चार साल और गोली के चार फायर
चार साल और गोली के चार फायर
बचपन में पहली गोली
मैंने जीवन में दो बार गोली चलाई है।
पहली बार तब—जब मेरी उम्र मात्र चार वर्ष थी।
पिताजी एनसीसी में थे। मैं बहुत छोटा था, पर स्मृतियाँ उम्र की मोहताज नहीं होतीं। वे धुंधली होकर भी जीवित रहती हैं। आज भी वह दिन मेरी चेतना में कहीं सुरक्षित है।
रविवार का दिन था। एक फौजी अफ़सर और दो सिपाही हाईस्कूल के एनसीसी कैडेट्स को बंदूक चलाने का प्रशिक्षण देने आए थे। यह हर वर्ष होने वाला दो दिवसीय कार्यक्रम था—अनुशासन, रोमांच और गर्व से भरा।
मुझे याद है, मैं थर्मस अपने कंधे पर लटकाए पिताजी के साथ चल रहा था। पिताजी एनसीसी की वर्दी में थे। लड़के भी पूरी वर्दी में सजे थे। उनकी टोपियों पर लाल रंग का निशान लगा था। सबके चेहरे पर एक विशेष चमक थी—मानो उन्हें कोई दुर्लभ अवसर मिला हो।
स्कूल के पास एक खुला मैदान था, जो सामान्यतः गाँवों का सामूहिक चारागाह था। उस दिन गाँव वालों से आग्रह किया गया था कि पशु वहाँ न लाएँ। मैदान के चारों ओर कुछ कैडेट लाल झंडे लेकर खड़े थे और आने-जाने वालों को रोक रहे थे।
मैदान के एक सिरे पर पाँच–छह दरियाँ बिछी थीं। तीन-तीन कैडेट एक साथ फायरिंग करते थे। दूसरी ओर लकड़ी के डंडों पर गोलाकार टारगेट लगे थे। हर कैडेट को दस राउंड फायर करने थे। बीच-बीच में प्लास्टिक के कपों में चाय भी मिलती थी। पूरा वातावरण अभ्यास और उत्सव का मिश्रण था।
कुछ बड़े लड़के मुझसे खेल रहे थे। तभी मेरे भीतर भी गोली चलाने की ज़िद जाग उठी।
पिताजी ने कहा—
“बेटा, तुम अभी बहुत छोटे हो।”
पर फौजी हवलदार मुस्करा दिए—
“कोई बात नहीं, इससे भी कुछ फायर करवा देते हैं।”
मुझे दरी पर लिटाया गया। एक आँख बंद करने को कहा गया। असल में बंदूक हवलदार ने ही थामी हुई थी। मेरी उँगली ट्रिगर पर रखी गई, और निशाना दिखाया गया।
फिर ट्रिगर दबा दिया गया।
धाँय!
उस तेज़ आवाज़ से मैं घबरा गया। पूरा शरीर सिहर उठा। समझ ही नहीं पाया कि क्या हुआ।
मैंने कुल चार राउंड फायर किए।
अगले दिन भी मैंने फायरिंग की।
आज, इतने वर्षों बाद भी, जब वह दृश्य आँखों के सामने आता है, तो मन रोमांच से भर उठता है।
शायद तभी समझ में आया था कि कुछ आवाज़ें कानों से नहीं, सीधे स्मृति में उतरती हैं—और उम्र भर गूंजती रहती हैं?
