अपनी संस्कृति हिन्द की : गौरवशाली संस्कृति
अपनी संस्कृति हिन्द की : गौरवशाली संस्कृति
संस्कृति तो तोते, मैने (मैना) आदि पक्षियों में भी होती है। हमारे भारत, हमारे हिन्द राष्ट्र हिन्दुस्तान को 'सोने की चिड़िया' कहा जाता है। हमारे देश में गुप्त राजाओं ने सोने के सिक्कों का निर्माण एवं प्रयोग करने की विधि शुरू करवाई थी। आज भले ही हमारे देश में वे सिक्के प्रयोग नहीं किए जाते, परंतु समय के साथ-साथ हमारे इस देश की पुरानी आस्था एवं संस्कृति का प्रभाव देखा जाता है। सोने की चिड़िया आज उड़कर सभी के मन एवं संस्कृति में आकर उतरी है। हमारे देश को 'इण्डिया' अपने ही लोग कहते हैं। क्या तुम्हें पता है इण्डिया का मतलब? मतलब को छोड़ो, जो नाम है सो है, परंतु उस सेनानी महापुरुष ने कभी कहा था कि "इण्डिया की जय हो।"क्या कहें?
आप नहीं जानते?
आज़ाद हैं?
क्यों नहीं?
नाम तो लिखो?
कई प्रश्न बनने को हैं परंतु हर सवाल का एक ही जवाब है।
हमें अपने इस मस्त-मौला से इण्डिया का नाम एवं कल्पना को बड़ा करना होगा। आप सोते हुए कभी अपना बिस्तर नहीं लगा सकते, परंतु उठकर बिस्तर तो लगा सकते हैं। उसी प्रकार 'इण्डिया' शब्द हमारे मन और भावनाओं में बैठा है। उस पावन (पुनीत) स्वतंत्रता सेनानी ने आज़ादी के दौरान कभी नहीं कहा लोगों को इण्डिया माता की पूजा करने के लिए, उसने एक ही शब्द, एक ही वाणी और एक ही नारा दिया था— "भारत माता की जय!"
क्योंकि जिस प्रकार एक माँ अपने बच्चे को जीवन भर बेटा कहती है और बेटा माँ को 'माता' कहता है, उसी प्रकार हमारी यह मिट्टी एक संपूर्ण धरा (धरती) है।
जब हम जल पीते हैं, तो वह जल नहीं बल्कि माता का दूध है, जो अपने बच्चे की प्यास बुझाने के साथ-साथ उनके साथ रहने का प्रमाण देता है।
हर मनुष्य अपना पेट भरने के लिए इसी माँ के ऊपर जुताई (कृषि) करता है और इसी से अपने संसार चक्र को चलाता है।
कोई माँ अपने बेटे को भूखा नहीं रखती, उसी प्रकार हमारी माता हमारी धरा है।
इसीलिए हमारे जवानों ने इस माता का नारा लगाया है।भारत को हम अपनी माता मानते हैं।
यह देश सभी वीरों का है, यह प्रेम की नगरी है जहाँ पर सभी प्रभु-माताओं ने जन्म लिया एवं इस स्वर्ग का आनंद लिया। जिस पर कृपा प्रभु की हो, धन्य है वह स्थान!
हमें अपनी संस्कृति को उच्च स्तर पर ले जाने के लिए पुराणों एवं गीता का ज्ञान प्राप्त करना होगा, क्योंकि ज्ञान एक अनमोल रत्न है।
इस रत्न से बड़ कर कोई रत्न नहीं है।हमारे यहाँ आज तक और संपूर्ण जीवन तक यही देखा गया है कि हम अपने धर्म और विचारों को मानते आ रहे हैं। कहा गया है कि यही मनुष्य की एक सच्ची प्रभुता व संस्कृति है। हमारे यहाँ मान्यता है ।
सारी संस्कृतियों की, परंतु पूरे भारत को एक 'अखंड भारत' बनाना होगा। (कभी अखंड भारत था।)
अंततः, हमारी संस्कृति और यह पावन धरा हमारी असली पहचान हैं। भारत मात्र एक भूखंड नहीं, बल्कि हम सभी को एक सूत्र में पिरोने वाली साक्षात माता है।
इसकी रक्षा और सम्मान करना हर नागरिक का परम कर्तव्य है। आइए, हम सब मिलकर अपने गौरवशाली अतीत, ज्ञान और संस्कारों को संजोकर रखें और आपसी प्रेम से एक सशक्त, समृद्ध और अखंड भारत का निर्माण करें। भारत माता की जय!
