बॉस के साथ सौदा और महँगा सबक
बॉस के साथ सौदा और महँगा सबक
रामप्रकाश अपनी छुट्टियों का आनंद ले रहा था। उसी दौरान उसका मित्र मदन मोहन सक्सेना उसके घर आ गया। चाय-नाश्ते के बाद दोनों बातचीत में डूब गए।
कुछ देर बाद सक्सेना बोला,
“अरे यार, अपने जो सीनियर ऑफिसर गुप्ता जी हैं न—जो मेन कॉलोनी में रहते हैं—वो बहुत सस्ते दामों पर अपना सामान दे रहे हैं। बहुत लोग उनसे ले भी रहे हैं। मैंने उनसे पूछा कि आप क्या दे रहे हैं, तो बोले—अलमारी दे दूँगा।”
रामप्रकाश ने संकोच से कहा,
“इतने बड़े सीनियर ऑफिसर से दाम पूछना थोड़ा अटपटा नहीं लगता? वैसे भी वो सस्ते में दे ही रहे हैं।”
सक्सेना हँसते हुए बोला,
“अरे यार, कौड़ियों के भाव मिल रहा है। लेने में क्या बुराई है? बहती गंगा में हाथ धो लो। ऐसे मौके बार-बार नहीं आते।”
रामप्रकाश ने पूछा,
“लेकिन बेच क्यों रहे हैं?”
“अरे यार,” सक्सेना बोला,
“नया सामान लेना है, नया फर्नीचर आएगा। बेटे भी नौकरी में लग गए हैं। समझ लो अपग्रेडेशन या रेनोवेशन चल रहा है।”
फिर सक्सेना ने ज़ोर देते हुए कहा,
“तुम भी कुछ ले लो यार। स्टूल वगैरह बाजार में सौ रुपये से कम का नहीं मिलता। गुप्ता जी से तो बीस-पच्चीस में मिल जाएगा, हो सकता है पंद्रह में ही दे दें।”
रामप्रकाश ने साफ शब्दों में कहा,
“देखो यार, मेरा एक उसूल है। जो हमारे बॉस हैं, उनसे खुलकर मोलभाव नहीं कर सकता। मैं तो इन पचड़ों से दूर ही रहूँगा। तुम्हें जो करना है, करो।”
सक्सेना हँसकर बोला,
“जैसी तुम्हारी मर्जी। तुम तो पूरे बुद्धू जी निकले।”
करीब एक महीने बाद ऑफिस में सक्सेना दूसरे लोगों से बात कर रहा था। उसका स्वर बदला हुआ था—
“अरे यार, गुप्ता जी ने तो हमें लूट लिया। जो भी मोलभाव करने गया, उससे बोले—ले जाओ न यार, पैसे कहीं भागे जा रहे हैं क्या?।
एक महीने बाद जब लोग पैसे पूछने लगे, तो गुप्ता जी टालने लगे।
स्टूल वाले से कहा—
“अरे यार, क्या नब्बे रुपये दूँ? "
दूसरे साथी ने कहा 20 साल पुराना स्टूल। मार्केट में ₹100 का बढ़िया नया स्टूल मिलता है
अलमारी वाले से बोले—
“दो हजार काफी हैं।”
जबकि बाजार में ढाई हजार में नई अलमारी मिल जाती थी।
सक्सेना ने उस अलमारी पर हजार रुपये का पेंट करवा दिया था ताकि वह नई जैसी लगे। अब वह सिर पकड़कर बैठा था, माथा पीट रहा था।
और उधर रामप्रकाश—
अपने निर्णय और अपनी परिपक्वता पर मन ही मन संतोष से मुस्कुरा रहा था।
