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V. Aaradhyaa

Romance

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V. Aaradhyaa

Romance

बस आँखों से समर्पण

बस आँखों से समर्पण

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कुछ पल जीवन की अनमोल थाती बन जाते हैं और उन लम्हों में जो खुद पर गुजर रहा होता है वह एहसास होता है इतना खास कि उसकी मिठास पूरी ज़िन्दगी बनी रहती है।

श्रवण... हाँ श्रवण ही तो...!

मेरे लिए एक ऐसा नाम जो मेरे मन में जलतरंग बजा देता है। मुझे उम्र की तीसरे दशक में भी पंद्रह साल की चुलबुली, खुद पर इतराती हुई मृणालिनी बना देता है।

वैसे मेरा नाम मृणालिनी चाहे कितना भी खूबसूरत और पोएटिक (साहित्यिक) क्यों ना हो, शायद ही कोई मेरा पूरा नाम लेकर पुकारता है। पहचान पत्र और हाज़िरी के रज़िस्टर के अलावा और कहीं तो सुना नहीं अपना नाम। कोई मीनू तो कोई मृणाल तो कोई मनी पुकारते रहे हैं। एक श्रवण ही तो था जो मुझे मेरे पूरे नाम से पुकारता था।

कैशोर्य के पहले प्रेम की अनुभूति मुझे श्रवण से ही तो हुई थी।

आज भी याद है मुझे उसकी वह नज़र और अनकहे आँखों से बहुत कुछ कह जाने का ऐसा दिलकश अंदाज़ कि माँ से ज़िद करके चोटी बनवानेवाली मिन्नी अचानक से अपने काले लम्बे बालों को खुला रखने लगी थी और तेल लगाना तो दूर अब रबर बैंड भी नहीं लगाती थी क्योंकि उसे.... अरे मेरे उस श्रवण को मेरे काले लम्बे रेशमी बाल बहुत पसंद थे।

हुआ ये कि उस दिन दादी और माँ ने दशहरे की पूजा के समय नवमी को कंजक रखा था। प्रसाद का सारा सामान आ गया था सिर्फ कन्या पूजन के बाद लड़कियों को दिए जाने वाले दुपट्टों में एक कम पड़ रहा था। माँ ने अपनी अलमारी से एक सुंदर सी लाल रंग की ओढ़नी निकाली थी। उसे देखकर ना जाने मेरे मन में क्या आया कि मैंने उसे ओढ़ लिया। पूजा थी घर में, सो सुबह सुबह ही बाल तो धोये ही थे।

मुझे देखकर ताऊजी की बेटी सुमली दीदी ने बहुत प्यार से मेरा गाल थपथपाते हुए कहा था,

"आज तो हमारी मिन्नी एकदम दुल्हनियाँ लग रही है!"

दीदी की बात पर मैं शरमा गई और उन्हें कुछ बोलने के लिए मुँह खोला ही था कि उसे अपनी ओर एकटक देखता हुआ पाकर शर्म से आँखें देर तक दुबारा नहीं उठी।

पापा के दोस्त का बेटा था श्रवण और कुरुक्षेत्र में इंजिनियरिंग प्रथम वर्ष की पढ़ाई कर रहा था। कभी एयरफ़ोर्स की ट्रेनिंग के दौरान मेरे पापा अशोक जाखड़ और उसके पापा लालसिंह चौधरी की पक्की दोस्ती थी। अब उसके पापा ट्रांसफर होकर कुछ दिनों पहले ही अम्बाला आए थे। आज पूजा थी इसलिए माँ ने लालसिंह अंकल को सपरिवार आमंत्रित किया था।

मुझे इतना कुछ तो बाद में पता चला। उस वक़्त जो मुझे पता चला वो ये कि...

उसके भर नज़र देखने से मेरे दिल की धड़कनें बहुत तेज़ हो गई थी और कुछ था जो बेहद मीठा सा एहसास था। उसके देखने से शिकायत भी थी और उसका देखना दिल को बड़ा भा रहा था।

श्रवण भी कहाँ कम था। उसकी नज़रें भी तो बागी हो गई थी मुझे देखकर।उस वक़्त उसके हाथ में प्रसाद बनाने वाली बड़ी कलछी थी जो वह आँगन में प्रसाद भूनने के लिए मेरे बड़े भैया अमृत जाखड़ को देने जा रहा था। मुझे देखने के बाद उसकी मुझ पर अटकी नज़र तब हटी ज़ब भैया ने पीछे से उसकी पीठ पर कसकर धौल जमाते हुए कहा था,


"क्यों रे श्रवण कुमार, मैंने तुझे रसोई से कलछी लाने कहा था और तू कहीं बाजार तो नहीं चला गया कलछी खरीदने!"

भैया की बात सुनकर वह झेँपते हुए उनके साथ प्रसाद बनाने चला तो गया पर मुझ मासूम का नन्हा सा दिल भी अपने सँग ले गया।

बहरहाल... पहली मुलाक़ात में (आँखों की आँखों से मुलाक़ात) में इतना तो समझ आ गया कि उसका नाम श्रवण है। और उसके पापा मेरे पापा दोस्त हैं। इसके अलावा भैया भी उसे जानते हैं। इन सबसे ऊपर जो बात पता चली वह ये कि... उसकी आँखों में मेरे लिए कुछ था जो यह बता रहा था कि कल को हम भी बेहद करीबी दोस्त बन सकते हैं।

खैर...उस दिन कभी कन्याओं के पैर धुलवाते हुए तो कभी उन्हें खाना परोसते हुए कई बार कभी मेरी उंगलियां तो कभी बाल तो कभी... दिल की धक धक श्रवण से टकराते रहे और जो लड़की घर के काम से सौ कोस दूर भागती थी वह आगे बढ़ चढ़कर घर का काम करती रही।

पहले प्यार का पहला एहसास था ये, कोई मज़ाक़ थोड़े ना था।

यह नज़रों का खेल, जान बूझकर आगे पीछे डोलना आदि और देर तक चलता पर तब तक दिन का तीसरा पहर शुरु हो गया था। देवी पूजन के बाद कंजक के लिए आई लड़कियाँ जा चुकी थीं। अब घरवालों के खाने की बारी थी।

हमारे घर में दादी ने एक अजीब रिवाज़ बना रखा था कि त्योहारों पर प्रसाद बनाने, मंदिर साफ करने, पूजा के बर्तन धुलने आदि का काम पुरुष ही किया करते थे। माँ बताती हैं, जब वो ब्याहकर आईं तो दादी के डांट के डर से उन्होंने उन्हें बताया नहीं कि वह मासिक धर्म के उन चार दिनों से गुजर रही हैं और उन्होंने मंदिर की सफाई, पूजा बर्तन कर दिए थे। सिर्फ प्रसाद बनाने की बारी में उनसे नहीं रहा गया तब उन्होंने दादी को बताया था। दादी गुस्सा तो बहुत हुईं पर तबसे त्यौहार पर मंदिर सफाई से प्रसाद बनाने तक का सारा काम यथासम्भव घर के पुरुष ही किया करते थे। हमारी परम पूज्या दादी श्री का यह मानना था कि पुरुष हमेशा शुद्ध होते हैं। मुझे आज भी इस बात पर हँसी आती है। उसी परम्परा के तहत उस दिन श्रवण को भी हमारे घर में इतना काम करना पड़ गया था।

अब सबके जाने के बात खाने के लिए पहले पुरुषों की पंगत लगी थी। मैं बार बार कभी गर्म पूरी लाने तो कभी हलवे की परात रखने रसोई में आ जा रही थी कि तभी मैंने सुना, बड़ी बुआ मुझे डाँटते हुए कह रही थीं,

"अरे मिन्नी, बाल तो बाँध ले। यूँ खुले बालों में परोसते हुए किसीकी थाल में जो बाल गिर गए तो...?"

मैं अपने लम्बे रेशमी बालों को जुड़े की शक्ल में लपेटने ही वाली थी कि तभी मेरी नज़र टकराई उससे।

हाय... कैसा बेशर्म होकर ताक रहा था मुझे।

श्रवण के चेहरे के भाव से साफ लग रहा था कि उसे मेरा बाल बांधना बिल्कुल पसंद नहीं आया।

पर... उस वक़्त मुझे उसके चेहरे पर अपने लिए ऐसा भाव देखना बेहद पसंद आया था।दिल तो यूँ धड़क रहा था जैसे उचलकर एकदम बाहर आ जायेगा।

किसी तरह खुद को संभाला होगा मैंने उस परले उम्र में...? आज सोचती हूँ तो लगता है मेरा एक किशोरी से नवयौवना बनने का वो पल आज भी हमारे पुश्तैनी घर के आँगन में छूट रहा हो शायद। कि अब भी श्रवण मुझे अपलक देखते हुए भैया से डांट खा रहा होगा ज़ब गलती से उसने गर्म गर्म दाल की कलछी भैया की थाली में डालने की बजाए उनके पैर पर गिरा गया था, और उसे ऐसी हालत में देखकर जोर से हँस पड़ी थी वह अल्हड़ किशोरी, जो श्रवण के प्रेम पगे नयनों में बिंधकर प्रतिपल एक युवती में बदलती जा रही थी।


बहरहाल...सब काम से फ़ारिग होकर हम सब जब बैठक में बैठे तब सिमुली दीदी ने हम सबका औपचारिक परिचय करवाया था। जैसे यह हैं लाल सिंह अंकल के बेटे श्रवणकुमार.... फलां जगह में फलां पढ़ रहे हैं वगैरह वगैरह।

पर... इधर दिल से जो दिल का परिचय हो चुका था वह बात सिर्फ मुझे और श्रवण को ही तो पता थी।

जाने से पहले वह बेसिन की बज़ाए आँगन में लगे नल पर हाथ धोने आया जहाँ खाट पर बैठकऱ मैं और सिमुली दीदी बतिया रहे थे।

"एक बार अपने सुन्दर रेशमी बाल खोलकर तो दिखा दो मृणालिनी! तुम्हारे बाल बड़े खूबसूरत हैं। अपने बाल हमेशा संभालकर रखना!"


ये मेरी ज़िन्दगी के प्रथम पुरुष का पहला मौखिक संवाद था मुझसे।

मैंने सुना... पौरुष से भूषित वह आवाज़ जिसमें एक विनय था, एक अधिकार और भी कुछ था जो उस वक़्त इस बेवकूफ मृणालिनी को समझ नहीं आया था।


जो कोलेज़ में हिंदी साहित्य के जटिलतम कहानी को पढ़ाते हुए अंतिमा मैम ने समझाया था कि पुरुष जिस स्त्री के हृदय में अपने लिए प्रेम और सम्मान देखते हैं वहाँ बहुत विनम्र हो जाते हैं। फिर उनमें पुरुष होने का दम्भ नहीं रह जाता। उस दिन ऐसा ही कुछ था श्रवण की आवाज़ में कि मृणालिनी ने अपना प्रथम प्रेम और अपना हृदय भी समर्पित कर दिया था।


अब तक आँखों से बहुत बोल चुके थे हम दोनों।


मैंने आपलोगों को पहले ही बताया था ना कि पूरी दुनिया में एक यही शख्स है जो मेरा पूरा नाम लेता है।

उस वक़्त तो मन में ऐसी चूल मची कि पूछूँ, सिर्फ मेरे बाल खूबसूरत हैं, मैं नहीं!

पर... तभी क्या जानती थी कि अगले कुछ सालों में यह लड़का मेरी तारीफ़ में नख शिख से लेकर मेरी आवाज़ की तारीफ़ कर करके मुझमें वो क्या कहते हैं... सुपीरियरिटी काम्प्लेक्स भर देगा।

नवीँ में पढ़ने वाली मिन्नी अपने प्रिय के आँखों के स्पर्श से एकदम से स्त्री सुलभ लज़्ज़ा से भर उठी थी।


उधर श्रवण और भैया की दोस्ती गहरी हो रही थी और इधर मैं और श्रवण एक दूसरे की तरफ खींचे ही चले जा रहे थे। भैया की लाडली थी मैं और उनका गुरुर भी।


बाद को हमारा प्यार जब परवान चढ़ा तब सबसे ज़्यादा विरोध भैया की तरफ से ही हुआ था।

बड़े दुख और क्षोभ से उन्होंने श्रवण को एक बात कही थी। जिस वजह से श्रवण ने मेरी ओर को बढ़ते कदम पीछे कर लिए थे।

छुट्टियों में जब भी आता श्रवण हम छुप छुपकर मिलते। मैं कॉलेज के प्रथम वर्ष में थी जब भैया ने बाजार में हमें साथ में चाट खाते हुए और एक दूसरे को गोलगप्पा खिलाते हुए देख लिया था।

घर आकर मुझे तो जो कहा सो कहा,श्रवण के लिए उनका एक वाक्य इतना वजनी हो गया जिसने हमारे रिश्ते को भी हल्का होने से बचा लिया।

"श्रवण! मैंने तुझे फ्री होकर घर आने दिया और अपने घर की इज़्ज़त मिन्नी से भी इसलिए घुलने मिलने दिया क्योंकि मुझे तुझ पर पूरा विश्वास था और मुझे लगता था कि मेरी बहन को तु भी बहन की नज़र से देखता होगा। पर आज तुने मेरे विश्वास को तो चोट पहुँचाई ही है साथ ही मेरी दोस्ती को भी शर्मिंदा किया है!"

कम शब्दों में इतनी गहरी बात....?

एक एक शब्द का वज़न इतना भारी था कि अगले ही दिन श्रवण ने कॉलेज में आकर मुझे भैया की बात बताते हुए भर्राए हुए गले से कहा था...

"मृणालिनी, मैं एक दोस्त के विश्वास को और ठेस नहीं पहुँचा सकता और ना ही एक भाई बहन के बीच दरार ला सकता हूँ। अब हम कभी एक दूसरे को उस नज़र से नहीं देखेंगे। बेहतर है कि हम कभी ना मिलें।


हाँ... प्यार मैं तुम्हें पूरी ज़िन्दगी करता रहूँगा!" 


बोलकर चला गया था वो। आगे भी जब कभी छुट्टियों में आता हमसे मिले बिना वापस चला जाता।

उस दिन अगर भैया श्रवण से झगड़ा करते, गाली गलौज करते तब शायद मैं और श्रवण बगावत कर सकते थे पर... बात किसी के विश्वास को क़ायम रखने की थी। लिहाज़ा हम अलग हो गए थे पर सिर्फ ऊपर से।

प्रेम तो ऐसा सबक है जिसे आँखों से पढ़ा जाता है और दिल चुपके से याद कर लेता है। सच्चे प्रेम में शरीर की भूमिका किंचित गौण रहती है और भावनाएँ मुखर हो जाती हैं। प्रेम में सबसे पहले तो ह्रदय समर्पित होता है और ह्रदय को हृदय से जोड़ने में बहुधा अपने प्रिय को स्पर्श करने की ज़रूरत नहीं होती।


*समर्पण सिर्फ छुअन में कहाँ होती है भला*


प्रेम के लिए तो एक दूसरे को मन से अपनाना ही समर्पण है।


श्रवण ने भी तो मेरे हृदय को स्पर्श किया था और मेरी भावनाओं को छुआ था। तभी तो उसकी वागदत्ता बनकर रह गई मैं।


सांसारिक नियम को निभाते हुए विवाह और पत्नी धर्म निभाने में कभी पीछे नहीं रही मैं। पर... मेरे हृदय का एक नन्हा सा कोना जहाँ मिसेज सो एंड सो नहीं रहती, ना रहती है सोनू और मोनू की मम्मी। बल्कि वहाँ आज भी एक मीठे से पल में बिंधकर रहती है... "मृणालिनी"


कहीं पढ़ा था... देश, समय, युग, काल से परे होता है प्रेम ...और प्रथम प्रेम बेहद खास होता है जो चुपके से अपनी उम्र जीता है। ऐसा निस्वार्थ प्रेम कभी किसीको नुकसान नहीं पहुँचाता बल्कि मन में जीवन के प्रति उमंग और उत्सुकता बनाए रखता है।


पता नहीं... श्रवण कहाँ है अब? उसे मैं याद हूँ भी या नहीं। उससे आज की मृणालिनी को कोई फर्क नहीं पड़ता। जिसने प्रेम को एकबार महसूस कर लिया हो वो अपने आप में पूरा हो जाता है। ना तो प्रेम में मैं राधा बनी ना मीरा। मैंने बस अपने प्रथम प्रेम को अपने जीवन का सबसे "अनमोल पल" बनाकर संजोकर हृदय के एक कोने में रख दिया है।और...मेरे दिल के उसी कोने में मीठी याद और पहले प्यार का एहसास बनकर श्रवण आज भी रहता है।

तभी तो चाहे कितने ही नए फैशन आए, बालों के कई कट मेरे मन को भाए पर आज भी मैं अपने लम्बे बाल नहीं कटवाती। कई बार कोशिश भी की तो लगा श्रवण ने अपनी आँखों से इशारे से मना कर दिया हो...

"मृणालिनी, तुम बाल मत कटवाओ प्लीज"

यही वो पल है जब दो हृदय मिले थे और यही तो वो पल है जो मैं नहीं भूल पाती।

(समाप्त)

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