उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग में स्थित एक ऐसा जनपद, जो अपने इतिहास तथा अपने कार्यों के कारण एवं विकास केंद्रों के आस-पास के क्षेत्रों में ही नहीं, बल्कि विश्व में भी अपना स्थान बनाए हुए है। जो विशेष रूप से भदोही नाम से जाना जाता है (संत रविदास नगर है)।
यह अपने कालीन उद्योग, ऐतिहासिक विरासत और सांस्कृतिक परंपराओं के लिए विश्व में प्रसिद्ध है।
यह केवल व्यापार का केंद्र ही नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास, लोकविश्वास और धार्मिक परंपराओं का भी महत्वपूर्ण स्रोत रहा है।
भदोही का क्षेत्र पहले काशी (वाराणसी) के क्षेत्र का हिस्सा था। काशी और भदोही का संबंध कोई नया संबंध नहीं है, यह स्वयं में एक बहुत पुराना है। सदियों से काशी की आध्यात्मिक कला तथा विशाल रूप विश्वनाथ की नगरी के रूप में पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। भदोही और काशी की प्राचीन कला, मंदिरों और सांस्कृतिक परंपराएं समान हैं।
संत भदोही का क्षेत्र गंगा घाट की समृद्ध सभ्यता से जुड़ा है। यहाँ कृषि, व्यापार और धार्मिक गतिविधियों का विकास है। यहाँ वैदिक, बौद्ध और जैन परंपराओं का प्रभाव भी पड़ा है।
जनपद का गठन
भदोही पहले वाराणसी का हिस्सा था। प्रशासनिक सुविधा का ध्यान रखते हुए तथा विकास की गति को सभी स्तरों तक पहुँचाने के कारण सन् 30 जून 1994 को इसे अलग जनपद बनाया गया।
भदोही को विश्व विख्यात बनाने में यहाँ के बुनकरों और शिल्पकारों का सबसे बड़ा योगदान है। ऐसा माना जाता है कि शेरशाह सूरी के शासनकाल या उसके बाद के दौर में यहाँ कालीन बुनने की कला की शुरुआत हुई थी। यहाँ के स्थानीय कारीगरों ने इस कला को इस कदर अपनाया कि उनके हाथों का हुनर पीढ़ी-दर-पीढ़ी निखरता चला गया।यहाँ बनने वाली हाथ से बुनी हुई कालीनें जब विदेशों में जाती हैं, तो लोग भारतीय शिल्प की प्रशंसा किए बिना नहीं रह पाते। भदोही के हर घर में चलने वाले करघे की आवाज़ यहाँ के लोगों की धड़कन है, जहाँ रेशम और ऊन के धागों से कालीन पर खूबसूरत ख्वाब उकेरे जाते हैं।
इसका पहला नाम संत रविदास नगर रखा गया था, बाद में इसका नाम बदलकर पुनः भदोही कर दिया गया।प्रमुख स्थानभदोही में अनेक धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व के स्थल हैं:
सेमराधनाथ:
यहाँ भगवान शिव (भोलेनाथ) का एक अत्यंत प्रसिद्ध मंदिर है। यह देश का एक अनोखा मंदिर है जहाँ शिवलिंग एक कुएँ जैसी गहराई में स्थित है। यहाँ हज़ारों श्रद्धालु दर्शन और जलाभिषेक करने आते हैं। यह पावन स्थल गंगा नदी के तट के पास स्थित है।
माता सीता समाहित स्थल (सीतामढ़ी):
यह पवित्र स्थल भी गंगा नदी के समीप सीतामढ़ी में स्थित है, जहाँ हज़ारों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। मान्यता है कि इसी स्थान पर माता सीता धरती माँ की गोद में समाहित हो गई थीं।
इस समाहित स्थल के पास सीता समाहित मंदिर परिसर में भगवान हनुमान की एक विशाल (१०८ फीट ऊँची) प्रतिमा स्थापित है, जो लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है और यहाँ आने वालों को एक असीम शांति का अहसास कराती है।
लोक परंपराएँ / पौराणिक मान्यताएँपांडवों का आगमन:
सेमराधनाथ क्षेत्र की लोकमान्यताएँ काफी प्रसिद्ध हैं। ऐसा माना जाता है कि महाभारत काल में यहाँ घने जंगल, प्राकृतिक जलस्रोत और सुरक्षित वातावरण होने के कारण पांडवों ने अपने अज्ञातवास का कुछ समय यहाँ बिताया था। मान्यता है कि महाबली भीम ने अपने गदा के प्रहार से यहाँ एक कुंड का निर्माण किया था, और अर्जुन ने भी इसी पावन स्थान पर भगवान शिव की कठोर आराधना की थी।
महर्षि वाल्मीकि का आश्रम:
एक अन्य प्रमुख लोकमान्यता महर्षि वाल्मीकि से जुड़ी है। गंगा नदी के तट के निकट स्थित सीतामढ़ी क्षेत्र के वन प्राचीन काल में अत्यंत शांत, सुरम्य और तपस्या के अनुकूल थे। पौराणिक के अनुसार, महर्षि वाल्मीकि का पवित्र आश्रम इसी क्षेत्र में स्थित था, जहाँ माता सीता ने अपने वनवास का समय बिताया था और लव-कुश का जन्म हुआ था।