बचपन में मेले में जादूगर का खेल
बचपन में मेले में जादूगर का खेल
Sent for publication
पहली बार जब मैंने जादू का खेल देखा था, तब शायद मैं आठवीं कक्षा में पढ़ता था।
ज़िला स्तर का मेला लगा हुआ था—नदी के किनारे खुले मैदान में।
मेला साल में सिर्फ़ एक बार आता था, और उसके आने का अपना ही उत्साह होता था।
लोग मेले में अकेले नहीं जाते थे।
झुंड बनाकर, समूहों में, गाते-बजाते जाते थे।
ऐसा लगता था जैसे पूरा इलाक़ा उस एक दिन के लिए घरों से बाहर निकल आया हो।
मैं भी अपने दोस्तों के साथ मेला देखने गया था।
चारों ओर दुकानें सजी थीं—कहीं मिट्टी के खिलौने, कहीं चूड़ियाँ, कहीं मिठाइयाँ।
एक तरफ़ कृषि प्रदर्शनी लगी थी, दूसरी ओर बड़े-बड़े झूले घूम रहे थे।
कहीं सर्कस का तंबू तना हुआ था।
घूमते-घूमते मैं थोड़ा थक भी गया था,
तभी मेरी नज़र एक जगह ठहर गई।
चारों तरफ़ लोगों की भीड़ लगी हुई थी।
बीच में एक आदमी डुगडुगी बजा रहा था और ऊँची आवाज़ में कुछ बोल रहा था।
उसके साथ एक छोटा-सा लड़का था—शायद उसका सहायक।
वही था मेरा पहला जादूगर।
उसका पहनावा बड़ा अजीब और रहस्यमय था—
एक हाथ में छड़ी, दूसरे में डुगडुगी,
और सिर पर काली टोपी।
मुझे वह बड़ा प्रभावशाली लगा।
वह तरह-तरह के जादू दिखा रहा था।
मेरे आश्चर्य की कोई सीमा नहीं थी।
मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था—
यह सब हो कैसे रहा है?
उसने भीड़ में से एक लड़के को बुलाया।
एक बक्सा दिखाते हुए बोला—
“देखो, इसमें कुछ है क्या?”
लड़के ने झाँककर कहा—
“कुछ नहीं।”
जादूगर मुस्कुराया,
हाथ बक्से में डाला—
और बाहर एक खरगोश निकाल लिया।
तालियों की ज़ोरदार गड़गड़ाहट गूँज उठी।
फिर उसने उसी लड़के से पूछा—
“मिठाई खाओगे?”
लड़का पहले शरमाया, फिर हाँ कर दी।
जादूगर ने हवा में हाथ लहराया—
और उसके हाथ में गुलाब जामुन आ गया।
अब तो मैं पूरी तरह मंत्रमुग्ध हो चुका था।
फिर उसने भीड़ में से एक आदमी को बुलाया और कहा—
“अपनी घड़ी दीजिए।”
घड़ी उसने जादू के बक्से में डाली।
दोबारा हाथ डाला—
बक्सा खाली!
वह आदमी घबरा गया।
जादूगर बोला—
“डरिए मत।”
उसने आदमी को दो कदम आगे बढ़ाया,
एक और बक्सा खोला—
और घड़ी वहीं रखी मिली।
फिर तालियाँ।
बीच-बीच में डुगडुगी बजती,
कभी बांसुरी की धुन निकलती।
इसके बाद उसने अपने छोटे सहायक की आँखों पर पट्टी बाँधी।
लोगों से सवाल पूछे—
और वह लड़का बिना देखे बता देता कि
कौन किस रंग के कपड़े पहने है।
अब असली खेल बाकी था।
अचानक छोटा सहायक बोला—
“मुझे इस अंकल के पेट में घुसना है!”
भीड़ में हँसी फैल गई।
जादूगर बोला—
“यह लड़का बहुत शरारती है।
अब इसे हम जादू से गायब करेंगे।”
उसने लड़के को एक बक्से में बैठाया।
ऊपर कपड़ा डाल दिया।
कपड़ा हटाया—
लड़का अंदर।
यह उसने तीन-चार बार किया।
फिर वह ज़ोर से बोला—
“अब ध्यान से देखिए।
यह बंगाल का जादू है।
यह मैंने अपने गुरु से सीखा है।”
उसने चेतावनी दी—
“कोई अपनी जगह से हिलेगा नहीं।
ज़रा-सी गलती हुई,
तो लड़के की जान को ख़तरा हो सकता है।”
भीड़ सन्नाटे में आ गई।
अचानक उसने कपड़ा खींचा—
बक्सा खाली था।
लड़का गायब!
उसने कपड़ा चारों ओर घुमा-घुमाकर दिखाया—
कहीं नहीं।
फिर वह चाकू निकालता है,
ऐसा दिखाता है जैसे चाकू लड़के को लग गया हो।
जादूगर बोला—
“किसी ने अपनी जगह छोड़ी है।
अब लड़के की जान बचाने के लिए
आप सब एक-एक रुपया दीजिए।”
लोग घबराकर पैसे देने लगे।
जादूगर की डुगडुगी फिर बजने लगी—इस बार उसकी आवाज़ में जादू कम, हड़बड़ी ज़्यादा थी।
उसका सहायक लड़का पैसे समेटता रहा।
कुछ ही देर में जादूगर ने एक बार फिर कपड़ा लहराया—
और वही लड़का, हँसता हुआ, भीड़ के पीछे से निकल आया।
भीड़ ने राहत की साँस ली।
तालियाँ फिर बजीं।
लेकिन मेरे भीतर कुछ बदल चुका था।
पहली बार मैंने जादू के साथ-साथ
डर भी महसूस किया था—
और शायद पहली बार यह भी समझ आया था कि
हर जादू सिर्फ़ चमत्कार नहीं होता,
कुछ जादू पेट भरने का हुनर भी होते हैं।
फिर भी,
उस शाम जो विस्मय, जो रोमांच
मेरी आँखों और मन में उतर गया था—
वह आनंद
ज़िंदगी में फिर कभी वैसा लौटकर नहीं आया।
शायद इसलिए कि
बचपन में जादू सच लगता है,
और बड़े होने पर
हम सच में भी जादू ढूँढते रह जाते हैं।
