एक यात्रा - स्वतंत्र विचार
एक यात्रा - स्वतंत्र विचार
मेरे अंदर एक असाधारण लड़ाई चलती रहती है -
एक ऐसी लड़ाई जिसे कोई देख नहीं सकता, जिसे कोई शांत नहीं कर सकता।
बाहर से मैं शांत रहता हूँ लेकिन मेरे ही अंदर... खुद की लड़ाई चल रही है।
किसी को देख कर मैं, उसके जैसा बनना चाहता हूँ फिर ध्यान आता है मेरे रास्ता का अंत किसी मुकाम तक ले जाएगा।
एक ऐसा सफर जो हर वक्त अपने विचार की दुनिया में मदहोश रहता है। लेकिन हर बार उन मदहोशी के साथ मैं हट कर कुछ अपने आप को समय देना भूल जाता हूँ।
मैं वास्तव में करता क्या हूँ?
शायद यही मेरी सबसे बड़ी गलती है।
अपने आप के उलझनों में फँसा रहता हूँ।
"तुम अच्छे नहीं हो"
"आगे लोग तुम्हें क्या कहेंगे?"
"मैं किसी काम का नहीं"
यह आवाज किसी और की नहीं मेरी ही है - जो अंदर से मुझे खोखला किए जा रहे हैं, मेरा आत्म-संदेह मेरी खुद की आलोचना में उलझी पड़ी है।
मेरी समस्या सिर्फ एक प्रसिद्ध का सपना नहीं है, मेरी समस्या अपने ही दिमाग में चल रहा एक युद्ध बन चुकी है।
हर चीज को जरूरत से ज्यादा सोचना तथा किसी बात-विचार में उलझे रहना। अगर कोई सवाल प्रश्न (मैसेज) का उत्तर देर से जवाब देता है तो मैं बार-बार सोचता हूँ शायद मुझसे कोई गलती हुई है।
"क्या मैंने कुछ गलत कहा?"
ये छोटी-छोटी आदतें मुझे धीरे-धीरे खुद में ही उलझा कर छोड़ देती हैं।
मैं क्या करूं यह भूल जाता हूं?
मैं खुद से बातें करना इतना पसंद करने लगा हूँ कि किसी से बोलने से पहले सोचता हूँ।
हर रात खुद से सवालों में घिरा मिलता हूँ , जैसे कोई पूछ रहा हो -
तुम कौन हो?
परंतु मेरे पास कोई उत्तर नहीं रहता।ऐसा मैं खुद को मानने लगा हूँ कि मैं एक चक्र में फँस गया हूँ -
सोचना, डरना, टालना, और पूछना।
एक दिन मैं यात्रा कर रहा था तब महसूस किया कि इस चक्र से बाहर निकलना तथा खुद को जानना लोगों से बातें करना कितनी आवश्यक है।
यह कार्य मुझे कठिन लग रहा था।
आत्म-संदेह मेरा खुद पर ही हावी हो रहा है, जैसे आदत था। उस दिन मैंने 2 घंटे के लगभग सफर में मैंने यह जान चुका था कि जीवन में समस्या तथा उसका उपाय आता जाता रहता है -
चाहे वो व्यक्ति अपने आप में कितना भी खुद को पा चुका हो - या दुख को, परंतु हमें हमेशा खुश होना चाहिए।
परिस्थिति में अच्छे से अपने कार्य को सम्पन्न करें। आत्म-संदेह को विचलित किया जा सकता है।डर के साथ हमेशा आगे बढ़ना ही असली ताकत है क्योंकि सब डर हमेशा खत्म नहीं होता। किसी न किसी रूप में आ ही जाता है।
हमें यह महसूस करना चाहिए कि बाहर की दुनिया एक बगीचा है।
इस बगीचे को हम जीस नजरिया से देखेंगे उस नजरिया में यह ढल जाएगा।
हमारे देखनी और हमारी सोच पर निर्भर करता है, क्या हम सोचते है?
अंत में मैंने अपने आप को बदलना स्वीकार किया, मैं पूरी तरह अपने विचारों तथा कौशल पर खुद से भागना छोड़ दिया और अपने मन को आजादी दी।
यात्रा की यह अनोखे लोग जो हमें दिशा सिखाई मैं उन्हें एक बगीचे की तरह मानता हूं जो एक व्यक्ति के मन में सुगंध के साथ-साथ मधुर पन का एहसास दिलाते है।
मैं खुद को अपने विचारों पर स्वतंत्र भाग लेने का कोशिश करता रहूंगा।
