तीन वर्ष की साधारण कैद सुनाई गई थी।वह, ख़ास राजनीतिक और कॉर्पोरेट कैदियों के लिए निर्मित, ससेक्स शायर काउंटी जेल में अपनी सज़ा काट रहा है।अब हान्ज़ केवल 8% का मालिक है और मुकदमों की लागत और जुर्माने से उत्पन्न हुई आर्थिक तंगी के कारण उसने अपने बाईस प्रतिशत शेयर एक बायो-केमिकल अनुसंधान कंपनी को बेच दिए थे।


ग ने अपने गृह पृष्ठ पर लिखे रुपरेखा के निशान पर क्लिक किया।यहीं, मध्य में, उसकी जन्मतिथि और आयु लिखी थी।‘30 बसंत', गहरे, चमकीले, श्याम शब्दों में।उसकी फटी आँखों को चीरते हुए, सीधे उसके दिमाग के बीचों बीच वह लिपिक मानो गुद गया था।एक टैटू, जो न तो अब मिटाया जा सकता था और ना ही घटाया जा सकता था।जो केवल बढ़ाया, और भी ज़्यादा गहरा एवं चिरस्थायी किया जा सकता था।

 

उसने लैपटॉप का मूहँ इस मानिंद बंद किया मानो किसी राक्षस की गुफा का प्रवेश बंद करने की कोशिश कर रहा हो।उसकी हस्ती का ये नया खुलासा ही वो राक्षस था जो अब उसकी बेख़बरी की गुफ़ा से निकास पा चूका था।अब भले कितनी ही चट्टाग क्यों न धकेल ले वह दैत्य, अब और, उस अँधेरी अनभिज्ञता में वापस नहीं जा सकता था।

 

कुछ पल गहरे विचार के बाद, ग ने एक निश्चय के साथ अपने गाल पर दो-तीन प्रभावशाली तमाचे जड़े और एक मौलिक चिंघाड़ के साथ खड़ा उठा।उसने उठते हुए कुर्सी को बड़े वेग से पीछे धकेला, जो लगबघ पलटी खा कर गिरने की हालत में, घिसड़ते हुए दीवार से सट गयी थी।वह बहुत ही सावधानीपूर्ण पदचापों से आइने की तरफ़ बढ़ा और एक दफ़ा पुनः अपने मुंड-मुख को कुशाग्रता से जाँचने लगा।उसकी चौंधियाई आँखे अब बदल चुकीं थी।उसके नेत्र अब काया में विपुल थे और उनकी पुतलियाँ एक खगोलीय दूरबीन की भाँती दर्पण में उस प्रतिबिंबित अंतरिक्ष को टोह रहीं थी, जहाँ एक के बाद एक नित-नवीन आकाशगंगाओं का प्रस्फुटन हो रहा था।

 

उसने अपने दाएँ हाथ से दाढ़ी खुजलाते हुए बाएँ हाथ को धीमे से बालों में फेरा और उसी संचालन में अपने सर को सहलाया जैसे कि वह कोई नादान बच्चा या पालतू पश“कुछ टाइम बाद दाढ़ी छोड़नी भी आफ़त बन जाएगी।सर ने तो छोड़ना शुरू कर ही दिया है अब गाल भी सफेदी छोड़ना शुरू कर देंगे।ये छूटन अब मुझे मेरी छुट्टी होने तक नहीं छोड़ने व ग ने रह रहकर यह बात सोची।

“चलो कम से कम किसी लौंडे-लौंडिया की गूँजती हुई, अंकल...अंकल...अंकल... की आवाज़ से तो दुखड़ा नहीं खुला।” उसने, हालत पर ठट्ठा लगते हुए, आईने में दिखती अपनी छवि से कहा।इस हँसी मेग की आशाभंगिता का शोर था।

 

ग की वित्तियों में अब वही पुराना, गोद्रेज काली डाई का, विज्ञापन चलने लगा था।ग के परिपेक्ष में एक बहुत ही शुद्ध और स्वच्छ उच्चारण वाले एक मर्दाना नाद का वृतांत होने लगा।

 

‘यूँ एक एक सफ़ेद बाल मत कट काटो।कैंची से एक छोटा पैक काटो।’


ग ने बैठकखाने में रखे टीवी की और फ़ौरन देखा।पुराने विज्ञापन की आवाज़ धीरे और स्निग्धता से रात के सन्नाटे में घुल गई थी।टीवी बंद था और उसके काले काँच पर केवल कमरे की ट्यूबलाईट का प्रकाश औग का धुंधला प्रतिबिंब दिख रही था।वह अपनी जिज्ञासा समेत टीवी की ओर गया और फिर अपने चेहरे की एक तरफ़ को टीवी के शीशे के बहुत पास लाकर कुछ ढूँढने लगा।उस अपारदर्शी काँच से टकराकर परिवर्तित हुई रौशनियों के प्रभाव में वह कुछ खोज रहा था।

 

अचानक... एक सुनहरे रंग का धब्बा उस धुंधले प्रतिबिंब में फूटा।ग ने पहले अपने पीछे और टीवी के ठीक सामने बनी खिड़की को देखा और फिर दिवार पे लटकी दीवाल-घड़ी को।घड़ी के चौखट ढाँचे के ऊपर उस घड़ी उत्पादक का नाम लिखा था, 'समया रक्षक घड़ी के मिनट और घंटे के काँटे, एक मशहूर कोला पेयजल की बोतल के आकर व रंग-रूप में थे; जिससे यह आभास होता था कि घड़ी खरीदी नहीं गई थी और किसी सहयोगी प्रचार योजना के तहत मुफ़्त में मिली थी।और उस घड़ी का क्षणों को बताने वाला काँटा एक विद्युतीय गाज के मानिंद बना हुआ था, जो एक मानक कंपनी प्रतीक था और यह मानक प्रतीक समया रक्षका की घड़ियों के सारे प्रतिरूपों और मॉडलों में बिलकुल ऐसा ही रहता थग उस घड़ी को 'समय राक्षश' बुलाता था।उसकी माने तो समय उसके हर कार्य में विघ्न डालता था और ख़ास कर जब वह उस घड़ी में वक़्त देखता था तब तो, निर्विवादास्पद रूप से, उसका काम बिगड़ता ही बिगड़ता था।ये घड़ी उसे उसकी प्रियतमा ने, उनकी सालगिरह पर उपहार में दी थी; जो उसे अब, अतीत-दर्शिता में सोचने पर, एक सोची समझी विधि मालूम पड़ रही के द्वारा वक्त के प्रति बेक़द्री के खिलाफ एक गूढ़ बयान था जिसमे सूक्ष्म कटाक्ष छिपा हुआ था।उन दिनों की तरहं आज भी उसे समय की अड़चन महसूस हो रही थी।सूर्योदय होने में अभी चार घंटे बाकि थे और वो धूप ही थी जो काँच को ऐसा चटक सुनेहरा रंग दे सकती थी।ग ने फिर टीवी की ओर देखा।अब वहाँ सुनहरे धब्बे के साथ गुलाबी रंग भी चमक रहा था, फिर पीला, हरा, नीला, बेंगनी, लाल, ये सभी रंग भी चमकने लगे।देखते ही देखते वहाँ नए रंगों का मेला सा लग गया था मानो जैसे सभी रंग किसी नुमाइश को देखने पहुँचे थे।बड़ी ही विचित्र सभा थी वह।ग उन रंगों के मध्य हो रही असंगत बातें, फुसफुसाहटों, विवादों, मखौल, चिंताओं और वक्रपटुताओं को अपने कानों के पर्दों पर महसूस कर सकता था।यह उसी तरह था जैसे कोई सैलानी, किसी दूर देश में, वहाँ के बुद्धिजीवियों की सभा में फंस जाए और उनकी अश्पष्ट भाषा से जन्मे निरंतर शोर से अपने को ग्रस्त पाए।ग इन रंगों के शोर से इसी तरहं तंग होने लगा था।


“ये क्या हो रहा है?” ग ने मंद्बुद्धिस्त्व का आभास होते हुए कहा।

 

तभी, लहू की एक धारा, हूबहू टीवी के रंगों में से चमकते लाल रंग जैसी, उसकी बालों की मांग के मध्य से, माथे को पार करती हुई, उसकी नाक को नाप कर, ज़मीन पे टपक गई।जैसे ही वह बूँद फ़र्श से टकराई तो उस स्थान पर एक संगीतात्मक कंपन होने लगा।वह बूँद, बजाय फ़र्श पर फैलने के, उस कंपन में नृत्यमई हो गई थी, यह नृत्य वैसा ही था जैसा किसी वूफ़र के बाहरी परदे पर होने वाले कंपन से उस पर गिरी जल की छींट नाचती है।वह बूँद, गुरुत्वाकर्षण के नियमों भंग करते हुए, भूमि छोड़, ऊपर कीखंडित कणों में उछल रही थी।सहसा, एक झटके से वह बूँद ऊपर की दिशा में उचकी और नाक तथा माथे की रक्त रेखा को बटोरते व साफ़ करते हुए अपने उतपत्ति के स्थान पर समा गई।ग को ऐसा लगा जैसे कोई चलचित्र उत्क्रम में चल रहा था।

 

ग ने घबराहट में अपनी मांग का अग्रिम सिरा परखा और फिर सनक के साथ फ़र्श के उस हिस्से को, जहाँ पर बूँद गिरी थी और जहाँ से फिर वापस ऊपर प्रक्षेपित हुई थी अपने नंगे तलवे से परखने लगा था।फ़र्श ठंडा और सूखा था किन्तग को उसके सूखे होने से अधिक अपने पैर की खाल में किसी कंपन की अनुभूति न होने का आश्चर्य था।दो-तीन बार उस जगह पग रगड़ने के बाद एकाएक उठी चिंगारी और उसकी विद्युति-चटक से उठी ध्वनि से भय खा कर ने अपना पैर वापस खींच लिया।उस झटके से वह कुछ कदम पीछे निवर्तित हो गया था।घबराहट की वजह से लम्बी साँसें भरते और छोड़ते हुए;ग ने अपनी बाईं ओर स्थित दर्पण में अपने प्रतिबिंब को पुनः देखा।उसके केश और उनके नीचे की खाल रक्त रंजित थी।ग सदमें में पीछे की तरफ़ लड़खड़ाया पर सौभाग्य से वह कमरे की ख़ाली जगह के अंत में खड़ा था।उसके ठीक पीछे दीवार थी जिसकी सहारा देने वाली चोट ने उसकी असंतुलित काठी को पुनः कर दिया था|

 

ग की भयावय मुखाकृति तब सम्पूर्ण शुन्यचित अनभिज्ञता की अवस्था में परिवर्तित हो गई जब उसका कपाल और उसके बाल, टीवी के नाना रंगों में रंगने लगे।

 

“ये सपना है, ये सपना है” कहते हुए ग ने अपने गालों पर ज़ोरदार चाँटे जड़ने शुरू कर दिए "उठजा, उठ, उठ ना ! उठता क्यूँ नहीं

 

ग के थप्पड़ अब घूसों में बदल गए थे जो कभी मूँह पर, कभी छाती, कभी पेट पर और कभी पसलियों पर विनियमितपारियों में, उस स्थान की पीड़ा सीमा के अनुरूप, बरस रहे थे।इन प्रहारों से उठा दर्द भी उसे इस स्वप्न समान जागरूकता की अवस्था से नहीं जगा सकता था।उसे पहले आश्चर्य हुआ था, जो फिर भय में बदला, और अब वही भय धीरे धीरे निराशा में तबदील होता जा रहा था।इस घोर निराशाजन स्थिति के पाश में उलझे ग को सिसकने के अतिरिक्त कोई और उपाय न सूझा।उसका चेहरा अकड़ कर हताशा के दबाव में सिकुड़ रहा था।उसके आखों की गोलियों के आगे जल का एक महीम आवरण बिछ गया था, किन्तु फिर भी वह आँसू बन कर प्रत्यक्ष नहीं हुआ ग चाहता था की उसके आँसू उसके नेत्रों के आगे धुंधलेपन का ऐसा कवच चढ़ा दें जिसकी ओठ में वह इस झक्की, वर्तमान दशा के दर्शन से बच सके।वह, अपने जबड़े को और अकड़ाते हुए, बिलखा; यह सोच कर कि उसके ऐसा करने से उसकी आँखों में आँसू आएँगे; किन्तु इसमें भी उसे निराशा ही हाथ लगी (या उसकी परिस्थ में-निराशा ही आँख लगी)।


एकाएक उसके हावभाव में थोड़ा विषयांतर हुआ मानो उसे कोई नया उपाय सूझ गया था।उसने 'हूँ' की ध्वनि निकालते हुए एक सिसकी भरी साँस छोड़ी, फिर अपने मूँह से एक गहरी साँस भरते हुए अपनी नाक पर एक सन्नता हुआ मुक्का ठोक दिया।इसके परिणाम स्वरुप कुछ पल के लिएग सुन्न हो गया था।पीड़ा की एक विद्युतीय तरंग उसकी नाक से होती हुई उसके चक्षुओं में कौंध गयी थी जिसके फल स्वरुप अश्रु संपन्न एक सरिता उसके चक्षुओ में उतर आई।


अपनी अभिलाषा के अनुरूप, आसुओं से पनपी, धुन्ध्लाहट को पाकर ग उन्मादक हँसी हँसने लगा था।यह प्रसन्नता किसी चेतनाशून्य करने वाली औषधि की भाँती उसे मादकता दे रही थी।जिसके सुख में उसे अपनी फूटी नक्सीड़ से हो रहे दर्द का रत्ती भर भी आभास नहीं हो रहा था।इस तोड़-फोड़ का ज्ञान उसे तब हुआ जबण की कुछ बूँदें उसकी हथेली के पिछले भाग पर टपकी।उसे अपनी नाक में एक गर्म लहर का बहाव महसूस हुआ, जो उसके होंठ और ठोडी से झरता हुआ उसकी बाँह पर अपनी ऊष्मा को महसूस करवा रहा था।तब कहीं जाकर, अंत में, उसे एक घुटन भरे दबाव के दर्द वाला एहसास हुआ।ग को यह ज्ञात होने लगा की उसे उसकी नाक से साँस लेने में दिक्कत हो रही थी।अश्रुओं से उठे धुंधलेपन और पीड़ा से उसके कानोँ में वाद्ययंत्र बज रहे थे जिनके शोर में संचालन करते हुए, किसी तरह, वह अपने कमरे तक पहुंचा।

 

वहाँ, कमरे के कोने में रखी खुली अलमारी के बीच के खाने में रखे तौलिये को खीचने से हुई अस्त-वयस्तता के कारण उस स्थान के सारे कपड़े-लत्ते फ़र्श पर गिर गए थे।जिसकी आवाज़ ने घुरघुराते हुए अपनी नाक और आँखे साफ़ करनी शुरू कर दी थी।अपनी आँखों की निहारिका को साफ़ करने के बाद उसने होशियारी और बड़े ही कोमल ढंग से, हलकी थपथपाहट में, अपनी घायल नाक को साफ़ करना प्रारंभ किया।ऐसा करने से उठे दर्द की आँखें फिर नम हो गईं थी, जिन्हें पोंछने के लिए ग ने प्रतिक्रिया वश वर्तमान स्थान से तौलिये को उठा कर अपने नयन पुनः साफ़ किए।वह अपनी पलकों के ऊपर तथा आँखों के नीचे रक्त के मलने को भांप सकता था।

 

आ शिट” उसने तौलिये के उस भाग को अपनि दृष्टी के स्तर के समरूप लाकर, खुद को कोसते हुए कहा।

 

जिसे, आँसुओं और पीड़ा के अंधेपन में, अपना बरगंडी रंग का तौलिया समझ बैठा था वो अस्ल में एक श्वेत साफा था।वह तुरंत गुसलखाने की तरफ़ गया और साफें का रक्त से अंकित हिस्सा खुले नल के निचे रख कर रगड़ने लगा।इस व्यर्थ प्रयास से केवल उपरी सतह का दाग ही धुल पाया था।ये जेठ के महीने की गर्मी वाली रात थी जो दाग सुखा चुकी थी और ऊपर से कपड़े के रेशो में हुई केशिकाओं की कार्यवाई भी अपना तंत्र कर चूकी थी।  

 

“अब तो इस धब्बे को गर्म पानी और ढेर सारा डिटर्जेंट या फिर तेज़ाब ही मिटा सकता ह” ग ने समर्पण में साफ़ा फ़र्श पर पटकते हुए सोचा।

 

इसके बाद वह चिलमची की ओर चल पड़ा जहाँ पहुँच कर, फिर से, बड़ी सावधानी और मृदुलता से, जल के थपेड़ों के सहारे, अपनी नाक और आखोँ को साफ़ करने लगा था।अपने थूत और हाथों पर लगे रक्त को भी पानी से पोंछ कर उसने सारे चेहरे को पानी से धोया और दर्पण के बगल में लटके हाथ तौलिये से पानी साफ़ किया।उस हाथ तौलिये से आती घृणास्पद ग की सूँघने की शक्ति को वापस यथावत कर दिया था और उसे विचार आया की वो तौलिया शायद तब से नहीं धुला होगा जब से आकांशा ने उसे आखरी बार धोया था।

 

अपने मूहँ को अंतिम बार पोछते हुए उसकी दृष्टि, शीशे में, अपने अक्स पर टिक गई थी और उसका हाथ, जो उसके मुखड़े को पोंछ रहा था अब मंद गति से, लगभग रुका हुआ सा, नेचे खिसक रहा था।यह प्रतिक्रिया उसके प्रतिबिंब से उत्पन्न हुए आश्चर्य से आई थी।उसने देखा की उसके बाल और कपाल दोनों ही पहले जैसे, सामान्य दिख रहे थे। जैसे ही उसे अपने अजीब तरीक़े से रंगे केशों को, जिनकी वो कुछ मिनटों पहले तक आदत डाल चूका था, अपनी सामान्य स्थिति में आते हुए देखा तो वह एक पल के लिए स्तभ्ध रह गया था।किसी वास्तु से आश्चर्यचकित होना और फ़िर उसकी आदत डाल लेना और कुछ समय बाद दोबारा अचसे भर जाना ग के जीवन व्यापन की वर्तमान कार्य प्रणाली बन चूकी थी।हालाकी यही बात उसकी सामाजिक (नेटवर्किंग) और मनोरंजन-खोजी जीवन उद्देश्य पर पहले भी लागु होती थी पर इस ज्ञान से उसका साक्षात्कार कुछ क्षण पहले ही हुआ था।

 

जैसी ही सामान्यपन वापस आया, तो उसके साथ लौटी वही भूतपूर्व खोज जो उस सामान्यता में श्वेत गेसुओं की असमान्यता से हुई थी, जो सामान्य रूप से स्वयं में जीवन व यौवन के ढलने की सामान्यता थी, और साथ ही वापस आ गयी थी ग की निराशा।किन्तु यह निराशा वो पहली वाली उदासीनता जैसी नहीं थी जिसकी उत्पत्ति डर और शंका से हुई थी बल्कि यह एक निराशा भरे अनुभव से आई अंगीकरण की भावना जैसी थी।

 

“हम्म... मुझे लगता है अब वो हेयर डाई का पैकेट लेना ही पड़ेगा आखिरकार ग ने बड़े ठहराव से, अपने बालों में हाथ फेरते हुए कहा।

 

इस संतोष और परिस्थितियों की स्वीकार करने सेग के अंदर एक नई हस्ती का जन्म हुआ।अपने सफ़ेद बालों की चमक में वह अपने बढ़पन को बढ़ता हुआ देख सकता था।उसके ज़हन में पहली बार, पूरी गंभीरता के साथ, अपने पूर्वनियोजित भविष्य का ढाँचा बनाने की आवश्कता की माँगउदय हुआ।और इसी आवश्यकता के साथ आविर्भाव हुआ उन सारे उपभोगता उत्पादों की चाह का जो ग हिसाभ से उसके इस भविष्य के पूर्वनियोजन को अर्जित करने में सहायता कर सकते थे।

 

वह तत्काल ही मेज़ पर रखे अपने लैपटॉप को खोलने हेतु लपका।उसके चालू होने के साथ ही उसे सिं.कॉम की एक अधिसूचना लैपटॉप के पर्दे के निचले दाएँ कोने में दिखाई पड़ी।उसने उस पर क्लिक किया; जो उसे सीधा आकांशा के गृह पृष्ठ पर ले गया।वहाँ एक दफ़ा और उसका, उसी स्तब्ध कर देने वाले ,आश्चर्य से सामना हुआ जो अब उसके जीवन का एक सामान्य पहलु बन चूका था।आकांशा के 'सम्बन्ध स्थिति' की जगह पर लिखा थानॉट कमिटेड' जो, 'नॉट इंटरेस्टड' और 'सिंगल' के बाद उस वेबसाईट की तीसरी, सबसे निचली श्रेणी थी।ग का हावभाव अब फिर आश्चर्य को छोड़ कर एक नवीन भंगिमा में तबदील हो गया था जिसमे विभ्रान्ति की बोखलाहट के साथ साथ दबीं स्मृतियों की झलक भी थी।उसका लालिमा से प्लावित चेहरा तब धीरे धीरे पीला पड़ने लगा जब उसकी हाल ही की, बिसरी हुईं, यादें सुनिश्चित होने लगीं थी।उसने एक गहरी साँस छोड़ते हुए अपनी नई सामान्यता को वापस अर्जित किया।पर यह सामान्यता पुनः आश्चर्य में परिवर्तित हो गयी जब उसने आकांशा के प्रोफाइल पृष्ठ की दाहिनी हाशिये पे दो विज्ञापन देखे जो उस जगह को सम्पूर्ण रूप से घेरे हुए थे उस हाशिये के ऊपर के भाग में 'पुनर्जन्म काली डाई: जवानो के लिए' टैग लाइन वाला विज्ञापन था और उसके नीचे 'सिक्योर फ्यूचर ग्रुप' के नूतन आरंभित 'सिक्योर पेंशन पूल फंड' का विज्ञापन था।जिस पर कुछ देर वैचारिक और नैतिक रूप से क्रुद्ध होने के उपरांत ग ने उन दोनों पर, स्वभाव विवश, क्लिक कर दिया था।एक ब्राउज़र में डीबास्के.कॉम और दुसरे ब्राउज़र में सिक्योरफुचरग्रूप.फं के पृष्ठ खुल गए जिनके अन्वेषण में वह पूरी तरह से डूब गया था।

 

कब रात ढली और कब सूरज की तीखी किरणे ग के, लैपटॉप के कुंजीपटल के ऊपर चित पड़े, लार टपकाते, चेहरे पे पड़ीं इसका पता खुद, उस कमरे के अंदर कल रात्री से स्थित, समय को भी ना चला।उन उर्मियों की ऊष्मा से अवतरित हुई जलन सग की अकाल निंद्रा भंग हुई।सूर्य की किरणों के तपन से लाल हुए चेहरे के आगे उसने उसका हाथ ढाल की तरहं अड़ाया, इस कोशिश में की उसे इस झुलसा देने वाली ज्वाला से रहत मिलेगी परन्तु ये प्रयत्न व्यर्थ ही साबित हुआ।वह अधिक देर तक अपना हाथ हवा में तान कर नहीं रख पाया।गर्मी तेज़ थी और किवाड़ का पर्द की पहुँच से बहुत दूर था।अंततः हार मान कर उसने उठने का निश्चय किया।जैसे ही उसने अपना मुख लैपटॉप के ऊपर से उठाया वैसे ही उसके मूँह से निकले लार के समावेश से बनी अपारदर्शी झिल्लि भी, बहु-दिशाओं में खीचकर, कुंजीपटल से ऊपर उठी थी।उस झिली से टकराकर सूर्य की किरण कई रंगों में चटक गई थी।उसने अपनी हथेली से थूक को पोंछ कर, ऊपर, दिवार पे लगी घड़ी की ओर देखा।समया-रक्षका ने उसकी कोमल, जगीली स्थिति पर 'सुबह के साढ़े दस' बजने की बिजली गिराई।

 

उसकी गर्दन में तीव्र पीड़ा का संचार हुआ जिसने निचली पीठ तक अपना प्रभाव दिखाते हुए अपनी सीमाओं का आह्वाहन कर दिया था।यह यंत्रएक कठोर सतह पर, घंटो, एक अप्राकृतिक कोण पर, सर रखकर, सोने से हुई थी।

 

“उम्ह..." ग के मुख से एक हलकी कर्राह निकली और उसने अपनी गर्दन और कंधे को मसलते हुए कहा "बहुत गलत सो गया भाई-उह आह "।


"बहुत देर भी सो गया। शिट! माँ को कॉल करना था।” ग, जो अब हलके फुल्के सर दर्द से वाक़िफ़ हो रहा था, ने अपना माथा दबाते हुए कहा।

“फ़ोन नहीं किया तो नजाने क्या क्या कहानियाँ सोचने लग जाएगी।अगर मेंटल गोला-बारी से बचना चाहता है तो कोई एप्रोप्रियेट बहाना सोच और तुरंत फ़ोन मिला दे” ग अपात्कालिक अनुभूति के साथ अपने आप को आदेश देता है।

 

तभी उसकी दृष्टि अपने लैपटॉप के निचले दाएँ कोने पर पड़ी जो 'क्रूशियल बैटरी, २% शेष' का संदेश बड़े ही व्याकुल रूप से चमका रहा था।उसने लैपटॉप के चित्रपट पर खुले ब्राउज़र को देखा जिसमे डीबास्.कॉम का आदेश पृष्ठ खुला हुआ था।उसमे लिखा हुआ था "आपकी टोकरी में रखे सारे आदेशित उत्पादों की सफलतापूर्वक पुष्टि हो गई हैं जो आपको 2 दिन के अंदर मिल जाएँगे”।इसके ठीक नीचे लिखा था "पांएँ २ घंटे के अंदर होने वाली ड्रोन वितरण केवल 99* राष्ट्रीय रुपए में”, जीके ठीक नीचे * करके "शर्तें लागू” का बहाना गुदा हुआ था।इसके नीचे और भी मोटे और चमकीले अक्षरों में लिखा था "या फिर बने हमारे अनन्य सदस्य केवल 999 राष्ट्रीय रुपए सालाना देकर और पायें सभी* उत्पादों का मुफ्त ड्रोन वितरण और कई और प्रीमियम प्रतावों का विशिष्ट लाभ उठाएं”" और उसके बगल में 'अभी दर्ज करें' का बटन चमक रहा था।वह उसपे क्लिक करने ही वाला था की लैपटॉप की बैटरी मर गई और एक तिनके के टूटने की आवाज़ के साथ लैपटॉप अकस्मात ही बंद हो गया था।

 

“फ़ूह! चलो कुछ नहीं तो पैसे ही बच गए...” ने एक बेतहाशा हँसी के साथ कहा।

 

तभी उसका फ़ोन बज पड़ा।उसकी स्क्रीन पर एक नंबर और एक औरत की फोटो अवतरित हुई जिसके नीचे लिखा थामाँप "|

 

“हाँ माँ प्रणाम” ग ने फ़ोन उठाते ही बोला।


कॉल के दुसरे छोर पर ग की माँ की असंबद्ध आवाज़ आ रही थी।क़रीब एक-सवा एक मिनट तक 'हम्म-हूंह' करने और एक शब्द वाले उत्तर देने के बाग एक खोए-खोए सी समाधी में चला गया था।अब वह केवल अपना सर हिला कर अपनी माँ की बातों का उत्तर दे रहा था।वह, यह भी भूल गया था की वह अपनी माता से रूबरू नहीं अपितु दूरसंचारिक वार्तालाप में भाग ले रहा था और उसका मुंड मटकाना उसकी माँ नहीं देख सकती थी।

 

“हेल्लो? तू है कि नहीं वहाँ? जवाब दे बेटा।” इस बार ग की माँ की आवाज़ एक दम साफ़ सुनाई दे रही थी “हुँह? हाँ यहीं हूँ मम्मी” ग का ध्यान टूटा।

 

उसकी माँ की अस्पष्ट बातें पुनः प्रारंभ हो गई।वह उठकर उसी पुराने दर्पण के पास गया और अपने बालों में उपजे, पतझड़ के मौसम से बने दृश्य समान, नए सफ़ेद बालों को देखा तथा उसी समाधी की अवस्था में वापस जाते हुए, मुख से बाहर, स्पष्ट स्वर में, ज़ोर से कहा "अब तो इन सफ़ेद बालों पे काली मेहँदी मलनी ही पड़ेगी”|

 

“क्या? क्या बोला तू? सफ़ेद बाल? अभी से?” एक बार फिरग की माँ की ध्वनि साफ़ हो जाती है।

 ग ने, जैसे एक प्रभाव के अधीन, अपने बालों की नई छूटन को निहारते हुए, अपनी नई खोज के बारे में अपनी माँ को बताना शुरू कर दिया था।उसके हर वाक्य के साथ उसकी माँ की आवाज़ और भी तीव्र होती जा रही थी।अपने जीवन की एक एहम घटना को देखने और जीने के पश्च्यातग उसकी माँ की फटकार नहीं सुनना चाहता था इसलिए उसने पुनः अपनी समाधि की अवस्था में खोना शुरू कर दिया था।ग की माँ की तीव्र हो रही आवाज़ अब धीरे धीरे मंदी होती जाती है और फिर दुबारा अश्पष्टता के आवरण में लिपट गई थी।और फिर जब एक भोधिस्तव ध्यान से अपने प्रतिबिंब के दर्शन में खो गया तब ग की माँ का एक ही असंसक्त वाक्य बार बार पुनरावृत्तित हो रहा था, जो वाक्य केवल अंत में ही ग की समझ में आया।उसकी माँ चेतावनी दे रही थी की…“काली मेहँदी मत लगाना नहीं तो बचे खुचे काले बाल भी सफ़ेद हो जायेंगे।समझ रहा है ना तू? काली मेहँदी मत लग...”

 

सारी ध्वनियाँ, जून महीने की एक सामान्य दोपहरी में,ग के खोए ध्यान के प्रकाश में समा कर लुप्त हो जाती है।उसे अब और कुछ सुनाई नहीं देता, और न ही कुछ दिखाई देता।दिखती है तो केवल सर से छलकती सफ़ेद बालों की छूटन।


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