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Abhishek Gupta

Classics Others

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Abhishek Gupta

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भीड़ में अकेला क्यों?

भीड़ में अकेला क्यों?

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दूसरों को हँसाने में खुद को भुला बैठा हूँ,

अपने ही दिल से जैसे दूर जा बैठा हूँ।

हर चेहरे पर मुस्कान सजाई मैंने,

पर अपनी आँखों में नमी छुपाई मैंने।

सबके दर्द को अपना समझा,

पर अपने घावों को कभी न परखा।

हर किसी के लिए साथ निभाया,

पर खुद को तन्हा ही पाया।

भीड़ में रहकर भी अकेला हूँ,

अपने ही सवालों का झमेला हूँ।

कभी हिम्मत थी, अब थकान है,

दिल में बस एक अनजान सी उड़ान है।

ना जाने किस मोड़ पर खो गया,

अपने ही सपनों से दूर हो गया।

अब खुद को फिर से पाना है,

इस अंधेरे से बाहर आना है।

हारा नहीं हूँ, बस थोड़ा टूटा हूँ,

अंदर से थोड़ा सा रूठा हूँ।



                                                                                                                                     -अभिषेक गुप्त


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