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Abhishek Gupta

Action Classics

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Abhishek Gupta

Action Classics

मैं रोता क्यों हूँ?

मैं रोता क्यों हूँ?

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नसीब को कोसकर मैंने पढ़ना छोड़ दिया। किस्मत की छुरी ही ऐसी थी। मैंने कभी यह नहीं चाहा कि मैं स्कूल न जाऊँ। पर किस्मत का खेल क्या है? हमारे मुँह पर क्यों थप्पड़ मार दिया? सच में, हमारा मन सोचता है कि हम क्या करें और कैसे आगे बढ़ें।
लेकिन हमारा दिमाग कहता है कि चुपचाप बैठ जाओ, क्योंकि किसी का अपना कोई सपना नहीं होता। अगर होता भी है, तो किस्मत उसे वक्त के साथ बदल देती है। हमारा घर वक्त पड़ने पर कितना छोटा हो जाता है, यह केवल वही दिल जान सकता है जो इस पर से गुजरता है।
इस दौर में जीना पहला काम है। चाहे इच्छा हो या न हो, हर किसी के पास पैसा होना चाहिए।
इस संसार में ऐसा कोई शब्द ही नहीं है जो पैसे की लड़ाई को रोक सके। कोई भी जुआ नहीं खेल सकता, हर वक्त की अलग-अलग उलझनें सामने आती हैं। भगवान भी केवल पैसे वालों की ही सुनते हैं। पैसे के बिना किसी भी विद्यार्थी का जीवन सफल नहीं हो पाता। पैसा हर किसी को अपनी उँगलियों पर नचाता है। हर कोई समय की इस मार के नीचे दबा हुआ महसूस करता है।
समय बीत जाता है, पर अपनी यादें छोड़ जाता है। लोग सोचते हैं कि ताना मारना बहुत आसान है, पर छोटे घर वालों को अपनी ही धुन रहती है। वे सोचते हैं कि काश हम भी किसी बड़े महल वाले या ऊँचे सपनों वाले होते। हम हर रोज ही दूसरे लोगों के पास जाते हैं, पर अपना अपमान करवाकर वापस लौट आते हैं।
किस्मत का भी कोई भरोसा नहीं होता। वह कब बदल जाए, कहा नहीं जा सकता।
जो व्यक्ति हर महीने कमाने वाला आदमी होता है, जो 12,000 या 15,000 रुपये कमा रहा है, वह कहीं खो सा जाता है। ऐसा क्यों होता है? क्योंकि जिसके पास 100 रुपये भी नहीं होते, वह दूसरों को डूबते हुए देखता है। सब उसे कोसते हैं।
घर का सामान, पानी, कपड़े, मकान और पढ़ाई-लिखाई सब खत्म हो जाते हैं। जब बच्चा कमाने लायक हो जाता है और स्कूल में पढ़ने लगता है, वह भी मेहनत करने से कतराने लगता है। अंत में वह भी यही सोचता है कि मैं अपने लिए और अपने परिवार के लिए क्या करूँ? अब तो कोई रास्ता दिखाई नहीं देता।


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