होली की वह ठिठोली :जो बन गई गले की फांस
होली की वह ठिठोली :जो बन गई गले की फांस
होली की वह हँसी-ठिठोली, जो महँगी पड़ सकती थी
होली रंगों का त्योहार है—खुशियों का, उमंग का और बेफ़िक्री भरी हँसी-ठिठोली का। मुझे बचपन से ही यह पर्व बहुत प्रिय रहा है। वह एक-दूसरे को रंग लगाना, ठिठोली करना और खुलकर हँसना ज़िंदगी के सबसे खूबसूरत पलों में से एक होता है।
यह घटना मेरे यूनिवर्सिटी जीवन की है, उन हॉस्टल के दिनों की—जब ज़िंदगी बहुत हल्की लगती थी और हर शरारत मासूम जान पड़ती थी। उस वर्ष होली रविवार को थी। हम कुछ लड़कों ने जोश में आकर तय किया, “इस बार कुछ अलग करते हैं, ऐसी होली जो यादगार बन जाए!”
योजना और शरारत
चार-पाँच दोस्तों का एक गुट बना और तभी एक सुझाव आया— “क्यों न इस बार फैकल्टी बिल्डिंग की दीवारों पर छात्र-छात्राओं के लिए मज़ेदार 'टाइटल' लिखकर चिपका दिए जाएँ?” सुझाव सबको पसंद आया। फिर क्या था, काग़ज़-कलम हाथ में आई और तुकबंदियाँ गढ़ी जाने लगीं।
कुछ टाइटल ऐसे थे:
सोनाक्षी: “अरे सोनाक्षी! यह तूने क्या कर डाला, ब्यूटी क्वीन बनने के चक्कर में अपना करियर ही मुंडा डाला।”
इंदु: “फिरंगी छोकरी”
सेशु: “देखन को छोटे लगें, घाव करें गंभीर”
कुलदीप: “जहाँ देखे नज़र हुई, आँख मारे— न मारे तो कहलाए ब्रह्मचारी!”
एक दोस्त बाज़ार से ये सारे टाइटल टाइप करवा लाया और रात के सन्नाटे में हमने चुपचाप उन्हें फैकल्टी की दीवारों पर चिपका दिया।
सुबह का जश्न और शाम का संकट
अगली सुबह यूनिवर्सिटी का नज़ारा किसी मेले जैसा था। हर कोई उन टाइटल्स को पढ़-पढ़कर लोटपोट हो रहा था। क्लासरूम में भी चर्चा गर्म थी— “तेरे लिए क्या लिखा है?”, “अरे, मेरा वाला तो बहुत मज़ेदार है!” सब कुछ योजना के मुताबिक चल रहा था और हमें अंदाज़ा भी नहीं था कि यह हँसी-मज़ाक शाम तक मुसीबत बन जाएगा।
शाम होते-होते माहौल अचानक बदल गया। कुछ लड़कियों ने इस पर एतराज़ जताया और लिखित शिकायत सीधे डीन को सौंप दी। बाद में पता चला कि लड़कों का एक दूसरा ग्रुप, जो हमसे खुन्नस रखता था, उसी ने आग में घी डालने का काम किया था। उन्होंने तुलना शुरू कर दी कि किसके लिए टाइटल 'चटपटे' हैं और किसके लिए 'हल्के'। मामला तुरंत डिसिप्लिनरी कमेटी तक पहुँच गया।
वह खौफनाक रात
तय हुआ कि उसी रात हॉस्टल में रेड होगी। मैं फैकल्टी से गुज़र रहा था कि लड़कियों की आवाज़ कानों में पड़ी— “अब रेड पड़ेगी, तो सब पता चल ही जाएगा।” मैं फौरन समझ गया कि संकट बड़ा है। मैंने तुरंत दोस्तों को सतर्क किया। आनन-फानन में सबूत मिटाए गए—काग़ज़ गायब किए गए और यहाँ तक कि वह टाइपराइटर भी वहाँ से हटवा दिया गया।
डर अपने चरम पर था क्योंकि शिकायत में साफ़ लिखा था कि शक हॉस्टल के लड़कों पर ही है। हम एम.एससी. के छात्र थे और बाहर से आए थे। हमारे एक स्थानीय साथी बृज किशोर ने साफ़ कह दिया था— “अगर शक पुख्ता हुआ, तो सीधे यूनिवर्सिटी से बाहर का रास्ता देखना पड़ेगा।”
रात के करीब 12 बजे तीन-चार प्रोफेसर हॉस्टल पहुँचे। कमरों की सघन तलाशी ली गई। एक प्रोफेसर ने सख़्त लहजे में कहा, “शिकायत गंभीर है, साबित हुई तो कड़ी कार्रवाई होगी।” रात के 2 बजे तक पूछताछ चलती रही। ठोस सबूत न मिलने के कारण फिलहाल मामला टल गया, लेकिन चेतावनी दी गई कि सुबह फिर से इस पर बात होगी। उस रात हॉस्टल में कोई सो नहीं पाया; हर आहट पर लगता था कि अब बुलावा आएगा।
समाधान और सीख
अगली सुबह माहौल में तनाव के साथ-साथ एक थकान भी थी। कुछ लड़कों ने हिम्मत जुटाई और सीधे उन लड़कियों से बात की जिन्होंने शिकायत की थी। यहीं वह मोड़ आया जिसने हमें बचा लिया।
लड़कियों ने कहा— “आप तो हमारे अपने ही साथी हैं। होली में हँसी-मज़ाक चलता है और हमें ये टाइटल बुरे भी नहीं लगे थे, कई तो वाकई मज़ेदार थे। लेकिन दूसरे ग्रुप ने हमें यह कहकर उकसाया कि आपके लिए शब्द हल्के इस्तेमाल हुए हैं। हमारा मक़सद किसी को नुकसान पहुँचाना नहीं था।”
जब प्रोफेसरों को समझ आया कि यह सब किसी दुर्भावना से नहीं बल्कि नासमझी और बाहरी उकसावे के कारण हुआ, तो उन्होंने नरम रुख अपनाया। मामला धीरे-धीरे ठंडा पड़ गया।
आज भी जब उस रात की दहशत याद आती है, तो मन सिहर उठता है। होली की वह हँसी-ठिठोली कितनी महँगी पड़ सकती थी! उस दिन मैंने सीखा कि मज़ाक की भी एक सीमा होती है। हँसी तभी तक सुंदर है, जब वह ज़िम्मेदारी और समझदारी के रंग में रंगी हो। एक पल की नासमझी पूरी ज़िंदगी की दिशा बदल सकती थी।
