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Pradeep Kumar

Abstract Inspirational

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Pradeep Kumar

Abstract Inspirational

राजधानी यात्रा: सेवा पर मेवा नहीं

राजधानी यात्रा: सेवा पर मेवा नहीं

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मुंबई सेंट्रल स्टेशन की उमस भरी गर्मी से निकलकर जब मैंने राजधानी एक्सप्रेस के एयर-कंडीशन्ड कोच में कदम रखा, तो ठंडी हवा ने थकान कुछ हल्की कर दी। बाहर धूप तप रही थी, भीतर शांति थी। ट्रेन अपनी मंज़िल की ओर बढ़ चली।

मेरे सामने की सीट पर एक बुजुर्ग दंपत्ति बैठे थे। उनकी वेशभूषा, भाषा और ठाठ-बाट से वे किसी बड़े पद पर आसीन व्यक्ति जैसे लग रहे थे। औपचारिक “हेलो-हाइ” के बाद सब अपने-अपने में व्यस्त हो गए।

सफर को सहज बना रहा था कोच का सेवादार—एक नौजवान लड़का। तौलिया, चादर, पानी, नाश्ता—हर चीज़ वह मुस्कुराते हुए लाता और वही वाक्य दोहराता—

“साहब, कुछ और चाहिए तो बता दीजिएगा।”

उसकी विनम्रता और तत्परता ने यात्रा को आरामदायक बना दिया।

सुबह दिल्ली पहुँचने से पहले वह लड़का हाथ में एक छोटी-सी ट्रे लेकर आया। यह एक मौन परंपरा थी—अच्छी सेवा के बदले छोटी-सी भेंट। मैंने ट्रे में कुछ रुपये रख दिए।

लेकिन जैसे ही वह उसी ट्रे के साथ उस ‘अमीर’ दंपत्ति के पास पहुँचा, उनका व्यवहार बदल गया।

“मेरे पास तो बस पाँच-पाँच सौ के नोट हैं, छोटा नोट नहीं है,”

बुजुर्ग ने नज़रें चुराते हुए कहा।

लड़का कुछ पल ठहरा, फिर फीकी मुस्कान के साथ आगे बढ़ गया। उसके जाते ही दंपत्ति फुसफुसाने लगे—

“रेलवे से मोटी तनख़्वाह मिलती है, फिर भी पैसे माँगते हैं!”

मैं भीतर तक सन्न रह गया। पूरी रात सेवा करने वाले उस लड़के की मेहनत क्या इतनी भी नहीं थी कि उसे सम्मान के दो शब्द या दस-बीस रुपये मिल सकें?

मुझे एक मित्र की बात याद आई—

“सेवादार को दी गई टिप पैसा नहीं, दुआ होती है।”

ट्रेन दिल्ली पहुँच गई, लेकिन एक सच्चाई मन में उतर गई—

बड़े पद और बड़ी हैसियत, ज़रूरी नहीं कि बड़ा दिल भी दें।

कभी-कभी बहुत बड़े लोग, दिल से बहुत छोटे होते हैं।


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