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Abhishek Gupta

Action Classics Others

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Abhishek Gupta

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जंगीगंज से बी.एच.यू. तक: एक भीगा सफ़र

जंगीगंज से बी.एच.यू. तक: एक भीगा सफ़र

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वर्षा के वक्त कहीं घर से निकलना अत्यधिक कष्ट हो जाता है, क्योंकि पानी में रहना मनुष्य के लिए खिलौना नहीं है।

मंगलवार की सुबह 6:53 AM पर आने वाली ट्रेन जंगीगंज स्टेशन (हाल्ट) पर रुकते ही रोज़ नए लोग दिखाई देते हैं। लगभग वहां 100-150 लोगों का सैलाब रहता है, परंतु उसमें चढ़ने वाले सिर्फ 80-100 व्यक्ति ही हैं। ये जो किसी काम के लिए अपने घर से दूर जाते हुए लोग हैं, वे लोग रात की ट्रेन से अपने स्टेशन उतरकर अपने घर जैसे 8 घंटे के लिए मेहमान बनकर आते-जाते हैं। रोज़ मेहमान तो नहीं आते-जाते, परंतु हम बस एक मजबूर मेहमान मान सकते हैं।
मंगलवार की सुबह की ट्रेन से मैं भुल्लनपुर स्टेशन (वाराणसी) के लिए रवाना हुआ। अगले दिन भीड़ अत्यधिक नहीं थी कोच में, परंतु सीट नहीं मिली। एक महापुरुष जो मेरे आगे आकर ज्ञानपुर स्टेशन से बैठते हैं और हाथ-पांव फैलाकर सीट तो बना लेते हैं, पर इसके बाद वे सभी को आश्वासन देने लगते हैं कि चार स्टेशन के बाद मैं उतर जाऊंगा।
उन महापुरुष ने पहले मुझे आश्वासन दिया, फिर एक 60 वर्षीय व्यक्ति को कहते हैं कि मेरी सीट पर बैठ जाना।

एक ऐसे ही मेरे साथ खड़ा 25-30 वर्षीय लड़का, मैंने बोला— हां भैया कहां जाना है? उन्होंने भारी आवाज में बोला— नहीं भाई यही वाराणसी तक। मैंने सोचा हां शायद घर जा रहे होंगे।
महापुरुष जो ज्ञानपुर कस्बे से बैठे थे, उन्होंने इस लड़के से भी कहा— ठीक है, आप दो स्टॉप के बाद बैठ जाना। लड़का खुश था परंतु अपने लिए नहीं, अपने पिताजी के लिए, जो 65 वर्षीय ऑपरेशन करा रखे थे। मैंने भी सोचा ठीक है किसी बूढ़े को सीट मिल जाएगी। हम लोग दो घंटे से पहले खड़े-खड़े पहुंच ही जाएंगे। हमारी खुशी ज्यादा देर तक नहीं चलती, उन्होंने किसी और को सीट दे दिया।
आश्वासन का पूरा क्रोध हमारे सिर पर था, परंतु वो उनका स्थान था चाहे जिसको दें, इसलिए हम सभी शांत थे।
मोबाइल का रिंगटोन बजा और हम हेडफोन लगाकर गाने का आनंद लेते हुए अपने स्टॉप पर पहुंच जाते हैं।
किन्तु पानी-वर्षा के कारण हमें टिकट काउंटर के पास बनी छोटी सी छत का सहारा मिला, हम 30 मिनट के करीब वहां खड़े रहे।

तिपहिया (ऑटो) वाले सभी लोग चिल्ला रहे थे— लंका, बी.एच.यू. (B.H.U.)। हमारा बी.एच.यू. तक का 25 रुपये किराया था। हम हल्की फुहारों वाले पानी का आनंद लेते हुए बी.एच.यू. गेट पहुंचे।
200 मीटर पैदल चलने के बाद देखा कि छोटे गेट के पास अत्यधिक भीड़ लगी हुई है। ऐसा लग रहा था कि आज अस्पताल में काफी भीड़ है, परंतु इसके अलावा हमने देखा कि वहाँ पानी भरा हुआ है। लोग अपने कपड़े हाथों में समेटकर (ऊपर उठाकर) दवा के लिए अंदर जा रहे हैं।
हम भी उसी भीड़ में खड़े थे, तभी वहाँ एक व्यक्ति मेरे ठीक नीचे बने नाले में गिर गए। उन्हें हम 4-5 लोगों ने सीढ़ी पर से हाथ देकर बाहर उठा लिया। इसके बाद हम भी डर के कारण वहाँ से बाहर निकल आए।
मेन गेट पर जाने पर पता चला कि वहाँ भी पानी जमा हुआ है। हमने हिम्मत जुटाकर पानी में प्रवेश किया; लगभग मेरे आधे पैर (पांव) तक पानी था। जब कोई गाड़ी वहाँ से आती-जाती, तो पूरा पैर पानी में डूब जाता था। वहाँ गाड़ियाँ भी बहुत अधिक संख्या में गिरी पड़ी थीं।

कोई पैदल ही लेकर जा रहा है तो कोई वहीं लॉक कर दे रहा है।आगे आप अपने हिसाब से इसमें पूरी कहानी जोड़ें।

उस जलभराव और अफ़रा-तफ़री के माहौल को देखकर मेरा मन थोड़ा विचलित हो उठा था, लेकिन दवाई लेना भी उतना ही ज़रूरी था। मैंने भी अपनी पैंट को थोड़ा ऊपर मोड़ा और गहरे पानी को पार करते हुए धीरे-धीरे अस्पताल परिसर के मुख्य भवन की ओर बढ़ने लगा। हर कदम पर पानी का दबाव महसूस हो रहा था, और मन में रह-रहकर यही विचार आ रहा था कि एक बड़े चिकित्सा संस्थान के बाहर बुनियादी व्यवस्थाओं का ऐसा हाल क्यों है?

वहाँ से दवाइयाँ लेने के बाद जब मैं बाहर निकला, तो बारिश कुछ थम चुकी थी, लेकिन सड़कों पर पानी का स्तर अभी भी था। 

पुलिसकर्मियों द्वारा वहां से कर्मचारियों की मदद से पानी को टैंकरोंज द्वारा निकाला जा रहा था।

एक बार फिर बी.एच.यू. गेट से लंका की तरफ आने वाले उसी ऑटो (तिपहिया) का सहारा लिया। इस बार वापसी के सफ़र में शरीर तो भीगा हुआ और थका हुआ था, लेकिन मंगलवार की इस सुबह से लेकर दोपहर तक के इस अनुभव ने मुझे बनारस के एक अलग ही रूप से रूबरू करा दिया था— जहाँ परेशानियाँ तो थीं, पर उन परेशानियों के बीच एक-दूसरे का हाथ थामकर आगे बढ़ने का जज़्बा भी ज़िंदा था।


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