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Yogesh Kanava

Abstract Romance Inspirational

4  

Yogesh Kanava

Abstract Romance Inspirational

भाविका भावेश

भाविका भावेश

51 mins
4

अचानक लग झटके साथ भावेश की तन्द्रा टूटी । वो लैण्ड कर चुके थे अहमदाबाद में । यहाँ से उसे जयपुर के लिए दूसरी लिंक फ्लाइट पकड़नी थी । अभी उसे तीन घण्टे तो अहमदाबाद एयरपोर्ट पर गुज़ारने थे। अहमदाबाद से जयपुर के लिए फ्लाइट रात ग्यारह बजे है । डिनर भी एयरपोर्ट पर मिलने वाला था। सभी यात्रियों के साथ अपना लेपटॉप बैग उठाकर भावेश भी नीचे उतरने लगा था । एयरपोर्ट के बाहर वो जाना भी नहीं चाहता था । दोबारा चैक इन करने का झंझट कौन मोल ले और फिर अहमदाबाद तो वो पचासों बार आ चुका था इसलिए कोई क्रेज भी नहीं था । वो सुस्त कदमों से लांजिग एरिया में कुछ अन्य यात्रियों के साथ चल दिया था । चाय तो वो फ्लाइट में ही पी चुका था इसलिए चाय की इच्छा नहीं थी लेकिन जब लाजिंग एरिया में आ ही गया था तो उसने एक कोक ले लिया और पीने लगा था वैसे उसका मन तो बीयर के लिए हो रहा था लेकिन गुजरात ड्राइ एरिया होने के कारण बीयर नहीं मिल सकती थी । कोक पीते पीते ही वो फिर से अपनी ही यादों की गलियां में निकल पड़ा था बस यूँ ही विचरण करने को । उसे भाविका के साथ वो पहली मुलाकात याद आ गई थी जब वो नई-नई नौकरी जोइन करने पूणे पहुँचा था ।

मराठी बिल्कुल नहीं आती थी। सिटी बस में वो ग़लती से महिला सीट पर बैठ गया था तभी भाविक आई थी। कुछ देर चुपचाप खड़ी रही फिर बोली थी सीट प्लीज। और भावेश ने उसे घूर कर देखा था सोचा मैं बैठा बुरा लग रहा हूँ। वो फिर से बोली थी सीट प्लीट इस बार बड़े ही अनमन से उठकर उसे सीट दी थी। तभी वो बोली थी शायद आप गलती से वीमन सीट पर बैठ गए थे। एनी वे वी केन शेयर और भावेश को अपनी ग़लती का पता चल गया था उसने धीरे से कहा था थैंक यू जी बट यू रिलेक्स आई एम आलराइट । बगल में बैठी महिला अगले स्टाप पर उतर गयी थी कोई और सवारी नहीं चढ़ी थी सो भविका ने धीरे से बोला जब तक कोई लेडी पेसेन्जर नहीं आती आप बैठ जाइए प्लीज । भावेश को भाविका का प्लीज बोलना बहुत ही अच्छा लगा था । पूणे में पहला दिन आफिस भी यरवदा रोड़ पर शहर से थोड़ा दूस जहाँ पर बसों की संख्या अपेक्षाकृत कम होती थी । यह बात पूरे पच्चीस बरस पहले की है जब भावेश पूणे ज्वाइन करने गया था । साथ बैठने पर भाविका ने ही बात शुरू की थी

-लगता है आप इस शहर मे नए आए हैं ।

भावेश ने भी छोटा सा जवाब दिया था

- जी

भाविका ने फिर पूछा

- नया शहर है आपके लिए आप जाब करते हैं ।

इस बार भावेश थोड़ संयत होकर बोला

- जी आज ही ज्वाइन करने आया हूँ। भारत सरकार का एक विभाग है, उसी में यरवदा रोड़ पर ज्वाइन करना है ।

- आपका नाम जान सकती हूँ मैं

- जी भावेश है

- अरे वाह आप भावेश और मैं भाविका, भावेश जी आपको तो शायद क्वाटर मिलेगा ।

- जी पता नहीं अभी तो आज पहली बार ही जा रहा हूँ

- वैसे आप कहाँ से हैं आईमीन विच स्टेट

- जी मैं जयपुर राजस्थान से हूँ आज सुबह ही ट्रेन से आया हूँ ,यहाँ स्टेशन के सामने ही एक गेस्ट हाउस में ठहरा हूँ । वहीं से पता किया कि यह बस मुझे आफिस तक पहुँचा देगी ।

- जी बिलकुल सही बताया

- आप भी जोब करती हैं

- जी नहीं मैं यरवदा जेल में कैदियों पर एक रिसर्च कर रही हूँ  इसलिए इन दिनों जाना पड़ रहा है।

- सो नाइस

- मैं रिसर्च स्कालर तो नहीं हूँ लेकिन सोशल आसपेक्ट्स पर ही मेरी रूचि रही है ,और जहाँ ड्यूटी जाइन करनी है वो भी सोशल बिहेवियर पर ही स्ट्डी करता है ।  

- यू मीन डिपाटैमेनट ऑफ सोशल रिसर्च एण्ड स्ट्डीज

- जी

- अरे, वहाँ तो कई बार जाती हूँ मैं चलो आज वापस आते समय मैं आपके आफिस आ जाऊँगी फिर साथ ही वापस चलेंगे ।

- जी शुक्रिया

- शुक्रिया की कोई बात नही है भावेश जी आप हमारे शहर में पहली बार आये हैं इसलिए ये तो हमारा फर्ज़ है ।

- थैंक यू जी

बस बात करते करते ही डिपाटैमेन्ट ऑफ सोशल रिसर्च एण्ड स्टेडीज आ गया था इसके थोड़ा आगे ही यरवदा जेल है । भावेश अपने गन्तव्य पर उतर गया भाविका को थैंक्स बोलने के बाद वो सीधा आफिस की ओर रूख कर गया । आफिस में पहला दिन, नौकरी का पहला दिन, कुछ भी समझ से बाहर था । वो अपनी सभी सीनियर्स से मिल रहा था कोई उसे ध्यान से काम करने की सलाह दे रहा था तो कोई उसे अभी कुछ भी करने से मना कर रहे थे । सबका अपना अपना ज्ञान अपनी अपनी सलाह । भावेश चुपचाप सभी की सुनकर गर्दन हिला देता था । एक तो मराठी लहजे वाली हिन्दी वो भी उत्तर भारत से एकदम अलग काफी मुश्किल हुई थी । दोपहर हो गई थी लंच के लिए तो उसने यही सोचा था कि आफिस की केन्टीन तो होगी ही खा लेगा लेकिन केन्टीन जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी । बाकी लोग शायद खाना सुबह ही खाकर आते थे इसलिए किसी ने भी खाने की बात नहीं की ।

वो सोच ही रहा था कि अचानक ही बिना मांगी मुराद पूरी हो गई थी । वही बस वाली लड़की हाँ भाविका उसके आफिस में आई थी और सीधे बॉस के कमरे मे चली गयी थी । शायद वो बॉस को पहले से ही जानती थी । वो अन्दर गयी उसके कोई पाँच-सात मिनट बाद ही चपरासी बुलाने आ गया था मुझे । मैं सीधा उसके पीछे पीछे हो लिया था । बॉस के कमरे में अनुमति लेकर अन्दर गया । वहाँ पहले से ही भाविका बैठी थी लेकिन फिर भी उसने ऐसा ही भाव दिया जैसे कुछ भी नहीं जानता है । भावेश के आते ही बॉस ने उससे पूछा कि कैसा लगा आफिस तो भावेश सहज भाव से बोला

- सर अच्छा है ।

- खाना खाया

- नहीं सर वो पहला दिन है ना सर पता नहीं था कि यहाँ केन्टीन या आस पास कोई व्यवस्था नहीं मिलेगी कल से लेकर आऊंगा सर

- हूँ कहाँ रूके हो

- सर अभी तो रेल्वे स्टेशन के पास एक गेस्ट हाउस में ही रुका हूँ सर

- ओ के अभी एक क्वाटर बी टाइप का खाली होगा दो तीन दिन में वो तुम्हे अलॉट कर देता हूँ

- जी सर

- इन्हें जानते हो

- सर आज बस में मिली थी ये मेडम

- ये भाविका हैं सोशल रिसर्च स्कालर और हमारे डिपार्टमेन्ट की बहुत बड़ी सहायक

- सर

- भई इन्होंने तुम्हारी सिफारिश की है तो तुम्हे तो स्पेशिल एम्पलोई ही मानना पड़ेगा

- सर मैं पूरी ईमानदारी से काम करूंगा

- हूँ मैंने तुम्हारी प्रोफाईल देखी है वैरी इन्ट्रेसिटंग, देखना बहुत ज़ल्द ही तुम मेरी सीट पर भी आओगे आई सी ए फ्यूचर सोशल साइन्टिस्ट इन यू

- सर

- अच्छा तुमने खाना नहीं खाया है तुम अभी जाओ कल से लंच पैकेट लेकर आना

- सर मैं शाम को खा लूंगा कोई बात नहीं है

- देखो भावेश हम सब जो नौकरी करते हैं तो ना इसी पेट के लिए करते हैं इज़्ज़त, दौलत, शौहरत ये सब बाद की बातें हैं। जाओ और कल ही आना अब ,ओ. के.

- जी सर

इतना कहकर वो बॉस के कमरे से बाहर आ गया था । अपनी बायोडाटा फाइल उठाई और बाहर की ओर चल दिया था । उसने इस बात को नोटिस नहीं किया था कि ठीक पीछे ही भाविका भी आ रही है । वो अपने ही धुन मे बस स्टैण्ड की ओर चला जा रहा था। भाविका को भी लगा कि उसे यह भान नहीं है कि मैं भी पीछे हूँ । यही सोचकर भाविका ने उसे आवाज़ दी

- भावेश जी 

भावेश ने पीछे मुड़कर देखा और भाविका की ओर हाथ जोड़कर कहा

- थैंक यू जी सचमुच बहुत तेज़ भूख लगी है  आपने बॉस से मेरी सिफारिश करके खाने के लिए छूट्टी दिलवा दी लेकिन सच बताऊँ थोड़ा सा अच्छा भी नहीं लगा कि बॉस से पहले दिन ही आपने मेरी सिफारिश भी कर दी ।

वो बोली

- देखिये भावेश जी आप नए आए हैं और मुझे मालुम है आपने खाना भी नहीं खाया है, मैं एक सोशल वर्कर हूँ जानती हूँ कि इन्सान को दो वक्त की रोटी तो समय से मिलनी चाहिए ना । गोडबोले सर के पास मैं अपने रिसर्च को लेकर पचासों बार आई हूँ इसलिए थोड़ा परिचय हो गया है,वैसे भी अब वो मुझे अपने डिपर्टमेन्ट के सोशल सर्वे का काम दे देते हैं, जिसके कारण मेरा रिसर्च का खर्चा भी निकल जाता है। मैं जब भी यरवदा जेल जाती हूँ तो दोहपर का खाना मैं उन कैदियों के साथ ही खाती हूँ ताकि उनको भी अपनापन महसूस हो और मेरा रिसर्च का काम भी पूरी तरह से हो जाए। मैं दो लोगों का खाना लेकर आयी हूँ

आज मैंने उनके साथ खाना नहीं खाया है ,जेलर साहब भी बड़े अच्छे है। मैंने दो लोगों का खाना मांगा तो उन्हांने अलाऊ कर दिया और मैं ले आई 

 खाओगे - -  जेल का खाना

- भाविका जी अभी तो मैं कहीं का भी खाना खा लूंगा

- चलो तो ठीक है अभी बस एक घण्टा बाद ही आएगी। यहीं बस स्टैण्ड के टीन शेड के नीचे फर्श पर बैठकर खा पाओग खाना

- आप खाएंगी तो मैं भी खा लूंगा

दोनो हंसने लगे थे, और खाना खाने लग थे । खाना खाकर बस स्टैण्ड के टीन शेड के पास ही लगी पानी की टूंटी से पानी पिया तो न जाने भाविका को यह शख़्स अलग सा लगा । बस मन कर र रहा था कि इसके बारे में जान ले । बस इसी भाव के कारण ही उसने पूछ लिया

- कौन कौन हे आपके परिवार में भावेश जी 

 - जी बस माताजी और मैं ,पिताजी को मैंने देखा नहीं

 मैं जब छः महिने का था तभी किसी अनजान बीमारी के कारण वो चल बसे थे बस माँ ने गाँव में ही मेहनत मजदूरी करके मुझे पाला और आज इस काबिल बनाया है सच बोलूँ तो आज माँ की बहुत याद आ रही है बहुत खुश थी जब मेरी नौकरी की खबर आयी थी पता है पूरे मौहल्ले मे गुड़ बाँट कर आयी थी हम लोग जयपुर जिले के एक गाँव में रहते थे लेकिन पिताजी के नहीं रहने पर मैं और माँ जयपुर आ गए थे 

भावेश की बात सुनकर भाविका बोली

 - भावेश जी मुझे बहुत अच्छ लगा कि आपने

  अपनी सच्चाई बताने में कोई संकोच नहीं किया

मेरे भी पिताजी नहीं है माँ ने ही मुझे भी पाला है और पढ़ाया भी है बस माँ चाहती है कि मैं खूब पढ़कर सरकारी नौकरी लग जाऊँ और फिर शादी कर लूँ सच बोलूँ तो मैं सरकारी नौकरी बिल्कुल नहीं करना चाहती हूँ क्यों कि मैंने अभी तक की स्ट्डी में यह देखा है कि गरीबों की भलाई के लिए किये जाने वाले कामों का ढिंढोरा जितना पीटा जाता  है उसका केवल दस प्रतिशत ही काम हक़ीकत में होता है बाकी सब दिखावा, ढकोसला और चोर बाज़ारी ।

- हूँ

तभी भावेश बोला

- एक बात बोलूँ जब आपने कहा था ना कि यहाँ फर्श पर बैठकर खा लोगे क्या ? इस बारे में एक ही बात कहनी है जो आदमी ज़मीन से जुड़ा रहता है मिट्टी का साथ नहीं छोड़ता है उसे गिरने का डर कभी नहीं रहता है । गिरने का डर तो उनको सताता है जो लोग ज़मीन छोड़कर हवा में उड़ते हैं और मैं ज़मीन से ही जुड़ा हूँ और ज़मीन पर ही रहना चाहता हूँ

इसलिए ज़मीन पर बैठकर खाने मे मुझे हमेशा खुशी होती है। आपने मेरे बारे मे तो पूछ लिया कुछ अपने बारे में भी बताईये ना ।

- भावेश जी मेरी कहानी आपसे बिल्कुल ही अलग नहीं है । बापू और भाई जब मैं छः साल की थी तब हैजे के कारण मारे गए ,बस मैं और आई, वो मेरी माँ हमारे यहाँ माँ को आई बोलते हैं ना, बस दोनो ही रह गए थे । एक किराये के घर में हम धोले पाटील रोड़ पर रहते थे, वहाँ से निकल कर हम इधर मगरपट्टा के इलाके में एक सड़क के किनारे टूटे से कमरे में आ गए थे खाने को कुछ नहीं था । आई घरों में काम ढूँढने जाती तो कई दिन तक तो काम ही नहीं मिला  लेकिन आई कहती है एक दिन मिलट्री की डिफेन्स फैक्ट्री के एक साहब ने आई को काम भी दे दिया और पीछे सर्वेन्ट क्वार्टर भी बस मैं वहीं पली बढ़ी और पढ़ी । वो मेमसाब बहुत अच्छी हैं मुझे भी बहुत प्यार करती है , अब तो वो रिटायर हो गए हैं लेकिन यहीं पूणे में ही बस गए हैं इसलिए यहीं मगरपट्टा में ही उन साहब के यहाँ आइ अब भी काम करती हैं । मेरी पढ़ाई का पूरा खर्चा वो ही मेमसाब ने उठाया है । मेरे लिए तो साहब और मेमसाब ही भगवान हैं। साहेब ने ही एक दिन मेरी एमए के बाद रिसर्च के लिए कहा था ,  यूजीसी से दो लाख की ओर आपके विभाग से मुझे पाँच लाख की स्कालरशिप भी साहेब ने ही दिलवायी है । सुनो अगर कहो तो मैं आपके रहने के लिए बात मेमसाहेब से करूं , उनके ऊपर वाला पोर्शन खाली है यदि वो किराये पर दे दें तो

               - हाँ करो ना जी ।

               बस यूँ ही वो बात कर रहे थे तभी बस के हार्न ने दोनो को चौंका दिया था। कोई ओर सवारी वहाँ पर नहीं थी दोनो बस में चढ़ गए , दो वाली एक पूरी सीट खाली थी दोनो उसी मे बैठ गए थे । लेकिन जब बैठ रहे थे तो भावेश ने बैठने से पहले ऊपर लिखा हुआ देखने की कोशिश की तो भाविका ने हंसकर कहा

               - बैठ जाइए लेडीज सीट नहीं है ये ।

               भावेश मुस्कुरा दिया था उसकी इस बात पर। भाविका ने बात बढ़ाते हुए कहा

- कल तो मैं नहीं आऊँगी , हाँ परसो आऊँगी ठीक नो बजे मेरा इन्तज़ार करना मगरपट्टा बस स्टेण्ड पर 

भावेश गर्दन हिला कर हाँ भरी 

 - अच्छा कल खाने का क्या करागे

- जी वो गेस्ट हाउस वालों को ही बोल दूंगा कि मुझे कल सुबह ही दोपहर के लिए चार रोटी और सब्जी पैक कर दें

- गुड लेकिन परसों मत लाना खाना मैं लेकर आ जाऊँगी

-  एक बात बोलूं ?

- जी

- आप मुझे जानती भी नहीं हैं और किसी भी अनजान के लिए इतना कुछ ?

- पहली बात तो भावेश जी हम दोनो अब अनजान नहीं रहे, दूसरी बात यह कि आपने भी मुझ पर विश्वास करके ही मुझे अपने घर के बारे में बिना संकोच के बता दिया और ये भी एक संयोग ही है कि  हम दोनों की ज़िन्दगी लगभग एक जैसी ही है  इसलिए आज से हम दोनो दोस्त हैं मंजूर है आपको

- जी मंजूर

               और फिर दोनो एक साथ हँस दिय थे । बातों बातों में पता ही चहीं चला कि मगरपट्टा आ गया था । भाविका ने बाय बोलकर परसों मिलने का वादा किया था । उसके जाने के बाद वो उसी के बारे मे सोच रहा था । यादों के आवारा बादलों के साथ भावेश यूँ ही उड़ रहा था कि अचानक ही एक उद्घोषण ने उसका ध्यान बंटाया । जो भी यात्री कोच्ची से जयपुर की यात्रा कर रहे हैं वो लॉज एरिया में अपना डिनर ले लें उनकी अगली लिंक फ्लाइट साढ़े ग्यारह बजे प्रस्थान करेगी । भावेश सुस्त कदमों से लॉज एरिया की तरफ चल दिया । खाना खाया यहाँ उसे आज चिकन करी और रोटी मिली थी । भरपेट खाकर वो सुस्ताने लगा था अभी भी फ्लाइट में करीब डेड़ घण्टा बाकी था इसलिए वहीं पर बैठकर सुस्ताना ठीक लग रहा था किन्तु यह डर भी था कहीं नींद ना आ जाए क्यों कि आज थकान महसूस कर रहा था । वैसे थकान शाररिक से ज़्यादा मानसिक थी तभी भाविका का फोन आ गया था । भाविका ने पूछा खाना खाया तो भावेश ने कहा

- हाँ अभी अहमदाबाद एयरपोर्ट लाज में बैठा हूँ 

 बस तुम्हारे बारे में ही सोच रहा था ।

- अच्छा जानूं तो सही हमारे सैंया जी हमारे लिए क्या सोच रहे हैं ?

- अरे बस यार यूँ ही वो अपनी पहली मुलाकात को याद कर रहा था पूणे की वो सुबह और फिर दोपहर में यरवदा रोड़ पर सोशल रिसर्च डिपार्टमेन्ट के थोड़े दूर वाला वो बस स्टैण्ड और वहीं पर वो तुम्हारा लाया जेल का खाना जिसे हमने उसी बस स्टैण्ड के फर्श पर बैठ कर साथ खाया था ।

- अरे वाह सब कुछ याद है तुम्हें ?

- हाँ भावी, वो क्षण ही हमारी ज़िन्दगी को मोड़ देने वाला था, वो क्षण नहीं आता तो आज हम इस तरह एक दूसरे के लिए

बीच में ही भाविका ने बात काटते हुए बोला

 - ओ. के. माई डियर फिलोस्फर हसबेण्ड

 अब ये बताओ पूणे से जयपुर कब तक पहुँचोगे

 उसने छेड़ते से बोला

- यस डार्लिंग बट राइट नाउ म एट अहमदाबाद

-’यस दैट आई नो यू आर फीजिकली देयर

- ओह म सॉरी यू आर राइट डार्लिग

- ओ.के टेक केयर एण्ड गो बैक टू पूणे  मीट सून

               इतना कह कर भाविका ने फोन काट दिया था । लेकिन भावेश अभी भी भाविका की ज़ुल्फों में ही कैद था । हाँ भावेश हमेशा ही भाविका की आँखों और ज़ुल्फों का दीवाना था । आज भी जब वो पचास बरस का हो चुका है तब भी उसे भाविका की जुल्फों से खेलता था । भाविका आज भी उसे बीस की ही लगती थी। लांज में बैठा वो न जाने कब फिर यादों के जहाज पर सवार हो उड़ गया  पूणे के यरवदा रोड़ पर । यादों के जहाज ने यही पर लैण्ड करना उचित समझा था । उसे याद आया कि एक दिन भाविका उसके बॉस के पास अपने अगले रिसर्च प्रोजेक्ट के लिए आयी थी । इस बार बॉस उसे वो प्रोजेक्ट देने के मूड में नहीं था । पुरूष की फ़ितरत होती है कि उसके लिए सामने खड़ी चाहे औरत हो या लड़की वो लपलपाती जीभ से देखता है । बॉस भी भाविका से कुछ इसी तरह की फ्रीडम चाहता था इसलिए उसने प्रोजेक्ट के साथ शर्ते रखी कि वो बॉस को खुश करें । भाविका को बेहद नागवार लगा था और तमतमाती सी बाहर निकल गयी थी ।  मैं कुछ भी नहीं समझा था कि क्या हुआ । हाँ यह तो मालुम था कि अगले प्रोजेक्ट को फाइनल करने के लिए बॉस ने उसे आज बुलाया था लेकिन अचानक ही क्या हुआ । मैं सोच ही रहा था कि भाविका के पीछे जाकर पता करूँ लेकिन तभी बॉस ने मुझे बुलावा भेज दिया था और पाँच दिन के गाँवों में सर्वे के लिए जाकर वहीं रहने का आदेश दिया । दरअसल यह सर्वे उसी प्रोजेक्ट का ही हिस्सा था जो भाविका को देने की सोच रहा था। बात बिगड़ गयी तो गुस्से में आकर उसने मुझे बाहर का प्लान बना डाला था ताकि पीछे से वो भाविका को बुलाकर राज़ी कर पाये । उसे अब तक यह महसूस हो चुका था कि भाविका काफी ज़्यादा भावेश की ओर मुड़ चुकी है । लेकिन बॉस का पद और बॉस होने का अहंकार भाविका की ना को स्वीकार करने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं था । क्या करता मेरी फितरत ही कुछ ऐसी थी कि जहाँ भी किसी लाचार प्रताड़ित व्यक्ति को देखता तो मैं उसकी मदद करने को तत्पर हो उठता था इसी बात पर बॉस मुझे ही इमोशनल फूल करकर बुलाते थे। कहते थे कि हम सरकारी सेवक हैं गर्वमेन्ट आफिसर्स अण्डरस्टेण्ड, वी आर नोट सोशल वर्कर्स ओ के। हमें कोई चुनाव नहीं लड़ना है जो हम इस तरह से उनके बीच जाकर उनके दुख दर्द के भागीदार बने । अपनी नौकरी करो और मस्त रहो  ये सब ग़रीब अपनी ग़रीबी में ही पैदा हुए हैं और इसी में इनको मरना है । बॉस की इस तरह की बातें मेरे को भीतर तक कचोटती थी हम सोशल रिसर्च करते हैं तो क्या हम इन्सान नहीं हैं? क्या हमारे अन्दर इन्सानियत नहीं है । मैं भी बेहद ग़रीब परिवार का हूँ भाविका भी उसी ग़रीबी का  हिस्सा है और आज जब मैं थोड़ा सा समर्थ हो गया हूँ तो क्या अपनी जड़ों को सींचना छोड़ दूँ , बहुत परेशान था उस दिन मैं । शाम को आफिस छूटते ही बस पकड़ी और सीधा भाविका के घर पहुँच गया था । इससे पहले एक बार भाविका ही लेकर गयी थी अपने घर । मुझे अपने घर देख कर वो समझ गयी थी कि आज की घटना की जानकारी लेने ही भावेश आया है । वो कुछ भी नहीं बोली थी लेकिन उसकी आँखों से टपके दो मोतियों ने सारी दास्तान कह डाली थी । मैं भी कुछ न बोला था बस उसके पीछे हो लिया था उसके घर में और सीधा खाट पर जा बैठा था । अभी माँ साहेब के घर काम करने को गयी थी भाविका अकेली ही थी । अचानक ही न जाने मुझे क्या सूझा और पास खड़ी भाविका के आँसूओं को अपने हाथों से पोंछ दिया वो भी लरजती बदली टूट कर बरस पड़ी थी । अनजाने ही उसे मैने अपने कंधे से लगा लिया था । कितने देर यूँ ही खड़े थे पता नहीं लेकिन बाहर लोहे का दरवाज़ा खुलने की आवाज़ पर वो एक दम चौंक पड़ी थी बोली माँ आ गयी है । अपने आँसू पानी में डुबोकर मुँह पोंछ लिया था और किचन में चली गयी थी चाय बनाने को । मैं ठगा सा खड़ा था और सोच रहा था कि अचानक ही आज यह क्या हो गया । भावनाओं का ज्वार उफाने मार रहा था तभी उसकी माँ भीतर कमरे मे आ गयी थी । मुझे देखकर वो बोली

 अरे बेटा आओ कब आए थे भाविका कहाँ गयी

मैं बस बोल नहीं पाया था भाविका ने बोला था

 मैं यहाँ हूँ आई ,चाय बना रही हूँ तुम भी पीओगी ना 

और माँ ने कहा था

 - हाँ 

फिर मेरी तरफ होकर बोली बेटा बैठो ना खड़े क्यों हो खाट पर ही बैठ जाओ ,और वो खुद नीचे फर्श पर ही बैठ गयी थी । न जाने मुझे क्या सूझी थी मैं भी उसकी आई के साथ नीचे ही बैठ गया था । वो बोली

 - बेटा ये क्या ऊपर बैठो ना, तुम्हारे कपड़े ख़राब हो जाएंगे ।

भावेश बोला था

  - माँ के पास बैठने से कपड़े खराब नहीं बल्कि वो तो सही हो जाते हैं ।

इस बात पर भाविका की आई हँस दी थी तभी भाविका चाय लेकर आ गयी थी और नीचे फर्श पर ही हम दोनो के साथ बैठ गयी थी । भावेश ने अब एक बार फिर से भाविका की ओर रुख करके कहा

हाँ अब बताओ क्या हुआ था आज ?

 भाविका ने माँ की तरफ आँख से इशारा करके इशारों में ही कहा माँ है । भावेश बोला

 देखो भाविका जो भी है सब कुछ साफ होना चाहिए

माँ से तो कुछ नहीं छिपाना चाहिए ।

भाविका की माँ आशंकित सी नज़रों से भाविका को देखने लगी तो भाविका ने बिना किसी लुकाव छिपाव के पूरी बात बता दी थी । इस पर भावेश बोला

- वो बॉस का बच्चा मुझे पाँच दिन के ट्यूर पर क्यों भेज रहा है गाँवों में अब समझ आया

   भाविका बोली

 - क्या आपको ट्यूर पर भेज रहे हैं वो लोग---- 

अरे तो क्या हुआ ये तो पार्ट ऑफ जोब है ना

यू डांन्टवरी मैं सब कुछ संभाल लूंगा और हाँ वो प्रोजेक्ट भी तुम्हें  ही मिलेगा

चाय पीकर वो निकलना चाह रहा था तभी भाविका की आई ने कहा

- बेटा हम तो ग़रीब लोग हैं तुम तो सरकारी अफ़सर हो  लेकिन आज खाना यहीं खा जाओ

 भावेश मना नहीं कर पाया था । रात खाना खाकर जब वो भाविका के साथ बाहर निकला तो किरकिरे साहब हाँ  जिनका मकान था वो ही टहल रहे थे सो मिल गए । भाविका ने किरकिरे साहब से भावेश का परिचय करवाया तो किरकिरे साहब बोले थे

- यंग मेन आइ नो सोशल रिसर्च डिपार्टमेन्ट

आई थिंक गोडबोले इज देयर, ही माइट बी यूअर डाइरेक्टर

भावेश बोला

- यस सर

- ओ के एनी प्राबलम

- नो सर बट्

- व्हाट यंग मैन व्हाट बट

- नथिंग सर, इट्स आलराइट

- नो इट्स नाट आलराइट, टेल मी यू नो एम. ए मिलिट्री मैन एण्ड

- यस सर भाविका टोल्ड मी अबाउट यू

- दैन टैल मी

- सर वो

तभी भाविका ने बोला

- सर

-फिर सर कितनी बार बोला है भाविका बेटा यू जस्ट काल मी अंकल

- यस सर

- फिर से

- जी अंकल,

  वो बात ये है कि इनके आफिस में एक प्रोजेक्ट था जिस पर मैं काम करना चाह रही थी   इससे पहले भी एक प्रोजेक्ट अभी पूरा किया है मैंने

- हाँ तो क्या हुआ

तभी भावेश बीच में ही बोला

- सर वो प्रोजेक्ट गोडबोले सर भाविका को नहीं देना चाह रहे हैं 

वो इस पर किरकिरे साहब ने पूछा

- क्या पहले वाले प्रोजेक्ट मे कोई कमी थी इसके

- नो सर बट

- यंग मैन यू है अ प्राबलम आफ बट

तभी भाविका बोली थी

- अंकल मैं बोलती हूँ उस आदमी ने प्रोजेक्ट के बदले में मुझसे------

- ओह आई अण्डरस्टैण्ड यंग मैन टूमॉरो गोडबोले विल नाट बी यूअर डाइरेक्टर

और फिर वो अन्दर चले गए बिना कुछ बोले ही । किरकिरे साहब और उनकी मेमसाब दोनो ने ही भाविका को एक बेटी की तरह से पढा़या और इस काबिल बनाया था इसलिए किरकिरे साहब का इस तरह का व्यवहार अनपेक्षित नहीं था । भावेश ने भाविका से विदा ली और पैदल ही चल निकला था अपने किराये के मकान की ओर कोई दो किलोमीटर दूर था भाविका के घर से ।

भावेश को दौरा आदेश मिल चुके थे इसलिए वो अगले दिन गाँवों के दौरे पर पाँच दिन के लिए चला गया था । इधर अगले दिन वास्तव में गोडबोले साहब का तबादला टेलीफोन आदेश मिल गया था और फोरन रिलीव होकर हैडक्वार्टर रिपोर्ट करने के लिए कहा गया था । भावेश अपनी ईमानदारी से गाँवों का दौरा कर ही रहा था कि एक पुलिस वाले ने उनकी गाड़ी को रुकवाया और कन्फर्म किया कि वो भावेश ही है । फिर कहा सर आपके लिए वायरलेस मैसेज पूणे से आया है कि फोरन आपके पूणे ऑफिस लौटना है कोई इमरजेन्सी बताई । भावेश ने ड्राइवर को वापस लौटने के लिए कहा । कोई बारह बजे दोपहर वो पूणे आफिस पहुँचा था । पहुँचते ही पता चला कि जयपुर से ट्रंककाल आया था । माँ सीरियस है फोरन रवाना हो जाओ । भावेश बिना देर किए ही मुम्बई के लिए फिर मुम्बई से ट्रेन पकड़ जयपुर वाया कोटा के लिए रवाना हो गया था । मन में कितनी ही आशंकाएं लिए पूर पैंतीस घण्टे की यात्रा के बाद वो घर पहुँचा था । पता चला कि माँ पानी लाते समय फिसल कर गिर गई थी सर पर गहरी चोट लगी है । बेहोश है बस भावेश - भावेश ही बड़बड़ाती है । वो घबराहट मे सीधा एस. एम. एस अस्पताल की ओर दोड़ने लगा था । एक जने ने अपने स्कूटर पर बिठाकर उसे अस्पताल छोड़ा । अस्पताल पहुँचते ही वो सीधा न्यूरो सर्जरी वार्ड मे माँ के पास गया । डाक्टरों से बातचीत से पता चला कि चोट गंभीर है कुछ भी नहीं कहा जा सकता है । वो वहीं पर अपना सर पकड़ कर बैठ गया । माँ से बात करने की कोशिश की लेकिन कोई हलचल नहीं थी । दो दिन तक बस ऐसे ही रहा बदहवास सा खाने पीने की तो सुध ही कहा थी । तीसरे दिन अचानक ही माँ ने आँख खोली तो भावेश को सामने पाया माँ मुस्कुराई । भावेश ने का हाथ अपने हाथ में लेकर आँसुओं की झड़ी के साथ खूब चूमा । माँ ने धीरे से अपना हाथ उठाने का प्रयास किया फिर पूरी ताकत से हाथ उठाया और भावेश के सर पर रखा । अपने हाथ से उसको सिर सहलाया और फिर हाथ एक तरफ लुड़क गया । माँ अब नहीं थी सामने केवल माँ की पार्थिव देह थी । डाक्टर्स ने डैड डिक्लेयर कर बाडी भावेश को दे दी थी । भावेश के सर से अब माँ का साया उठ चुका था । क्रिया कर्म करके वो पूरे पन्द्रह दिन बाद पूणे लौटा था ।

इधर भाविका इन पन्द्रह दिनों में कोई चार पाँच बार भावेश के लिए पूछने आ चुकी थी । बाहर चपरासी से ही पूछ कर चली जाती थी । उसे नहीं मालुम था कि गोडबोले साहब का तबादला वास्तव में हो गया था । भावेश की तो दुनिया ही उजड़़ चुकी थी । अगले दिन फिर भाविका पूछने आफिस आई थी तो पता चला कि भावेश आ गया है और माँ की मौत के कारण बुरी तरह से टूट चुका है ,वो सीधी भावेश के कमरे में गई । भाविका को देखते ही भावेश की आँखे डबडबा आई । वो अपनी कुर्सी से उठकर भाविका के साथ बाहर चायवाले के पास आ गया । भाविका का मन हो रहा था कि उसका सिर अपने पास लेकर उसे सहलाए संभाले लेकिन ऐसा कर न सकी । वो पूरे दिन वहीं पर साथ ही रही । शाम को भावेश के मना करने के बावजूद भी उसे अपने साथ ही खुद के घर लेकर गयी । वहाँ उसकी माँ ने भावेश को वास्तव में माँ का सा प्यार दिया तो और अधिक भावुक होकर सच में रोने लगा था । माँ उसे पुचकारती रही और भाविका खाना बनाने मे लगी थी । रात का खाना खाया और फिर जाने को हुआ तो भाविका बोली

   - आज की रात यहीं रुक जाते तो ठीक था ना ।

उसकी आई ने भी कहा

- बेटा यहीं रुक जाओ सो जाएंगे तीनो यहीं पर ।

पता नहीं क्यों भावेश न चाहते हुए भी वहीं रुक गया । अगली सुबह ज़ल्दी उठकर पैदल ही अपने कमरे पर गया नहा धोकर आफिस के लिए रवाना हो गया था । दोपहर में भाविका लंच लेकर आई थी । उसे मालुम था कि ये भला आदमी अभी खाना नहीं खाएगा । सच में भावेश ने खाना नहीं बनाया था । आज भाविका ने उसे समझाया कि वो अकेला नहीं है । आई है और मैं भी ही हूँ भाविका का अपनापन तो पहले दिन से ही अच्छा लगता था लेकिन आज शायद भावेश को उसकी ज़रूरत सबसे ज़्यादा थी । अनजाने ही आज उसने भाविका का हाथ अपने हाथ में ले लिया और काफी देर यूँ ही बैठा रहा। धीरे धीरे भावेश नार्मल होने लगा था और भाविका भी उसको समय समय पर संभालती थी ।

एक दिन अचानक ही भाविका की माँ को सीने में दर्द उठा और वो कुछ ही देर मे चल बसी । अस्पताल भी नहीं पहुँच पाए थे किरकिरे साहब उसे लेकर । किरकिरे साहब ने ही भावेश को फोन करके बुलाया था । माँ की चिता को अग्नि भाविका ने ही दी थी जो कि उस समय बिल्कुल अलग था सामाजिक दृष्टिकोण से । भाविका का पूरा संसार ही जैसे ख़त्म हो गया था । किरकिरे साहब और उनकी पत्नी ने भाविका को संभाला लेकिन किरकिरे साहब की बूढ़ी आँखे जानती थी कि अगर असली हीलिंग टच दे सकता है तो वो केवल भावेश ही है । भावेश भी इस बात को जानता था इसलिए वो दिन में भाविका के पास ही रहता था । उसने आफिस से दस दिन की छुट्टी ले ली थी । राम में वो अकेली लड़की के साथ उसके क्वार्टर में रहना उचित नहीं समझता था । वैसे भी रात में भाविका को किरकिरे साहब की पत्नी अपने साथ ही सुलाने लगी थी । बारह दिन की रस्में पूरी करने के बाद अचानक ही भावेश ने भाविका के सामने एक प्रस्ताव रखा जिसे भाविका को चौंका भी दिया था और सोचने पर विवश भी कर दिया था । वो सोच रही था कि भावेश का प्रस्ताव कहीं मेरी मजबूरी के कारण तो नहीं है ,पूरा हफ़्ता गुज़र गया इस उहापोह में । कुछ भी नहीं समझ पा रही थी वो बस गुमसुम अपने कमरे में अकेली । किरकिरे साहब की पत्नी उसे जितना संभाल पाती संभालती लेकिन संभलना तो खुद को ही पड़ता है ना । उसे भी संभलना था वो भी संभली । इसी बीच अपने प्रस्ताव का जिक्र भावेश ने किरकिरे साहब से भी कर दिया । उसका यह ज़िक्र रंग लाया ,अगले ही दिन थोड़े से गुस्से में भाविका भावेश के किराये के कमरे में सुबह सुबह ही आ पहुँची । भावेश उसके तमतमाए चेहरे से समझ गया था कि किरकिरे साहब ने उससे बात की है । थोड़ी देर के गुस्से के बाद वो बोली चलो आज छुट्टी कर लो और मेरे साथ चलो । भावेश नहा कर उसके साथ हो लिया । वो सीधे किरकिरे साहब के बंग्ले में लेकर गयी और फिर उन तीनों को साथ लेकर पास के आर्य समाज मन्दिर चली गई । भावेश कुछ भी समझ नहीं पाया था लेकिन किरकिरे साहब मंद मंद मुस्कुरा रहे थे । मन्दिर पहुँच कर वो बोली

 मुझसे शादी करना चाहते हो ना

तो हम आज ही और अभी यहीं शादी करेंगे,

बोलो मंजूर है ?

भावेश जैसे चेतना शून्य सा हो गया था

तभी किरकिरे साबह बोले

यंग मैन व्हाट यू से, यस ओर नो ?

भावेश के मुँह से निकला

यस सर

               उसके इस तरह से यस सर बोलने पर भविका और किरकिरे साहब की पत्नी ज़ोर से हँस दिए थे ठहाका लगा कर । भावेश अपने ही विचारों वैतरणी पर सवार यादों की नदी मे हिचकोले खा रहा अचानक ही उसके कानो में एक गूँज सी सुनाई पड़ी

दोज पैसेन्जर्स हू आर ट्रेवलिंग फ्राम कोच्ची टू जयपुर एण्ड केलकट्टा मे नाऊ प्रोसीड फोर बोर्डिंग इन फ्लाइट नम्बर एआई 406 ई फ्रोम अहमदाबाद टू कैलकट्टा वाया जयपुर ।

 भावेश ने अपना लेपटाप बैग उठाया और बोर्डिंग गेट नम्बर 2 की ओर चल दिया जहाँ पर पहले से ही काफी सारे यात्री कतार लगा कर खड़े थे । अपनी बारी के इन्तज़ार में ।














अचानक लग झटके साथ भावेश की तन्द्रा टूटी । वो लैण्ड कर चुके थे अहमदाबाद में । यहाँ से उसे जयपुर के लिए दूसरी लिंक फ्लाइट पकड़नी थी । अभी उसे तीन घण्टे तो अहमदाबाद एयरपोर्ट पर गुज़ारने थे। अहमदाबाद से जयपुर के लिए फ्लाइट रात ग्यारह बजे है । डिनर भी एयरपोर्ट पर मिलने वाला था। सभी यात्रियों के साथ अपना लेपटॉप बैग उठाकर भावेश भी नीचे उतरने लगा था । एयरपोर्ट के बाहर वो जाना भी नहीं चाहता था । दोबारा चैक इन करने का झंझट कौन मोल ले और फिर अहमदाबाद तो वो पचासों बार आ चुका था इसलिए कोई क्रेज भी नहीं था । वो सुस्त कदमों से लांजिग एरिया में कुछ अन्य यात्रियों के साथ चल दिया था । चाय तो वो फ्लाइट में ही पी चुका था इसलिए चाय की इच्छा नहीं थी लेकिन जब लाजिंग एरिया में आ ही गया था तो उसने एक कोक ले लिया और पीने लगा था वैसे उसका मन तो बीयर के लिए हो रहा था लेकिन गुजरात ड्राइ एरिया होने के कारण बीयर नहीं मिल सकती थी । कोक पीते पीते ही वो फिर से अपनी ही यादों की गलियां में निकल पड़ा था बस यूँ ही विचरण करने को । उसे भाविका के साथ वो पहली मुलाकात याद आ गई थी जब वो नई-नई नौकरी जोइन करने पूणे पहुँचा था ।

मराठी बिल्कुल नहीं आती थी। सिटी बस में वो ग़लती से महिला सीट पर बैठ गया था तभी भाविक आई थी। कुछ देर चुपचाप खड़ी रही फिर बोली थी सीट प्लीज। और भावेश ने उसे घूर कर देखा था सोचा मैं बैठा बुरा लग रहा हूँ। वो फिर से बोली थी सीट प्लीट इस बार बड़े ही अनमन से उठकर उसे सीट दी थी। तभी वो बोली थी शायद आप गलती से वीमन सीट पर बैठ गए थे। एनी वे वी केन शेयर और भावेश को अपनी ग़लती का पता चल गया था उसने धीरे से कहा था थैंक यू जी बट यू रिलेक्स आई एम आलराइट । बगल में बैठी महिला अगले स्टाप पर उतर गयी थी कोई और सवारी नहीं चढ़ी थी सो भविका ने धीरे से बोला जब तक कोई लेडी पेसेन्जर नहीं आती आप बैठ जाइए प्लीज । भावेश को भाविका का प्लीज बोलना बहुत ही अच्छा लगा था । पूणे में पहला दिन आफिस भी यरवदा रोड़ पर शहर से थोड़ा दूस जहाँ पर बसों की संख्या अपेक्षाकृत कम होती थी । यह बात पूरे पच्चीस बरस पहले की है जब भावेश पूणे ज्वाइन करने गया था । साथ बैठने पर भाविका ने ही बात शुरू की थी

-लगता है आप इस शहर मे नए आए हैं ।

भावेश ने भी छोटा सा जवाब दिया था

- जी

भाविका ने फिर पूछा

- नया शहर है आपके लिए आप जाब करते हैं ।

इस बार भावेश थोड़ संयत होकर बोला

- जी आज ही ज्वाइन करने आया हूँ। भारत सरकार का एक विभाग है, उसी में यरवदा रोड़ पर ज्वाइन करना है ।

- आपका नाम जान सकती हूँ मैं

- जी भावेश है

- अरे वाह आप भावेश और मैं भाविका, भावेश जी आपको तो शायद क्वाटर मिलेगा ।

- जी पता नहीं अभी तो आज पहली बार ही जा रहा हूँ

- वैसे आप कहाँ से हैं आईमीन विच स्टेट

- जी मैं जयपुर राजस्थान से हूँ आज सुबह ही ट्रेन से आया हूँ ,यहाँ स्टेशन के सामने ही एक गेस्ट हाउस में ठहरा हूँ । वहीं से पता किया कि यह बस मुझे आफिस तक पहुँचा देगी ।

- जी बिलकुल सही बताया

- आप भी जोब करती हैं

- जी नहीं मैं यरवदा जेल में कैदियों पर एक रिसर्च कर रही हूँ  इसलिए इन दिनों जाना पड़ रहा है।

- सो नाइस

- मैं रिसर्च स्कालर तो नहीं हूँ लेकिन सोशल आसपेक्ट्स पर ही मेरी रूचि रही है ,और जहाँ ड्यूटी जाइन करनी है वो भी सोशल बिहेवियर पर ही स्ट्डी करता है ।  

- यू मीन डिपाटैमेनट ऑफ सोशल रिसर्च एण्ड स्ट्डीज

- जी

- अरे, वहाँ तो कई बार जाती हूँ मैं चलो आज वापस आते समय मैं आपके आफिस आ जाऊँगी फिर साथ ही वापस चलेंगे ।

- जी शुक्रिया

- शुक्रिया की कोई बात नही है भावेश जी आप हमारे शहर में पहली बार आये हैं इसलिए ये तो हमारा फर्ज़ है ।

- थैंक यू जी

बस बात करते करते ही डिपाटैमेन्ट ऑफ सोशल रिसर्च एण्ड स्टेडीज आ गया था इसके थोड़ा आगे ही यरवदा जेल है । भावेश अपने गन्तव्य पर उतर गया भाविका को थैंक्स बोलने के बाद वो सीधा आफिस की ओर रूख कर गया । आफिस में पहला दिन, नौकरी का पहला दिन, कुछ भी समझ से बाहर था । वो अपनी सभी सीनियर्स से मिल रहा था कोई उसे ध्यान से काम करने की सलाह दे रहा था तो कोई उसे अभी कुछ भी करने से मना कर रहे थे । सबका अपना अपना ज्ञान अपनी अपनी सलाह । भावेश चुपचाप सभी की सुनकर गर्दन हिला देता था । एक तो मराठी लहजे वाली हिन्दी वो भी उत्तर भारत से एकदम अलग काफी मुश्किल हुई थी । दोपहर हो गई थी लंच के लिए तो उसने यही सोचा था कि आफिस की केन्टीन तो होगी ही खा लेगा लेकिन केन्टीन जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी । बाकी लोग शायद खाना सुबह ही खाकर आते थे इसलिए किसी ने भी खाने की बात नहीं की ।

वो सोच ही रहा था कि अचानक ही बिना मांगी मुराद पूरी हो गई थी । वही बस वाली लड़की हाँ भाविका उसके आफिस में आई थी और सीधे बॉस के कमरे मे चली गयी थी । शायद वो बॉस को पहले से ही जानती थी । वो अन्दर गयी उसके कोई पाँच-सात मिनट बाद ही चपरासी बुलाने आ गया था मुझे । मैं सीधा उसके पीछे पीछे हो लिया था । बॉस के कमरे में अनुमति लेकर अन्दर गया । वहाँ पहले से ही भाविका बैठी थी लेकिन फिर भी उसने ऐसा ही भाव दिया जैसे कुछ भी नहीं जानता है । भावेश के आते ही बॉस ने उससे पूछा कि कैसा लगा आफिस तो भावेश सहज भाव से बोला

- सर अच्छा है ।

- खाना खाया

- नहीं सर वो पहला दिन है ना सर पता नहीं था कि यहाँ केन्टीन या आस पास कोई व्यवस्था नहीं मिलेगी कल से लेकर आऊंगा सर

- हूँ कहाँ रूके हो

- सर अभी तो रेल्वे स्टेशन के पास एक गेस्ट हाउस में ही रुका हूँ सर

- ओ के अभी एक क्वाटर बी टाइप का खाली होगा दो तीन दिन में वो तुम्हे अलॉट कर देता हूँ

- जी सर

- इन्हें जानते हो

- सर आज बस में मिली थी ये मेडम

- ये भाविका हैं सोशल रिसर्च स्कालर और हमारे डिपार्टमेन्ट की बहुत बड़ी सहायक

- सर

- भई इन्होंने तुम्हारी सिफारिश की है तो तुम्हे तो स्पेशिल एम्पलोई ही मानना पड़ेगा

- सर मैं पूरी ईमानदारी से काम करूंगा

- हूँ मैंने तुम्हारी प्रोफाईल देखी है वैरी इन्ट्रेसिटंग, देखना बहुत ज़ल्द ही तुम मेरी सीट पर भी आओगे आई सी ए फ्यूचर सोशल साइन्टिस्ट इन यू

- सर

- अच्छा तुमने खाना नहीं खाया है तुम अभी जाओ कल से लंच पैकेट लेकर आना

- सर मैं शाम को खा लूंगा कोई बात नहीं है

- देखो भावेश हम सब जो नौकरी करते हैं तो ना इसी पेट के लिए करते हैं इज़्ज़त, दौलत, शौहरत ये सब बाद की बातें हैं। जाओ और कल ही आना अब ,ओ. के.

- जी सर

इतना कहकर वो बॉस के कमरे से बाहर आ गया था । अपनी बायोडाटा फाइल उठाई और बाहर की ओर चल दिया था । उसने इस बात को नोटिस नहीं किया था कि ठीक पीछे ही भाविका भी आ रही है । वो अपने ही धुन मे बस स्टैण्ड की ओर चला जा रहा था। भाविका को भी लगा कि उसे यह भान नहीं है कि मैं भी पीछे हूँ । यही सोचकर भाविका ने उसे आवाज़ दी

- भावेश जी 

भावेश ने पीछे मुड़कर देखा और भाविका की ओर हाथ जोड़कर कहा

- थैंक यू जी सचमुच बहुत तेज़ भूख लगी है  आपने बॉस से मेरी सिफारिश करके खाने के लिए छूट्टी दिलवा दी लेकिन सच बताऊँ थोड़ा सा अच्छा भी नहीं लगा कि बॉस से पहले दिन ही आपने मेरी सिफारिश भी कर दी ।

वो बोली

- देखिये भावेश जी आप नए आए हैं और मुझे मालुम है आपने खाना भी नहीं खाया है, मैं एक सोशल वर्कर हूँ जानती हूँ कि इन्सान को दो वक्त की रोटी तो समय से मिलनी चाहिए ना । गोडबोले सर के पास मैं अपने रिसर्च को लेकर पचासों बार आई हूँ इसलिए थोड़ा परिचय हो गया है,वैसे भी अब वो मुझे अपने डिपर्टमेन्ट के सोशल सर्वे का काम दे देते हैं, जिसके कारण मेरा रिसर्च का खर्चा भी निकल जाता है। मैं जब भी यरवदा जेल जाती हूँ तो दोहपर का खाना मैं उन कैदियों के साथ ही खाती हूँ ताकि उनको भी अपनापन महसूस हो और मेरा रिसर्च का काम भी पूरी तरह से हो जाए। मैं दो लोगों का खाना लेकर आयी हूँ

आज मैंने उनके साथ खाना नहीं खाया है ,जेलर साहब भी बड़े अच्छे है। मैंने दो लोगों का खाना मांगा तो उन्हांने अलाऊ कर दिया और मैं ले आई 

 खाओगे - -  जेल का खाना

- भाविका जी अभी तो मैं कहीं का भी खाना खा लूंगा

- चलो तो ठीक है अभी बस एक घण्टा बाद ही आएगी। यहीं बस स्टैण्ड के टीन शेड के नीचे फर्श पर बैठकर खा पाओग खाना

- आप खाएंगी तो मैं भी खा लूंगा

दोनो हंसने लगे थे, और खाना खाने लग थे । खाना खाकर बस स्टैण्ड के टीन शेड के पास ही लगी पानी की टूंटी से पानी पिया तो न जाने भाविका को यह शख़्स अलग सा लगा । बस मन कर र रहा था कि इसके बारे में जान ले । बस इसी भाव के कारण ही उसने पूछ लिया

- कौन कौन हे आपके परिवार में भावेश जी 

 - जी बस माताजी और मैं ,पिताजी को मैंने देखा नहीं

 मैं जब छः महिने का था तभी किसी अनजान बीमारी के कारण वो चल बसे थे बस माँ ने गाँव में ही मेहनत मजदूरी करके मुझे पाला और आज इस काबिल बनाया है सच बोलूँ तो आज माँ की बहुत याद आ रही है बहुत खुश थी जब मेरी नौकरी की खबर आयी थी पता है पूरे मौहल्ले मे गुड़ बाँट कर आयी थी हम लोग जयपुर जिले के एक गाँव में रहते थे लेकिन पिताजी के नहीं रहने पर मैं और माँ जयपुर आ गए थे 

भावेश की बात सुनकर भाविका बोली

 - भावेश जी मुझे बहुत अच्छ लगा कि आपने

  अपनी सच्चाई बताने में कोई संकोच नहीं किया

मेरे भी पिताजी नहीं है माँ ने ही मुझे भी पाला है और पढ़ाया भी है बस माँ चाहती है कि मैं खूब पढ़कर सरकारी नौकरी लग जाऊँ और फिर शादी कर लूँ सच बोलूँ तो मैं सरकारी नौकरी बिल्कुल नहीं करना चाहती हूँ क्यों कि मैंने अभी तक की स्ट्डी में यह देखा है कि गरीबों की भलाई के लिए किये जाने वाले कामों का ढिंढोरा जितना पीटा जाता  है उसका केवल दस प्रतिशत ही काम हक़ीकत में होता है बाकी सब दिखावा, ढकोसला और चोर बाज़ारी ।

- हूँ

तभी भावेश बोला

- एक बात बोलूँ जब आपने कहा था ना कि यहाँ फर्श पर बैठकर खा लोगे क्या ? इस बारे में एक ही बात कहनी है जो आदमी ज़मीन से जुड़ा रहता है मिट्टी का साथ नहीं छोड़ता है उसे गिरने का डर कभी नहीं रहता है । गिरने का डर तो उनको सताता है जो लोग ज़मीन छोड़कर हवा में उड़ते हैं और मैं ज़मीन से ही जुड़ा हूँ और ज़मीन पर ही रहना चाहता हूँ

इसलिए ज़मीन पर बैठकर खाने मे मुझे हमेशा खुशी होती है। आपने मेरे बारे मे तो पूछ लिया कुछ अपने बारे में भी बताईये ना ।

- भावेश जी मेरी कहानी आपसे बिल्कुल ही अलग नहीं है । बापू और भाई जब मैं छः साल की थी तब हैजे के कारण मारे गए ,बस मैं और आई, वो मेरी माँ हमारे यहाँ माँ को आई बोलते हैं ना, बस दोनो ही रह गए थे । एक किराये के घर में हम धोले पाटील रोड़ पर रहते थे, वहाँ से निकल कर हम इधर मगरपट्टा के इलाके में एक सड़क के किनारे टूटे से कमरे में आ गए थे खाने को कुछ नहीं था । आई घरों में काम ढूँढने जाती तो कई दिन तक तो काम ही नहीं मिला  लेकिन आई कहती है एक दिन मिलट्री की डिफेन्स फैक्ट्री के एक साहब ने आई को काम भी दे दिया और पीछे सर्वेन्ट क्वार्टर भी बस मैं वहीं पली बढ़ी और पढ़ी । वो मेमसाब बहुत अच्छी हैं मुझे भी बहुत प्यार करती है , अब तो वो रिटायर हो गए हैं लेकिन यहीं पूणे में ही बस गए हैं इसलिए यहीं मगरपट्टा में ही उन साहब के यहाँ आइ अब भी काम करती हैं । मेरी पढ़ाई का पूरा खर्चा वो ही मेमसाब ने उठाया है । मेरे लिए तो साहब और मेमसाब ही भगवान हैं। साहेब ने ही एक दिन मेरी एमए के बाद रिसर्च के लिए कहा था ,  यूजीसी से दो लाख की ओर आपके विभाग से मुझे पाँच लाख की स्कालरशिप भी साहेब ने ही दिलवायी है । सुनो अगर कहो तो मैं आपके रहने के लिए बात मेमसाहेब से करूं , उनके ऊपर वाला पोर्शन खाली है यदि वो किराये पर दे दें तो

               - हाँ करो ना जी ।

               बस यूँ ही वो बात कर रहे थे तभी बस के हार्न ने दोनो को चौंका दिया था। कोई ओर सवारी वहाँ पर नहीं थी दोनो बस में चढ़ गए , दो वाली एक पूरी सीट खाली थी दोनो उसी मे बैठ गए थे । लेकिन जब बैठ रहे थे तो भावेश ने बैठने से पहले ऊपर लिखा हुआ देखने की कोशिश की तो भाविका ने हंसकर कहा

               - बैठ जाइए लेडीज सीट नहीं है ये ।

               भावेश मुस्कुरा दिया था उसकी इस बात पर। भाविका ने बात बढ़ाते हुए कहा

- कल तो मैं नहीं आऊँगी , हाँ परसो आऊँगी ठीक नो बजे मेरा इन्तज़ार करना मगरपट्टा बस स्टेण्ड पर 

भावेश गर्दन हिला कर हाँ भरी 

 - अच्छा कल खाने का क्या करागे

- जी वो गेस्ट हाउस वालों को ही बोल दूंगा कि मुझे कल सुबह ही दोपहर के लिए चार रोटी और सब्जी पैक कर दें

- गुड लेकिन परसों मत लाना खाना मैं लेकर आ जाऊँगी

-  एक बात बोलूं ?

- जी

- आप मुझे जानती भी नहीं हैं और किसी भी अनजान के लिए इतना कुछ ?

- पहली बात तो भावेश जी हम दोनो अब अनजान नहीं रहे, दूसरी बात यह कि आपने भी मुझ पर विश्वास करके ही मुझे अपने घर के बारे में बिना संकोच के बता दिया और ये भी एक संयोग ही है कि  हम दोनों की ज़िन्दगी लगभग एक जैसी ही है  इसलिए आज से हम दोनो दोस्त हैं मंजूर है आपको

- जी मंजूर

               और फिर दोनो एक साथ हँस दिय थे । बातों बातों में पता ही चहीं चला कि मगरपट्टा आ गया था । भाविका ने बाय बोलकर परसों मिलने का वादा किया था । उसके जाने के बाद वो उसी के बारे मे सोच रहा था । यादों के आवारा बादलों के साथ भावेश यूँ ही उड़ रहा था कि अचानक ही एक उद्घोषण ने उसका ध्यान बंटाया । जो भी यात्री कोच्ची से जयपुर की यात्रा कर रहे हैं वो लॉज एरिया में अपना डिनर ले लें उनकी अगली लिंक फ्लाइट साढ़े ग्यारह बजे प्रस्थान करेगी । भावेश सुस्त कदमों से लॉज एरिया की तरफ चल दिया । खाना खाया यहाँ उसे आज चिकन करी और रोटी मिली थी । भरपेट खाकर वो सुस्ताने लगा था अभी भी फ्लाइट में करीब डेड़ घण्टा बाकी था इसलिए वहीं पर बैठकर सुस्ताना ठीक लग रहा था किन्तु यह डर भी था कहीं नींद ना आ जाए क्यों कि आज थकान महसूस कर रहा था । वैसे थकान शाररिक से ज़्यादा मानसिक थी तभी भाविका का फोन आ गया था । भाविका ने पूछा खाना खाया तो भावेश ने कहा

- हाँ अभी अहमदाबाद एयरपोर्ट लाज में बैठा हूँ 

 बस तुम्हारे बारे में ही सोच रहा था ।

- अच्छा जानूं तो सही हमारे सैंया जी हमारे लिए क्या सोच रहे हैं ?

- अरे बस यार यूँ ही वो अपनी पहली मुलाकात को याद कर रहा था पूणे की वो सुबह और फिर दोपहर में यरवदा रोड़ पर सोशल रिसर्च डिपार्टमेन्ट के थोड़े दूर वाला वो बस स्टैण्ड और वहीं पर वो तुम्हारा लाया जेल का खाना जिसे हमने उसी बस स्टैण्ड के फर्श पर बैठ कर साथ खाया था ।

- अरे वाह सब कुछ याद है तुम्हें ?

- हाँ भावी, वो क्षण ही हमारी ज़िन्दगी को मोड़ देने वाला था, वो क्षण नहीं आता तो आज हम इस तरह एक दूसरे के लिए

बीच में ही भाविका ने बात काटते हुए बोला

 - ओ. के. माई डियर फिलोस्फर हसबेण्ड

 अब ये बताओ पूणे से जयपुर कब तक पहुँचोगे

 उसने छेड़ते से बोला

- यस डार्लिंग बट राइट नाउ म एट अहमदाबाद

-’यस दैट आई नो यू आर फीजिकली देयर

- ओह म सॉरी यू आर राइट डार्लिग

- ओ.के टेक केयर एण्ड गो बैक टू पूणे  मीट सून

               इतना कह कर भाविका ने फोन काट दिया था । लेकिन भावेश अभी भी भाविका की ज़ुल्फों में ही कैद था । हाँ भावेश हमेशा ही भाविका की आँखों और ज़ुल्फों का दीवाना था । आज भी जब वो पचास बरस का हो चुका है तब भी उसे भाविका की जुल्फों से खेलता था । भाविका आज भी उसे बीस की ही लगती थी। लांज में बैठा वो न जाने कब फिर यादों के जहाज पर सवार हो उड़ गया  पूणे के यरवदा रोड़ पर । यादों के जहाज ने यही पर लैण्ड करना उचित समझा था । उसे याद आया कि एक दिन भाविका उसके बॉस के पास अपने अगले रिसर्च प्रोजेक्ट के लिए आयी थी । इस बार बॉस उसे वो प्रोजेक्ट देने के मूड में नहीं था । पुरूष की फ़ितरत होती है कि उसके लिए सामने खड़ी चाहे औरत हो या लड़की वो लपलपाती जीभ से देखता है । बॉस भी भाविका से कुछ इसी तरह की फ्रीडम चाहता था इसलिए उसने प्रोजेक्ट के साथ शर्ते रखी कि वो बॉस को खुश करें । भाविका को बेहद नागवार लगा था और तमतमाती सी बाहर निकल गयी थी ।  मैं कुछ भी नहीं समझा था कि क्या हुआ । हाँ यह तो मालुम था कि अगले प्रोजेक्ट को फाइनल करने के लिए बॉस ने उसे आज बुलाया था लेकिन अचानक ही क्या हुआ । मैं सोच ही रहा था कि भाविका के पीछे जाकर पता करूँ लेकिन तभी बॉस ने मुझे बुलावा भेज दिया था और पाँच दिन के गाँवों में सर्वे के लिए जाकर वहीं रहने का आदेश दिया । दरअसल यह सर्वे उसी प्रोजेक्ट का ही हिस्सा था जो भाविका को देने की सोच रहा था। बात बिगड़ गयी तो गुस्से में आकर उसने मुझे बाहर का प्लान बना डाला था ताकि पीछे से वो भाविका को बुलाकर राज़ी कर पाये । उसे अब तक यह महसूस हो चुका था कि भाविका काफी ज़्यादा भावेश की ओर मुड़ चुकी है । लेकिन बॉस का पद और बॉस होने का अहंकार भाविका की ना को स्वीकार करने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं था । क्या करता मेरी फितरत ही कुछ ऐसी थी कि जहाँ भी किसी लाचार प्रताड़ित व्यक्ति को देखता तो मैं उसकी मदद करने को तत्पर हो उठता था इसी बात पर बॉस मुझे ही इमोशनल फूल करकर बुलाते थे। कहते थे कि हम सरकारी सेवक हैं गर्वमेन्ट आफिसर्स अण्डरस्टेण्ड, वी आर नोट सोशल वर्कर्स ओ के। हमें कोई चुनाव नहीं लड़ना है जो हम इस तरह से उनके बीच जाकर उनके दुख दर्द के भागीदार बने । अपनी नौकरी करो और मस्त रहो  ये सब ग़रीब अपनी ग़रीबी में ही पैदा हुए हैं और इसी में इनको मरना है । बॉस की इस तरह की बातें मेरे को भीतर तक कचोटती थी हम सोशल रिसर्च करते हैं तो क्या हम इन्सान नहीं हैं? क्या हमारे अन्दर इन्सानियत नहीं है । मैं भी बेहद ग़रीब परिवार का हूँ भाविका भी उसी ग़रीबी का  हिस्सा है और आज जब मैं थोड़ा सा समर्थ हो गया हूँ तो क्या अपनी जड़ों को सींचना छोड़ दूँ , बहुत परेशान था उस दिन मैं । शाम को आफिस छूटते ही बस पकड़ी और सीधा भाविका के घर पहुँच गया था । इससे पहले एक बार भाविका ही लेकर गयी थी अपने घर । मुझे अपने घर देख कर वो समझ गयी थी कि आज की घटना की जानकारी लेने ही भावेश आया है । वो कुछ भी नहीं बोली थी लेकिन उसकी आँखों से टपके दो मोतियों ने सारी दास्तान कह डाली थी । मैं भी कुछ न बोला था बस उसके पीछे हो लिया था उसके घर में और सीधा खाट पर जा बैठा था । अभी माँ साहेब के घर काम करने को गयी थी भाविका अकेली ही थी । अचानक ही न जाने मुझे क्या सूझा और पास खड़ी भाविका के आँसूओं को अपने हाथों से पोंछ दिया वो भी लरजती बदली टूट कर बरस पड़ी थी । अनजाने ही उसे मैने अपने कंधे से लगा लिया था । कितने देर यूँ ही खड़े थे पता नहीं लेकिन बाहर लोहे का दरवाज़ा खुलने की आवाज़ पर वो एक दम चौंक पड़ी थी बोली माँ आ गयी है । अपने आँसू पानी में डुबोकर मुँह पोंछ लिया था और किचन में चली गयी थी चाय बनाने को । मैं ठगा सा खड़ा था और सोच रहा था कि अचानक ही आज यह क्या हो गया । भावनाओं का ज्वार उफाने मार रहा था तभी उसकी माँ भीतर कमरे मे आ गयी थी । मुझे देखकर वो बोली

 अरे बेटा आओ कब आए थे भाविका कहाँ गयी

मैं बस बोल नहीं पाया था भाविका ने बोला था

 मैं यहाँ हूँ आई ,चाय बना रही हूँ तुम भी पीओगी ना 

और माँ ने कहा था

 - हाँ 

फिर मेरी तरफ होकर बोली बेटा बैठो ना खड़े क्यों हो खाट पर ही बैठ जाओ ,और वो खुद नीचे फर्श पर ही बैठ गयी थी । न जाने मुझे क्या सूझी थी मैं भी उसकी आई के साथ नीचे ही बैठ गया था । वो बोली

 - बेटा ये क्या ऊपर बैठो ना, तुम्हारे कपड़े ख़राब हो जाएंगे ।

भावेश बोला था

  - माँ के पास बैठने से कपड़े खराब नहीं बल्कि वो तो सही हो जाते हैं ।

इस बात पर भाविका की आई हँस दी थी तभी भाविका चाय लेकर आ गयी थी और नीचे फर्श पर ही हम दोनो के साथ बैठ गयी थी । भावेश ने अब एक बार फिर से भाविका की ओर रुख करके कहा

हाँ अब बताओ क्या हुआ था आज ?

 भाविका ने माँ की तरफ आँख से इशारा करके इशारों में ही कहा माँ है । भावेश बोला

 देखो भाविका जो भी है सब कुछ साफ होना चाहिए

माँ से तो कुछ नहीं छिपाना चाहिए ।

भाविका की माँ आशंकित सी नज़रों से भाविका को देखने लगी तो भाविका ने बिना किसी लुकाव छिपाव के पूरी बात बता दी थी । इस पर भावेश बोला

- वो बॉस का बच्चा मुझे पाँच दिन के ट्यूर पर क्यों भेज रहा है गाँवों में अब समझ आया

   भाविका बोली

 - क्या आपको ट्यूर पर भेज रहे हैं वो लोग---- 

अरे तो क्या हुआ ये तो पार्ट ऑफ जोब है ना

यू डांन्टवरी मैं सब कुछ संभाल लूंगा और हाँ वो प्रोजेक्ट भी तुम्हें  ही मिलेगा

चाय पीकर वो निकलना चाह रहा था तभी भाविका की आई ने कहा

- बेटा हम तो ग़रीब लोग हैं तुम तो सरकारी अफ़सर हो  लेकिन आज खाना यहीं खा जाओ

 भावेश मना नहीं कर पाया था । रात खाना खाकर जब वो भाविका के साथ बाहर निकला तो किरकिरे साहब हाँ  जिनका मकान था वो ही टहल रहे थे सो मिल गए । भाविका ने किरकिरे साहब से भावेश का परिचय करवाया तो किरकिरे साहब बोले थे

- यंग मेन आइ नो सोशल रिसर्च डिपार्टमेन्ट

आई थिंक गोडबोले इज देयर, ही माइट बी यूअर डाइरेक्टर

भावेश बोला

- यस सर

- ओ के एनी प्राबलम

- नो सर बट्

- व्हाट यंग मैन व्हाट बट

- नथिंग सर, इट्स आलराइट

- नो इट्स नाट आलराइट, टेल मी यू नो एम. ए मिलिट्री मैन एण्ड

- यस सर भाविका टोल्ड मी अबाउट यू

- दैन टैल मी

- सर वो

तभी भाविका ने बोला

- सर

-फिर सर कितनी बार बोला है भाविका बेटा यू जस्ट काल मी अंकल

- यस सर

- फिर से

- जी अंकल,

  वो बात ये है कि इनके आफिस में एक प्रोजेक्ट था जिस पर मैं काम करना चाह रही थी   इससे पहले भी एक प्रोजेक्ट अभी पूरा किया है मैंने

- हाँ तो क्या हुआ

तभी भावेश बीच में ही बोला

- सर वो प्रोजेक्ट गोडबोले सर भाविका को नहीं देना चाह रहे हैं 

वो इस पर किरकिरे साहब ने पूछा

- क्या पहले वाले प्रोजेक्ट मे कोई कमी थी इसके

- नो सर बट

- यंग मैन यू है अ प्राबलम आफ बट

तभी भाविका बोली थी

- अंकल मैं बोलती हूँ उस आदमी ने प्रोजेक्ट के बदले में मुझसे------

- ओह आई अण्डरस्टैण्ड यंग मैन टूमॉरो गोडबोले विल नाट बी यूअर डाइरेक्टर

और फिर वो अन्दर चले गए बिना कुछ बोले ही । किरकिरे साहब और उनकी मेमसाब दोनो ने ही भाविका को एक बेटी की तरह से पढा़या और इस काबिल बनाया था इसलिए किरकिरे साहब का इस तरह का व्यवहार अनपेक्षित नहीं था । भावेश ने भाविका से विदा ली और पैदल ही चल निकला था अपने किराये के मकान की ओर कोई दो किलोमीटर दूर था भाविका के घर से ।

भावेश को दौरा आदेश मिल चुके थे इसलिए वो अगले दिन गाँवों के दौरे पर पाँच दिन के लिए चला गया था । इधर अगले दिन वास्तव में गोडबोले साहब का तबादला टेलीफोन आदेश मिल गया था और फोरन रिलीव होकर हैडक्वार्टर रिपोर्ट करने के लिए कहा गया था । भावेश अपनी ईमानदारी से गाँवों का दौरा कर ही रहा था कि एक पुलिस वाले ने उनकी गाड़ी को रुकवाया और कन्फर्म किया कि वो भावेश ही है । फिर कहा सर आपके लिए वायरलेस मैसेज पूणे से आया है कि फोरन आपके पूणे ऑफिस लौटना है कोई इमरजेन्सी बताई । भावेश ने ड्राइवर को वापस लौटने के लिए कहा । कोई बारह बजे दोपहर वो पूणे आफिस पहुँचा था । पहुँचते ही पता चला कि जयपुर से ट्रंककाल आया था । माँ सीरियस है फोरन रवाना हो जाओ । भावेश बिना देर किए ही मुम्बई के लिए फिर मुम्बई से ट्रेन पकड़ जयपुर वाया कोटा के लिए रवाना हो गया था । मन में कितनी ही आशंकाएं लिए पूर पैंतीस घण्टे की यात्रा के बाद वो घर पहुँचा था । पता चला कि माँ पानी लाते समय फिसल कर गिर गई थी सर पर गहरी चोट लगी है । बेहोश है बस भावेश - भावेश ही बड़बड़ाती है । वो घबराहट मे सीधा एस. एम. एस अस्पताल की ओर दोड़ने लगा था । एक जने ने अपने स्कूटर पर बिठाकर उसे अस्पताल छोड़ा । अस्पताल पहुँचते ही वो सीधा न्यूरो सर्जरी वार्ड मे माँ के पास गया । डाक्टरों से बातचीत से पता चला कि चोट गंभीर है कुछ भी नहीं कहा जा सकता है । वो वहीं पर अपना सर पकड़ कर बैठ गया । माँ से बात करने की कोशिश की लेकिन कोई हलचल नहीं थी । दो दिन तक बस ऐसे ही रहा बदहवास सा खाने पीने की तो सुध ही कहा थी । तीसरे दिन अचानक ही माँ ने आँख खोली तो भावेश को सामने पाया माँ मुस्कुराई । भावेश ने का हाथ अपने हाथ में लेकर आँसुओं की झड़ी के साथ खूब चूमा । माँ ने धीरे से अपना हाथ उठाने का प्रयास किया फिर पूरी ताकत से हाथ उठाया और भावेश के सर पर रखा । अपने हाथ से उसको सिर सहलाया और फिर हाथ एक तरफ लुड़क गया । माँ अब नहीं थी सामने केवल माँ की पार्थिव देह थी । डाक्टर्स ने डैड डिक्लेयर कर बाडी भावेश को दे दी थी । भावेश के सर से अब माँ का साया उठ चुका था । क्रिया कर्म करके वो पूरे पन्द्रह दिन बाद पूणे लौटा था ।

इधर भाविका इन पन्द्रह दिनों में कोई चार पाँच बार भावेश के लिए पूछने आ चुकी थी । बाहर चपरासी से ही पूछ कर चली जाती थी । उसे नहीं मालुम था कि गोडबोले साहब का तबादला वास्तव में हो गया था । भावेश की तो दुनिया ही उजड़़ चुकी थी । अगले दिन फिर भाविका पूछने आफिस आई थी तो पता चला कि भावेश आ गया है और माँ की मौत के कारण बुरी तरह से टूट चुका है ,वो सीधी भावेश के कमरे में गई । भाविका को देखते ही भावेश की आँखे डबडबा आई । वो अपनी कुर्सी से उठकर भाविका के साथ बाहर चायवाले के पास आ गया । भाविका का मन हो रहा था कि उसका सिर अपने पास लेकर उसे सहलाए संभाले लेकिन ऐसा कर न सकी । वो पूरे दिन वहीं पर साथ ही रही । शाम को भावेश के मना करने के बावजूद भी उसे अपने साथ ही खुद के घर लेकर गयी । वहाँ उसकी माँ ने भावेश को वास्तव में माँ का सा प्यार दिया तो और अधिक भावुक होकर सच में रोने लगा था । माँ उसे पुचकारती रही और भाविका खाना बनाने मे लगी थी । रात का खाना खाया और फिर जाने को हुआ तो भाविका बोली

   - आज की रात यहीं रुक जाते तो ठीक था ना ।

उसकी आई ने भी कहा

- बेटा यहीं रुक जाओ सो जाएंगे तीनो यहीं पर ।

पता नहीं क्यों भावेश न चाहते हुए भी वहीं रुक गया । अगली सुबह ज़ल्दी उठकर पैदल ही अपने कमरे पर गया नहा धोकर आफिस के लिए रवाना हो गया था । दोपहर में भाविका लंच लेकर आई थी । उसे मालुम था कि ये भला आदमी अभी खाना नहीं खाएगा । सच में भावेश ने खाना नहीं बनाया था । आज भाविका ने उसे समझाया कि वो अकेला नहीं है । आई है और मैं भी ही हूँ भाविका का अपनापन तो पहले दिन से ही अच्छा लगता था लेकिन आज शायद भावेश को उसकी ज़रूरत सबसे ज़्यादा थी । अनजाने ही आज उसने भाविका का हाथ अपने हाथ में ले लिया और काफी देर यूँ ही बैठा रहा। धीरे धीरे भावेश नार्मल होने लगा था और भाविका भी उसको समय समय पर संभालती थी ।

एक दिन अचानक ही भाविका की माँ को सीने में दर्द उठा और वो कुछ ही देर मे चल बसी । अस्पताल भी नहीं पहुँच पाए थे किरकिरे साहब उसे लेकर । किरकिरे साहब ने ही भावेश को फोन करके बुलाया था । माँ की चिता को अग्नि भाविका ने ही दी थी जो कि उस समय बिल्कुल अलग था सामाजिक दृष्टिकोण से । भाविका का पूरा संसार ही जैसे ख़त्म हो गया था । किरकिरे साहब और उनकी पत्नी ने भाविका को संभाला लेकिन किरकिरे साहब की बूढ़ी आँखे जानती थी कि अगर असली हीलिंग टच दे सकता है तो वो केवल भावेश ही है । भावेश भी इस बात को जानता था इसलिए वो दिन में भाविका के पास ही रहता था । उसने आफिस से दस दिन की छुट्टी ले ली थी । राम में वो अकेली लड़की के साथ उसके क्वार्टर में रहना उचित नहीं समझता था । वैसे भी रात में भाविका को किरकिरे साहब की पत्नी अपने साथ ही सुलाने लगी थी । बारह दिन की रस्में पूरी करने के बाद अचानक ही भावेश ने भाविका के सामने एक प्रस्ताव रखा जिसे भाविका को चौंका भी दिया था और सोचने पर विवश भी कर दिया था । वो सोच रही था कि भावेश का प्रस्ताव कहीं मेरी मजबूरी के कारण तो नहीं है ,पूरा हफ़्ता गुज़र गया इस उहापोह में । कुछ भी नहीं समझ पा रही थी वो बस गुमसुम अपने कमरे में अकेली । किरकिरे साहब की पत्नी उसे जितना संभाल पाती संभालती लेकिन संभलना तो खुद को ही पड़ता है ना । उसे भी संभलना था वो भी संभली । इसी बीच अपने प्रस्ताव का जिक्र भावेश ने किरकिरे साहब से भी कर दिया । उसका यह ज़िक्र रंग लाया ,अगले ही दिन थोड़े से गुस्से में भाविका भावेश के किराये के कमरे में सुबह सुबह ही आ पहुँची । भावेश उसके तमतमाए चेहरे से समझ गया था कि किरकिरे साहब ने उससे बात की है । थोड़ी देर के गुस्से के बाद वो बोली चलो आज छुट्टी कर लो और मेरे साथ चलो । भावेश नहा कर उसके साथ हो लिया । वो सीधे किरकिरे साहब के बंग्ले में लेकर गयी और फिर उन तीनों को साथ लेकर पास के आर्य समाज मन्दिर चली गई । भावेश कुछ भी समझ नहीं पाया था लेकिन किरकिरे साहब मंद मंद मुस्कुरा रहे थे । मन्दिर पहुँच कर वो बोली

 मुझसे शादी करना चाहते हो ना

तो हम आज ही और अभी यहीं शादी करेंगे,

बोलो मंजूर है ?

भावेश जैसे चेतना शून्य सा हो गया था

तभी किरकिरे साबह बोले

यंग मैन व्हाट यू से, यस ओर नो ?

भावेश के मुँह से निकला

यस सर

               उसके इस तरह से यस सर बोलने पर भविका और किरकिरे साहब की पत्नी ज़ोर से हँस दिए थे ठहाका लगा कर । भावेश अपने ही विचारों वैतरणी पर सवार यादों की नदी मे हिचकोले खा रहा अचानक ही उसके कानो में एक गूँज सी सुनाई पड़ी

दोज पैसेन्जर्स हू आर ट्रेवलिंग फ्राम कोच्ची टू जयपुर एण्ड केलकट्टा मे नाऊ प्रोसीड फोर बोर्डिंग इन फ्लाइट नम्बर एआई 406 ई फ्रोम अहमदाबाद टू कैलकट्टा वाया जयपुर ।

 भावेश ने अपना लेपटाप बैग उठाया और बोर्डिंग गेट नम्बर 2 की ओर चल दिया जहाँ पर पहले से ही काफी सारे यात्री कतार लगा कर खड़े थे । अपनी बारी के इन्तज़ार में ।
















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