मंजरी नन्दू
मंजरी नन्दू
पंछियों का कलरव शुरू हो गया था, सूरज की पहली किरण मैरीन ड्राइव के पानी पर उतर आई थी और पानी एकदम शान्त । कोच्ची जिसको कोचीन ,अरब सागर की रानी जैसे नामों से जानते हैं । ठीक मरीन ड्राइव के सामने सरकारी आवासों में से एक आवास भावेश का था । हमेशा मुस्कुराता फूलों से लदा रहने वाला यह सरकारी आवास आज कुछ सूना सा लग रहा था । मंजरी पूरी रात नहीं सोई थी बस रोती रही थी और उधर नन्दू वो तो एकदम पगला रहा था ।
कोई दो बरस पहले राजकोट से तबादले पर भावेश आया था । नया शहर नए लोग, नई बोली, एक दम अन्जान । केन्द्र सरकार की नौकरी की एक अच्छी बात ये है कि आप सरकारी खर्चे पर ही भारत भ्रमण कर लेते हैं । आज की सुबह यूं तो और दिनो जैसी ही थी लेकिन मंजरी, नन्दू और खुद भावेश के लिए अलसाई सी और कुछ उदास सी । मंजरी सुस्त कदमो से सर्वेन्ट क्वाटर से बाहर निकली और मेन बिल्डिंग हाँ भावेश के आवास में आ गई । हमेशा बुलबुल सी चहकने वाली मंजरी आज एकदम शान्त, चुपचाप किचन में गई और चाय चढ़ा दी । उसे मालुम है कि भावेश को सुबह उठते ही चाय चाहिए । वैसे इस समय तक भावेश उठ जाता था लेकिन आज अभी तक नहीं उठा था । मंजरी ने चाय लेकर बेडरूम का दरवाज़ा खटखटाया, आँख मलते से भावेश उठा और दरवाज़ा खोल दिया । ओह आज अभी तक नींद आ रही थी आँख ही नहीं खुली । मंजरी ने चुपचाप चाय बिस्तर के पास टेबल पर रख दी । बिना कुछ बोले ही किचन की ओर चल दी । भावेश चाय पीकर फ्रेश हुआ और मंजरी को आवाज़ लगाई । मंजरी चुपचाप से आकर सामने खड़ी हो गई थी । भावेश ने महसूस किया कि वो बहुत उदास है आँखों से लग रहा था कि वो पूरी रात सोई नहीं है । भावेश ने बोला -
-मंजरी चेयर लेकर आओ और बैठ जाओ ।
मै जानता हूँ कि तू बहुत दुखी है मेरे तबादले से ।
इतना बोलना था कि मंजरी की बड़ी-बड़ी आँखों से दो मोती फर्श पर टपक गए थे ।
फिर संभलते से बोली-
- नहीं साब मैं खुश है आप कितना बरस बाद खुद का घर जा रहा है ना, मेम साब के साथ रहिंगा, बच्चा लोग के साथ रहींगा । उनका भी राइट बनता है ना साथ - साथ रहने का । साब पहले दिन अपुन को पूछा था ना कि अपुन का घर किधर है गाँव किधर है ।
भावेश बोला -
- हाँ वो ऐसे ही पूछ लिया था ।
-नहीं साब उस दिन बड़ा मिसटेक मारा था मैं
-कोई बात नहीं मंजरी वो सब ठीक है ।
-साब आज हमको बोलने दो, नन्दू आ जाइंगा तो हम साला बोल नहीं पाएगा ना,
क्या है ना वो साला तो अपुन से भी बड़ा फूल है ।
रोने लग जाइंगा इसलिए आज अपुन का अक्खा लाइफ आपके सामने खोलने का है ।
वो क्या है ना साब अपुन का बाप थोड़ा सा स्टिक था और मैं एकदम बिन्दास,
बस डांट पड जाती थी ।
मैं पढने में भी एकदम फास्ट था साब ।
साला वो लाइफ अपुन को याद आता है ।
ये तो साली मैं इच थी जो ऐसा किया, नहीं करना था ।
साब अपुन को समझ आ गया बहुत साब ,नहीं करना था ।
वो क्या है ना साब अपुन का अकल ना, वो फिर गया था ।
भावेश बिना कुछ बोले उसके भीतर सुसुप्त ज्वाला मुखी को जानना चाहता था । ऐसा लग रहा था कि मन के किसी कोने दबी राख और लावा, आज सारी दीवारें तोड़कर बाहर बह जाना चाहते थे । अजनाने ही भावेश ने मंजरी के सिर पर हाथ फेर दिया । बस इतना करना था कि मंजरी अपने आपको रोक नहीं पाई आज जी भर कर रोई । भावेश भी उसको चुप नहीं कराना चाहता था । वो चाहता है कि इस अक्खड सी लड़की के भीतर छुपे भावों को बाहर आने दिया जाए ।
थोड़ा सा शान्त होकर वो बोली
- साब पहले आपके लिए नाश्ता बनाकर लाती हूँ । नन्दू भी आ जाएगा साथ ही नाश्ता कर लेगा ।
-नहीं मंजरी बैठो आज नाश्ता बाद मे करेंगे तुम कुछ कहना चाहती था ना वो बोलो
-नहीं साब अब छोडो ।
अरे बोलो ना बताओ
थोड़ा रुक कर वो बोली
बस इतना बोलना था कि वो फिर से आँखें नम कर बोली साब
- सच बोलूं
पूरा डेड बरस से ज्यादा हो गया साब आपके पास रहते रहते । ये मंजरी साली भूल गयी थी कि चोराहे पर भीख मांगने वाली ।
- नहीं मंजरी वो बाते छोड़ो ।
- साब आप आदमी है कि भगवान है पता नही साब अपुन साला भगवान को नहीं देखा है लेकिन अगर होता है तो वो आप जैसाइच होइंगा । (थोड़ा डांटते से भावेश बोला)
- मंजरी
- हो साब, आज बोलेगी साब
वो कुछ कहना चाह रही थी तभी नन्दू आ गया । वो भी लगता है पूरी रात सोया नहीं था । आँखें लाल हो रही थी, उसकी आँखों से भी लग रहा था कि वो रो देगा । भावेश ने सब महसूस कर लिया था लेकिन अभी चुप रहना ही बेहतर समझा । नन्दू मंजरी को लेकर किचन मे चला गया बोला
-सुन आज बहुत करना है जल्दी से नाश्ता बना फिर दोनो मिलकर साब का सामान पैक करवाना है ।
वो साब के सामान के लिए गाड़ी चार बजे आएगी इसलिए सब काम जल्दी से निपटाना पड़ेगा ।
-हूँ सुन तू रात को सोया नही ना
-नहीं
-काइकू
- तू क्यों नहीं सोई
-बस ऐसे इच
-तो मैं भी बस ऐसे इच
नन्दू की इस बात पर मुस्कुरा दी थी और नन्दू की पीठ पर अपना सिर टिका दिया था ।
नन्दू कुछ नहीं बोला बस जल्दी-जल्दी सब्जी काट रहा था वो बोला
-सुन तू जल्दी से साब के लिए नाश्ता बनाले
मैं खाने की तैयारी करता हूँ फिर पैकिंग का काम ।
मंजरी बोली
-नन्दू साब कितना अच्छा है ना
- हूँ वो तो है ।
-मेरे को तो रोना आ रहा है ।
- आ तो मेरे को भी आ रहा है लेकिन साब तो अपने घर जा रहे हैं ।
कह रहे थे पूरे बारह बरस बाद मेमसाब के साथ रहेंगे ।
नौकरी में बार-बार तबादला होने के कारण साब ने बच्चों और मेमसाब को अपने घर जयपुर ही छोड़ दिया था ।
साब बता रहे थे कि इन बारह बरसों में वो चार साल राजकोट और दो साल कोच्ची में ही टिके हैं।
नहीं तो हर आठ दस महिने में तबादला हो ही जाता है ।
- वो क्या है ना अपना साब एकदम ईमानदार है
और बाकी लोग सब लूटने वाला है ।
ऐसे में साब को कोइ भी दफ्तर माफिक नहीं बैठता था ।
जैसे ही कोई बेइमानी की बात होती साब एकदम बोल पड़ते थे
बस फिर क्या था वहाँ से तबादला हो जाता था ।
बारह बरस में कुल सोलह बार ट्रांसफर हुए हैं साब के ।
- अब तू ही देखना साब के पास सामन ही क्या है वो तो मेमसाब जब भी आती थी तो सामन खरीद खरीद कर जमा कर दिया है । बेड सोफा, टेबल, चेयर सब मेमसाब ने खरीदा है । साब तो बोलते हैं सोने को एक चारपाई और खाने को दो वक्त की रोटी चाहिए इन्सान को बस और क्या ।
मंजरी नाश्ता बनाकर भावेश के सामने रखा तो भावेश बोला
- सुनो आज तुम दोनो भी मेरे साथ ही नाश्ता करलो।
यहीं आ जाओ। भावेश की बात सुनकर मंजरी चुपचाप चली गयी नन्दू को बोला साब नाश्ते के लिए बोल रहे हैं ।
-तो दे के आना जल्दी से
-नहीं हम दोनो को भी नाश्ते के लिए बुला रहे हैं ।
-हम दोनो को भी............सुन साब जैसा बोल रहे हैं वैसा ही करना है ।
मंजरी ने दोनो के लिए नाश्ता लगाया और ड्राइंग रूम मे साहब के पास फर्श पर ही बैठने लगे तो
भावेश बोला
-नहीं नीचे नहीं यहीं सोफे पर बैठो दोनो
दोनो चुप थे भावेश के दुबारा बोलने पर दोनो अलग-अलग सोफे पर बैठ गए । दोनो की आँखें नम भावेश बोला
- चलो अब नाश्ता करलो ।
एकदम खामोशी के साथ नाश्ता कर रहे थे तीनो ही । कोई कुछ नहीं बोल रहा था तभी भावेश बोला
- देखो दोनो ने अपनी अपनी मेहनत से बारहवीं पास कर ली है ।
तभी मंजरी बोली
- नहीं साब हमारी मेहनत नहीं साब ये सब तो आपने किया है ।
ओपन स्कूल से दो साल में बारहवीं पास करवाने का काम आप ही का है ।
साब इतनी मोटी फीस भरकर आपने हमारा जीवन ही बदल दिया साब
फिर जोर-जोर से रोने लगी । इस बार भावेश के बदले नन्दू ने उसको संभाला, भावेश को भी यह अच्छा लगा । नन्दू बोला
- अरे पागल साब हमसे कभी दूर नहीं हो सकते हैं ।
- हाँ साब ने आज हम दोनो को इस काबिल बना दिया है कि ना तो अब मैं चौराहे पर जाएगी
और ना ही मैं अब दर दर भटकूंगी । आप इन्सान नहीं साब भगवान है ।
इस बार मंजरी के बजाय नंदू रोने लगा । भावेश के लिए बड़ा ही भावुक क्षण था यह । उसने दोनो को अपने दोनो कंधों से लगा लिया और पुचकारा । भावेश अब सोच रहा था कि नन्दू के पास तो अभी किराये का कमरा है लेकिन अब ये मंजरी कहाँ रहेगी । यह ख़याल आते ही उसके चेहरे पर चिन्ता का भाव आ गया था । उसने तभी एक निर्णय लिया वो सीधा बेड रूम में गया और थोड़ा सा संयत होकर बैठ गया फिर नन्दू को आवाज़ लगाई । नन्दू आ गया था तो वो नन्दू से बोला
- सुनो नन्दू तुम्हारे पास तो कमरा किराये से है ना इस पगली का क्या इन्तज़ाम करें । नन्दू बोला साब आप बोलें तो मेरे बगल वाला कमरा खाली है मैं बात कर सकता हूँ साब लेकिन ये मानेगी क्या ।
भावेश ने मंजरी को भी बुला लिया और कहा
- सुनो कल से कहाँ रहोगी ।
- साब ये तो नहीं सोचा लेकिन क्या है ना साब वापस वोइच फुटपाथ चली जाएगी
लेकिन एक प्रामिज है साब अब पहले वाला काम बिल्कुल नहीं करेंगी मैं ।
मर जाएगी लेकिन बिल्कुल नहीं करेगी साब ।
साला वो भी कोई लाइफ है,
लोग सच ही बोलते थे मेरे कू सड़ेली ।
भावेश बोला
- नहीं मंजरी अब तुम एक बहुत ही समझदार और जिम्मेदार बन गई हो
और हाँ तुम वापस फुटपाथ पर नहीं जाओगी ।
नन्दू के बगल वाला कमरा खाली है
किराए की बात नन्दू कर लेगा
और हाँ तुम दोनो के लिए ही मैने अयंगर साहब को बोलकर
बाजू वाले आफिस मे कान्ट्रेक्ट पर नौकरी की बात कर ली है ।
दोनो को पन्द्रह - पन्द्रह हजार रूपए महिना मिलेंगे ।
बस काम पूरी ईमानदारी से करना और हो सके तो दोनो ही बी. ए. ज़रूर कर लेना ।
नन्दू ने भावेश के पैर छू लिए । तो भावेश बोला
- अरे ये क्या कर रहे हो नन्दू बेटा । तुम दोनो ही मेरे बच्चों की तरह हो ।
नन्दू और मंजरी पूरी पैकिंग में लग गए थे एक-एक सामान को संभालकर पैक कर रहे थे साथ ही हर कार्टन पर लेबल लगा दिया किस में कौनसा सामान है । सामान पैक करते करते ही बीच में भावेश ने दोनो को लंच करने के लिए कहा तो तीनो ने साथ ही लंच किया और फिर से जुट गए पैकिंग में । ठीक चार बजे सामान ले जाने के लिए ट्रक आ गया था । बड़े ही सहेज सहेज कर मंजरी और नन्दू ने ट्रक मे सामान चढ़वाया । जैसे ही कूलर चढ़ाने लगे तो भावेश ने रोका
- अरे ये क्या नन्दू दोनो कूलर रहने दो । ये तुम दोनो के कमरों मे लगाना ठीक है ।
सामान लद गया और ट्रक रवाना हो गया । थोड़ी ही देर मे भावेश को भी निकलना था उसकी फ्लाइट साढ़े छः बजे की थी जो अहमदाबाद होते हुए जयपुर जाएगी । आफिस की गाड़ी पांच बजे आनी थी सो आधा घण्टा थोड़ा सा सुस्ताने के लिए । भावेश ने चार कुर्सियाँ और दोनो कूलर उन दोनो के लिए बाहर ही रखवा लिए थे । कुर्सियों पर तीनो ही बाहर पेड की छाया में बैठ गये थे । तभी नन्दू ने अपने मकान मालिक को फोन लगाकर बगल वाले कमरे को मंजरी के लिए किराए पर लेने के लिए बात करली थी । मंजरी आज ही से उसमे रह सकती थी वैसे तो सर्वेन्ट क्वाटर मे वो अगले सात दिन तक रह सकती थी भावेश ने इस आशय की बात पहले ही कर ली थी फिर भी नन्दू की यह पहल भावेश को काफी अच्छी लगी ।
ठीक पांच बजे आफिस की गाड़ी भावेश को एयरपोर्ट छोड़ने के लिए आ गई थी । बड़े ही भारी मन से नन्दू ने साब का सूटकेस उठाकर गाड़ी में रखा तभी मंजरी बोली
- साब आज जाते जाते मुझे एयरपोर्ट भी दिखा दो ना ।
मेरी किस्मत में वैसे तो एयरपोर्ट देखना शायद होगा ही नहीं ।
मंजरी की बात पर भावेश ने गर्दन हिलाकर ही जवाब दिया । भावेश आगे बैठ गया ड्राइवर के साथ और पीछे वाली सीट पर नन्दू और मंजरी । चार बजे तक तो आसमान बिल्कुल साफ था लेकिन अचानक ही बादल घिर आये थे । अभी गाड़ी रवाना ही हुई थी बरसात शुरू हो गयी मानो भावेश के कोच्ची से जाने का दुख आसमान भी जता रहा था और मंजरी के दुख को बूंदों के रूप में बरसा रहा था । मंजरी को भी यही लग रहा था । तीनो एमदम मौन साधे चुपचाप । एयरपोर्ट आ गया था । सभी नीचे उतरे । नन्दू ने सूटकेस नीचे उतारा और लेकर चलने लगा तो भावेश बोला
- नहीं नन्दू अब आगे तुम लोगो को नहीं जाने देंगे, अब मुझे ही जाना होगा ।
हाँ तुम अपना और मंजरी का ध्यान रखना ।
यह कह कर दो लिफाफे जेब से निकालकर दोनो को एक एक लिफाफा हाथों में थमा दिया । मंजरी बोली ये क्या है साब । भावेश ने जवाब दिया
- तुम दोनो को आगे के लिए कुछ सलाह लिखी हैं मैने
घर जाकर आराम से पढ़ना और अपना ध्यान रखना ।
बस इतना कहकर भावेश सिक्यूरिटी चैक के लिए चल दिया उसने पलट कर नहीं देखा । उसे मालुम है यदि पलटकर देखा तो अभी दोनो फिर से रोने लग जाएंगे । सिक्यूरिटी चैक के बाद भावेश बोर्डिंग के लिए लाइन मे लग गया था । सूटकेस लगेज में चला गया था बस एक लेपटाप बैग उसके हाथ में था । बोर्डिंग पास हाथ मे लिए भावेश अपनी बारी आने का इन्तज़ार कर रहा था । उधर नन्दू और मंजरी ने वापस क्वार्टर जाकर लिफाफे खोलकर और देखा , दोनो के लिफाफों में 25-25 हजार रूपए और दोनो के लिए ही अलग अलग पत्र थे ।
पच्चीस-पच्चीस हजार रूपये देखकर दोनो की ही आँखें फटी से थी । साब ने ये क्या किया इतना पैसा । अपना-अपना पत्र निकाल कर पढ़ने लगे थे । नन्दू के पत्र में लिखा था
प्रिय नन्दू तुमने जिस तरह से मेरा पूरा ध्यान रखा है उसका तो कोई मोल नहीं है । ये पच्चीस हजार तुम्हारी मेहनत का या उस सेवा का मोल नहीं है बल्कि बी. ए. की पढ़ाई के लिए ओपन यूनिवर्सिटी की, फीस है तीन साल के लिए । मेरी हार्दिक इच्छा है कि तुम दोनो ही बी.ए. कर लो । अयंगर साहब के पास भी पूरी लगन से काम करना । एक बात और जो शायद मैं किसी ओर से नहीं कर सकता तुम अब मंजरी का भी ध्यान रखना । बस ये ध्यान रखना कि वो वापस उसी नर्क मे न चली जाए इसके आगे भी बहुत कुछ लिखा था लेकिन उस समय नन्दू की आँखे भर आई थी सो आगे नहीं पढ़ पाया था ।
इधर मंजरी तो पत्र हाथ में लेकर बस रोती ही जा रही थी । नन्दू ने उसके कंधे पर हाथ रखते से बोला
- साब जैसा दुनिया में दूसरा कोई नहीं हो सकता है ।
- शाम हो चुकी है रात होने वाली है अब तू जल्दी से अपना सामन उठा और चल मेरे साथ ।
मकान मालिक से मेरी बात हो गयी है मेरे बगल वाला ही कमरा है
और हाँ अब साब के जाने के बाद तो तेरे को और मेरे को ज्यादा समझदारी से रहना पड़ेगा ना ।
अब हमारे सिर पर हाथ रखने को साब नहीं है ।
मंजरी कुछ न बोली बस साब के दिलाए सारे कपड़े, सारे किचन के बर्तन, कूलर और सारा सामान समेटकर एक तरह से जचा लिया और नन्दू एक रेहड़ी लेकर आ गया था । दोनो ने मिलकर पूरा सामान रेहड़ी में रखा और नये मकान की ओर मंजरी चल दी नन्दू के साथ । रात दोनो ने ही खाना नहीं खाया बस यूँ ही गुमसुम से अपना अपना कुरूक्षेत्र संभाले सो गए ।
अगली सुबह उठकर नन्दू ने पहले मुंह हाथ धोकर सामने थड़ी से दो कप चाय और कुछ खाने को लेकर आया और मंजरी का दरवाज़ा खटखटाने लगा। दोनों ने साथ साथ चाय नाश्ता किया और फिर वो उठा सीधा साब के क्वाटर की सभी चाबियां उनके आफिस मे जमा करवायी मंजरी उसके साथ ही थी सो मंजरी को लेकर वो सीधा अयंगर साब के पास चला गया था ।
