अतिथि देवो भव: बस तक का सफर
अतिथि देवो भव: बस तक का सफर
अतिथि देवो भव: बस तक का सफर
हमारे घर में एक कहावत केवल दीवारों पर टंगी नहीं रहती थी, बल्कि हमारे संस्कारों में रची-बसी थी—“अतिथि देवो भव।” माना जाता है कि जिस घर की चौखट पर मेहमान के कदम पड़ते हैं, वहाँ बरकत और सौभाग्य स्वयं दस्तक देते हैं।
राजू के घर में मेहमानों का स्वागत किसी उत्सव से कम नहीं होता था। घर के उस पुराने संदूक में खास मेहमानों के लिए नई चादरें, नरम कंबल और चमकती हुई क्रॉकरी सहेज कर रखी जाती थी। वह संदूक तभी खुलता, जब घर में किसी के आने की आहट होती।
राजू को मेहमानों का आना बहुत सुहाता था। उन दिनों घर की हवा ही बदल जाती। मम्मी-पापा के चेहरों पर एक अलग ही सौम्यता आ जाती, डाँट-फटकार की जगह प्यार ले लेता और रसोई से आती पकवानों की खुशबू पूरे घर को महका देतील
एक बार दूर के फूफा जी घर पधारे। सेवा-सत्कार में कोई कसर नहीं छोड़ी गई। गाँव के पास ही एक छोटा सा बस स्टॉप था, जहाँ से सुबह आठ बजे शहर की बस गुज़रती थी।
अगली सुबह फूफा जी विदा हुए, पर आधे घंटे बाद ही वापस लौट आए। ललाट पर हाथ मारते हुए बोले, "अरे भाई, मैं तो अपना बैग ही भूल गया!"
पापा के चेहरे पर ज़रा भी शिकन नहीं आई। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "कोई बात नहीं फूफा जी, यह तो खुशी की बात है। एक दिन और साथ बीत जाएगा। ठहरिए!"
अगले दिन फिर वही हुआ। फूफा जी गए और साढ़े आठ बजे फिर हाज़िर! इस बार बहाना था—"जल्दबाजी में घड़ी वहीं छोड़ दी।" पापा ने फिर बड़े चाव से उन्हें रोक लिया।
तीसरे दिन पापा ने राजू को पास बुलाया। उनकी आँखों में एक गंभीरता थी। उन्होंने राजू के हाथ में फूफा जी का झोला थमाया और कहा:
“राजू बेटा, मेहमान को कोई कष्ट नहीं होना चाहिए। आज तुम इनके साथ जाओ। इनका बैग भी उठाना और याद रखना—जब तक मेहमान बस में बैठकर ओझल न हो जाए, तब तक वापस मत आना।”
राजू ने पिता की आज्ञा का पालन किया। उसने फूफा जी को बस में बैठाया, हाथ हिलाकर विदा किया और फिर घर लौटा।
