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बहादुर शेरा का पहला प्यार

बहादुर शेरा का पहला प्यार

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बहादुर, रामू, छोटू, पूरन ऐसे नाम हैं जो अब से लगभग ३५ साल पहले हर उच्च आय वर्ग वाले घरों में काम करने के लिए होते थे। यह घर के नौकर होते हुए भी घर के अविभाज्य सदस्य स्वरूप ही होते थे। उम्र १२ साल से २५ साल के बीच। ज्यादातर गाँव से आये हुए होते। २५ की उम्र होते होते ना जाने कहाँ चले जाते।

धीरे-धीरे इनकी जगह पूर्ण रूप से काम वाली बाइयों ने ले ली। जो कुछ काम इन बाइयों के जिम्मे से बच गए, वह घरों की मालकिनों ने वर्तमान तथाकथित बहादुर, रामू, छोटू, पूरन यानिकि पति महोदयों को आदेशित कर दिए।

यह कहानी इन्ही बहुतायत तथाकथित बहादुर, रामू, छोटू, पूरन में से एक बहादुर की है। बहादुर ना पहले बहादुर था न अब है। वो तो आज्ञा पालक था और है। अब रज़िया का घरेलू याकूत। उसका असली नाम तो शेरा है। सिर्फ नाम का शेरा।

शेरा तो वसुधैव कुटुम्बकं में विश्वास करता है। बचपन से ही सभी को पहले प्यार की नज़र से देखा।

१९८० में रेशमा से शादी हो गयी। ३८ साल से शेरा और रेशमा को एक दूसरे की आवाज़ ऐसी लगती है जैसे रेत में फावड़ा चल रहा हो।

दोनों एक दूसरे की ज़रूरतों का पूरा ख्याल रखते थे। फिर भी रेत और फावड़ा तो जानी दुश्मन की तरफ आवाज़ करते थे।

रेशमा को फिल्मों की तरह बैकग्राउंड म्यूजिक बहुत पसंद है। शेरा एक बार सड़क पर गिर पड़ा, ईस बात को रेशमा ने बताया की शेरा धड़ाम से सड़क पर गिर पड़ा। इस तरह धड़ाम की आवाज़ जोड़ने से ऐसा लगने लगा कि शेरा जोर से गिरा होगा। दिवाली पर पटाकों के फटने की आवाज़ डबल कर देती है क्योंकि वह यही बताएगी की पटाके भड़ाम भड़ाम फट रहे थे। किसी सहेली के नाचने के बारे में बताएगी तो घुंघरू अपने आप बजने लगेंगे।

इक बार एक स्टेज शो में कई मिमिकरी आर्टिस्ट थे। अपना-अपना फन दिखा रहे थे। कोई हीरो की आवाज़ निकालता तो कोई विलेन की तो कोई ट्रेन की तो कोई तोते की। पर शेरा के अनुरोध पर कोई भी रेत में फावड़ा चलाने की आवाज़ नहीं निकाल पाया। सब खुचर-खुचर या खुरच-खुरच की आवाज़ निकाल के रह गए। जबकि यह आवाज़ हर घर में स्वतः ही निकलती रहती है।

अब शेरा रिटायर हो गया है। दर्जनों बुढ़ापे की बीमारियाँ भी लग गई। शरीर शिथिल होने लगा है। रेशमा दो साल छोटी है।

अब धीरे-धीरे रेत में फावड़े की आवाज़ कम होने लगी है। या यूँ कहिये कि आदत सी हो गयी है और अगर उस आवाज़ को आधा घंटा नहीं सुना तो ऐसा लगता है कि कहीं कोई कम तो नहीं हो चला।

अब सिर्फ रेशमा अपने रिटायर्ड शेरा का ख्याल रखती है।

दोनों का रेत में फावड़ा चलाना बंद सा हो गया है। अब एक दूसरे से संवाद की धव्नि अनाहत यानिकि मधुर होती जा रही है।

यही बात रेशमा-शेरा के पहले प्यार में बदलती जा रही है।

हक़ीकत में तो रेत और फावड़ा ही किसी भी निर्माण की नीव के प्रथम सामान व् औज़ार हैं। रेत और फावड़ा की जोड़ी को ही अंतर्राष्ट्रीय प्यार का प्रतीक चिह्न घोषित कर देना चाहिए और अंतर्राष्ट्रीय प्यार दिवस १ मई पर प्रत्येक प्यार करने वाले को इस चिह्न के ब्रोच को अपने कपड़ो पर धारण करना चाहिए।


रेशमा और शेरा की जिन्दगी की शाम ढलने लगी है. प्यार के लिए थोड़े ही साल रह गए हैं. दोनों अक्सर गुनगनाते रहते हैं -  



मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने,  सपने सुरीले, सपने कुछ हँसते, कुछ गम के, तेरी आँखों के साये चुराए रसीली यादों ने, मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने.


कहीं दूर जब दिन ढल जाए, साँझ की दुल्हन बदन चुराए, चुपके से आए, मेरे ख़यालों के आँगन में कोई सपनों के दीप जलाए, दीप जलाए.

 

 


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