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Sarita Maurya

Crime


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Sarita Maurya

Crime


‘‘बोल गुड़िया बोल’’

‘‘बोल गुड़िया बोल’’

7 mins 200 7 mins 200

सब कहते थे कि वह बड़ी जिद्दी थी, किसी की सुनती ही नहीं थी। उसे भी लगता था कि कोई उसकी बात नहीं मानता, इसलिये तो उसे अपनी बात मनवाने के लिए ज़िद करनी पड़ती थी। जाने क्यूं बचपन से इतनी विरोधी स्वभाव की हो गई थी। पापा का चेहरा देखते ही जैसे उसकी आंखों से शोले निकलने लगते थे। उसे खुद भी नहीं पता था कि ऐसी क्या वजह थी कि वह आधे समय से ज्यादा आंखों में तैरते शोले लिये दुनिया की नज़रों का कांटा बनती जा रही थी। कभी-कभी पापा को कहते सुना करती कि ‘5 साल की उमर में इस लड़की के इतने तीखे तेवर हैं तो बड़ी होकर नाक ही कटायेगी। लेकिन अकेले में उसका खूब चुंबन लेते, कभी पेट में गुदगुदी करते और प्यार करते। कभी उसके भाइयों के साथ भी खेलने में उसे कोई खास लगाव नहीं था। हां, मां के पास जाने कौन सा खजाना उसे नज़र आता कि आते जाते-उन्ही के पास चिपकी रहती। 

शाम होते ही उसकी चिढ़ दहशत में बदल जाती थी क्योंकि पापा के घर पर रहने का मतलब था मम्मी को झन्नाटेदार थप्पड़ और मार-पिटाई का एक ऐसा सिलसिला जो मामीजी के बीच में पड़ने पर ही समाप्त हो पाता था। एक बार तो पापा ने नशे में गिलास उठाकर मम्मी को दे मारा। हमेशा पापा से दूर रहने वाली नताशा ने उस दिन पापा के पैर पर काट खाया था। मम्मी को छुड़ाने के लिए इतनी जोर से चिपटी कि पापा जोर से चिल्लाये ‘छोड़ हरामजादी जोंक’! ये शायद उसके ज़हन में याद पापा की दी हुई पहली गाली थी जिसे वह कभी भी नहीं भूली।

समय बीत रहा था, और अब अक्सर यहां आने वाली मामीजी उन्हीं के घर में नियमित रूप से रहने लगी थीं। मामा खुद कई बार आकर लिवाने की बात करते तो वे बतातीं कि मम्मी की तबियत अभी ठीक नहीं थी ऐसे में बच्चों की देखभाल कौन करेगा। मम्मी भी अक्सर यहां-वहां अर्द्धविक्षिप्त सी बैठी रहतीं। लेकिन न जाने क्यों रसोई में जैसे खुद को बड़ा सुरक्षित पातीं, चाहे खाना बन चुका हो तो भी उनका काम खत्म नहीं होता था। शाम के खाने के साथ सुबह की तैयारी और सुबह के समय दोपहर की। यहां तक कि कई बार मामीजी हंसते हुए मम्मी से कहतीं कि रसोई उनकी सहेली बन गई थी। मम्मी को मुस्कुराने के सिवा कभी जवाब देते नहीं देख पाई थी। हां गाहे-बगाहे उसे ज़रूर समझातीं -देख बेटा बड़ी हो रही है ज्यादा नहीं बोलना, गुस्सा कम किया कर, घर की कोई बात बाहर नहीं करते, कमरे में भी इतनी तेज मत बोलो कि आवाज़ किसी बाहरवाले को सुनाई दे।

वह छोटी सी जिद्दी बच्ची धीरे-धीरे यह समझने लग गई थी कि उनके घर खर्च के पैसे मामीजी के पास रहने लगे थे। मम्मी की साड़ियां सूती तो मामीजी की चटक और महंगी होने लगी थीं। इसी बीच खबर आई कि मामाजी नहीं रहे। अब मामीजी की देखभाल करने वाला कोई नहीं बचा था तो पापा उन्हें अपने साथ ले आये, हमेशा के लिए। चटक रंगों ने हलके रंगों की जगह ले ली थी। रसोई में मां का समय और बढ़ गया था तो पिताजी का टूर से घर पर जल्दी -जल्दी आना भी। उसे समझ ही नहीं आता था कि मां अपने घर की जिम्मेदारी खुद क्यों नहीं सम्हालती थी। न तो उसे मामीजी का घर में रहना पसंद था और न ही मां का चुप रहकर हर उस बात को स्वीकार करना जो मामीजी उन्हें कहतीं। बड़े भैया शादी के बाद ही अपनी पत्नी को लेकर अलग रहने चले गये तो छोटे भैया बाहर पढ़ाई करने के लिए। अब नियमित रूप से घर में तीन ही सदस्य रहते-मम्मी, मामी और बड़ी होती जिद्दी बच्ची। 


उसका मन क्रोध से भर उठता जब मम्मी उसे चुप रहने के लिए कहतीं लेकिन वह चुप लगा जाती क्योंकि जानती थी कि अगर उसने जरा भी मुँह खोला या आवाज़ निकाली तो मां की शामत आ जायेगी और कितने दिन तक वो दर्द से तड़पेंगी पता नहीं।

वह जिद्दी बच्ची अब 13 साल की हो चुकी थी, अब उसकी बड़ी-बड़ी आँखें मानो अंगारों से भरी रहतीं। स्कूल में उसके बहुत सारे दोस्त नहीं थे क्योंकि वो कब किस बात पर गुस्सा हो जाती इसका पता नहीं था। उस दिन वह ट्रेन से अपने पिता के साथ लंबा सफर करके घर आ रही अपनी मम्मी के पास। बारह पन्द्रह घंटे के सफर में नींद आना लाजमी था। अचानक उसे अहसास हुआ कि उसे कोई जोर-जोर से हिला रहा था और हिलाने वाले के दो हाथों में से एक हाथ उसके सीने पर रेंग रहा था जब कि दूसरा उसकी दोनों टांगों के बीच में। खटाक से उठ बैठी क्यों कि ये दोनों हाथ उसके जन्मदाता कहे जाने वाले पिता के थे। किसे, कैसे और क्या बताती? यकीन कौन करता?

उसे तब और अधिक क्रोध आया जब मां ने उसे शराब की बोतल लिए पिता के पास पानी लेकर भेज दिया जो अपने दोस्त के साथ बैठे बेटी और रिश्तों का फर्क समझने को तैयार नहीं थे। मां की ऐसी क्या मजबूरी थी कि वो सड़क पर निकल कर मजदूरी नहीं कर सकती थीं लेकिन अपनी बेटी को नरभक्षी पिता के सामने परोसने पर आमादा थीं और अगर मजबूर थीं तो ऐसी मजबूरी किस काम की? गुड़िया अब अपना अधिकतर समय घर से बाहर बिताने लगी थी। उसकी आंखों के सामने सितारे नाच गये जब उसे पता चला कि वही नहीं उसकी बड़ी दीदी भी शिकार बन चुकी थीं स्वयं के जन्मदाता का लेकिन कहने की हिम्मत वो भी नहीं जुटा सकी थीं। गुड़िया अब विद्रोही गुड़िया बन चुकी थी, उसका अधिकतर समय बाहर गुजरने लगा। विशेषकर जब पिताजी घर आते तो वह या तो अपना कमरा बंद करके रखती या घर के बाहर ही रहती, घर में होते हुए भी नहीं होने के बराबर ही रहती। ऐसा नहीं था कि उसने अपने भाइयों को बताने की कोशिश नहीं की लेकिन उसने महसूस किया था कि बस ‘‘पैसा बोलता है।" उसके भाइयों को अपनी जिंदगी, अपने तरीकों और पैसों की भी जरूरत थी।

अब वह प्राइवेट नौकरी करने लगी थी जहां उसके तीखे नैननक्श और शांत स्वभाव पर श्रीमती सिसौदिया की नज़र पड़ी और उन्होंने उसे अपनी बहू बनाने का मन बना लिया। यहां भी किस्मत मानो उसके साथ दो-दो हाथ करने पर तुली हुई थी। वह बहू तो बनकर आ गई लेकिन जीवनसाथी की बेवफाई ने उसे बीवी कभी नहीं बनने दिया। महबूबा के साथ तस्वीरें देखना ही काफी नहीं था वरन् उससे झूठ बोल कर जब वह आधी रात को घर लौटा और नींद में उसे गुड़िया नहीं अपनी महबूबा नज़र आई तो गुड़िया छिटक कर पलंग से दूर जा खड़ी हुई ताकि पति को अहसास दिला सके कि उसके जीवन में गुड़िया थी। लेकिन गुड़िया का अस्तित्व ही क्या?

आज गुड़िया ने सब तरफ से बगावत कर दी थी और वो वहां खड़ी थी जहां उसे कोई अपना नज़र नहीं आ रहा था। सास अपने बेटे के साथ खड़ी थी, पति अपनी महबूबा की बाहों में था, भाई अपनी पत्नियों और पिता के साथ थे। मां, इस शब्द पर बड़ा भरोसा था उसे! मॉं पहले एक पत्नी बन चुकी थी, मां कहीं खो गई थी।

उस जिद्दी युवा गुड़िया ने अपना घर, ससुराल सबकुछ छोड़ दिया। जब पीछे मुड़कर देखा तो बीस वर्ष का लंबा समय गुजर चुका था। इस दौरान गुड़िया ट्यूमर और माइग्रेन से ग्रसित हो चुकी थी, भाइयों के हिस्से में घर था, समाज था, मुंह न खोलने वाली बड़ी बहन के हिस्से में पति, बच्चे, भाइयों की कलाइयां, अच्छा रहन-सहन तीज त्योहार था तो मां के हिस्से में उनके बुढ़ापे का सहारा उनका पति। गुड़िया के हिस्से में कुछ था तो सामाजिक तिरस्कार, बहिष्कार, बीमारियां, छायाविहीन जीवन। चूंकि बहादुरी से संघर्ष करना सीखा था तो मेहनत सीख ली लेकिन जीवन को स्वतः समाप्त करने या आत्महत्या करने का विचार उसके मस्तिष्क में कभी नहीं आया। लेकिन जाने क्यों जब-जब वो किसी बच्ची को बढ़ते और मांस के कुछ हिस्से को बढ़ते देखती है तो सोचती है लड़कियाँ क्या हैं? शो पीस, मांस का पिंड, एक ऐसा छेद जहां क्रूर मस्तिष्क और गलीच मस्तिष्क वाले पुरूषों का शरीर तृप्ति पाता है, इंसानी शरीर धरे गिद्धों के लिए रोटी बोटी का इंतज़ाम जिन्हें उनकी इजाज़त के बिना या तो नोच लिया जाता है या फिर बचपन से ऐसा बना दिया जाता है कि उन्हें कोई फर्क ही नहीं पड़े। क्या इससे परे भी किसी गुड़िया का कोई अस्तित्व है? क्या गुड़िया होना ग़लती है? आखिर गुड़िया के साथ ही ऐसा क्यों? आज वह स्वयं से स्वयं पर चीखती है-‘‘बोल गुड़िया बोल’’। उसके साथ चीखते हैं सिर्फ सन्नाटे क्योंकि उसकी आवाज़ उन दीवारों से टकराती है जहां समाज है, पिता है, भाई है, मां है, भाभी है, बहन है, बस गुड़िया का अस्तित्व नहीं उसे सच बोलने का हक नहीं।



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