बुढ़ापे की सनक
बुढ़ापे की सनक
"जय माता दी"
सर्व मगंल मांग्लये शिवे सर्वार्थसाधिके
शरण्ये त्रयंम्बके गौरी नारायणी नमो स्तुतेl
दादी दुर्गा सप्शती पढ़ती जा रही थी बीच बीच में गुहार लगाती "बहुरिया देखो तुमरा लल्ला बार बार प्रसाद ले ले भाग राl पकड़ो भई इसको"कह कर उसी में से एक बतासा पकड़ा भी दे रही थी l
फिर जोर जोर से मन्त्र शुरू
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजंतो:!
स्वस्थै: स्मृतामतीव शुभां ददासि!
मै उन्हे देख रहा था और सोच रहा था कि पता नहीं नानी जो पढ़ रही है उसका मतलब भी समझती है कि नहीं ।
नानी हमेशा ही नवरात्रो में सारे व्रत करती थी । मै मामा मामी के पास रह कर ही पढ़ रहा था मै उन्हे अक्सर चिढ़ाता रहता था। वो मुझे झिड़क दिया करती थी दो मामा के बेटे और एक मै कभी कभी वो परेशान होकर कहती
"जे तीनो मौढ़ा मिलकर हमका पागल बना देत है।"
नानी ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी मगर दुर्गा सप्तशती के श्लोक दोहराती तो लगता साक्षात सरस्वती जी ही जिह्वा पर सवार हो गई है । गुड़हल का फूल चढ़ा कर जब वो जय अम्बे गौरी आरती गाती तो हम तीनो भी आकर खड़े हो जाते प्रसाद के लालच में उनके हाथ के बने गरी के लडडु और केले का प्रसाद अमृत से कम नहीं होता।
मैं उन्हे चिढ़ा कर कहता नानी तुमने क्या मांगा भगवान से
"कुछ नहीं बचवा एक मौढ़ी मांग रही थी घर में रौनक तो मौढ़िन से होत है, मौढ़न तो गदर ही उतारत है जब्ब देखो "
"नानी तुम ये पढ़ती हो इसका मतलब भी जानती हो "?
"नाय बिटुवा मतलब फतलब हम नहीं जानित है बस इतना हय कि शक्ति बहुत देति है तबहि तो हम हर साल छ: महीना में बीमार पढकर फिर भले चंगे होई जाते है।"
मेरे कानो में अब भी गूंज रही थी lरूपं देहि जयं देहि यशो देहि दिव्षो जहि ऊँ जयन्ति मगंला काली भद्र काली कापालिनी l
