क्या इतना ही था और भी?
क्या इतना ही था और भी?
मैं जागता हुआ कब दिखता हूँ, पर वह मुझे पागल ही कहती है।
जाने क्यों हँसी छिन ही जाने पर क्यों मैं मुस्कुराता रहता हूँ? रास्ते पर अचानक जो मैंने छोड़ी थी कविता, पूरी दुनिया हमसे कहती है कि "क्या, क्यों हो तुम? आगे जाने की सोच रहे हो या सो रहे हो?"मैं पूछता हूँ पूर्व की दिशा से कि कब मुँह मोड़कर किसी और दिशा में वह चली गई। हरी-भरी यादों के उपवन में, दुनिया से निकल कर, खुद सपनों की यात्रा समझ रहा हूँ।
न जाने कौन सा मोड़ था कि मैं उन हाथों से बनी हुई कच्ची सड़कों पर जाने का मन बना बैठा था। पर कोई कह दे न, क्या होता है वहीं पर खड़े रहने पर, अड़ जाने पर, टिक जाने पर?
नहर की बहती हुई वह धारा की सुंदरता मिली, वह हरे-हरे मैदानों की सुंदरता देखकर मन सम्मोहित सा हो उठा। पर रास्ते में क्या सचमुच हवा का झोंका आया? उसने भी ठंडी याद दिला दी।
पर मैं खुश था उन चलते पेड़ों पर, वह लहकती पत्तियों की बालियों पर।
सूर्य भी मनमोहक हो जाए, वह बादल उसको देखने के लिए बाराती बनकर आए। हवा के मेले में वह पेड़ों की डालियाँ खुद को सँवारें, पर न चाहे पर क्यों कहे?मैं नभ की राहों में तारों की वह छोटी सी मुस्कान पर मन प्रफुल्लित हो उठा। फिर मैं गुनगुन करते हुए साइकिल पर सवार होकर महफ़िल को देखने चला गया। न जाने श्रृंगार का कमाल था या कोई जादू की दुनिया में बे-रस्म के वह खुद ढलकर मिले। वह वृक्षों का खुद खो जाना, सबके कपड़े बदलते थे, पर वृक्षों की वह हरी पत्ती एक नया रूप लाती थी। यह न तो श्रृंगार था, बल्कि प्रकृति का वह सुंदर और मनभावन रूप था।
क्यों इन पत्तों को निहारता हूँ? न जाने क्यों आँखें नहीं थकतीं और न जाने क्यों रात हो जाती है।
शाम ढलने लगी थी, स्कूल की घंटी पहली बार बजी थी। तब लगा कि सब कुछ शांत है, कोई शोर और गाना नहीं चल रहा था। वह एक फिल्म की दुनिया सी दिख रही थी, हरी-भरी यादों में खोया था। शाम की सोच रहा था, तभी हवा का झोंका निकला, मानो बादलों की ठंडी हवा का सामंजस्य हो। मैं झूम सा गया, फिर मैं अपने सरकारी विद्यालय के प्रांगण में चला गया।तभी वहाँ वर्षा की तेज बूँदें गिरने लगीं। मैं बाहर से पूरी तरह भीग गया था, तब माँ ने मुझे एक कमरे में बिठाया। माँ के हाथों से पकड़ी लाठी और वह पुराना कंबल याद आया। तभी बाहर कुछ दूरी पर एक तालाब दिखाई दिया। लहरें उठ रही थीं, मानो पानी से पुकार रही हों। किनारे बैठे लोगों को पीछे छोड़ते हुए कुछ लोग ही दिखे, जो लहरों के उठने का आनंद ले रहे थे।तभी अचानक चलती हुई हवाओं ने मुझे रास्ता दिखाया, पर मस्त-मौला हवाओं का आनंद लेने के लिए हम चाय वाले के पास रुके। मैंने सोचा था कि चाय पीकर आगे बढ़ेंगे, पर जेब में पैसे न होने के कारण हम आगे बढ़ गए।
वहाँ से हटकर आगे बढ़े, तो एक बड़ी सी छाँव मिली।
पेड़ की छाया में बच्चे वर्षा का आनंद ले रहे थे। अपने उन सुनहरे पुराने पलों को याद करके पत्तियों की बूँदें गिर रही थीं। वह न जाने कैसा दृश्य था कि जितना मनुष्य बच्चों से स्नेह करता है, वह प्रकृति भी अपने बच्चों से उतना ही प्यार करती है।
आगे मैं बढ़ता चला गया, जहाँ मोड़ के अलग-अलग रास्तों के विकल्प थे। मैंने अपने घर आने के लिए दूसरे रास्ते से आने का विचार किया। अपने मन को सलाम करते हुए, हाथ में हैंडल और पाँव में चप्पल पहन ली और जल्द ही मैं अपने घर पहुँच गया।
पर मैं न जाने क्या चाहूँ कि जीवन की धारा यह कुछ नहीं, यह तो जीवन का एक पतझड़ का छोटा सा दिन था जो हमने देखा।अभी तो पूरा सावन का संगीत, फिर टेलर और फिर प्रकृति की पूरी फिल्म देखनी है। सच है, इतना ही, पर क्या जाने काव्यात्मक धर्म इतना ही नहीं और भी है।
