सीमा शर्मा पाठक सृजिता

Inspirational


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सीमा शर्मा पाठक सृजिता

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बेटी का पिता

बेटी का पिता

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"अजी सुनते हो! रमा ने जो रिश्ता बताया है। उसी से करवा देते हैं अपने बेटे पवन की शादी। एकलौती लड़की है, बाप की प्रॉपर्टी तो मिलेगी ही मिलेगी, हम दहेज भी जितना मांगेंगे उतना ही मिलेगा। बेटी का पिता है, जो कहेंगे वही करेगा" मंजु जी ने अपने पति राकेश जी से कहा।

मंजु की ननद रमा अपनी रिश्तेदारी में से अपने भतीजे का रिश्ता लेकर आई थी। मंजू जी को जब ये पता चला एकलौती लड़की है और पिता की कमाई भी अच्छी है तो लोभ का कीड़ा उनके दिलों दिमाग में घूमने लगा और  वह तुरन्त राजी हो गई उस लड़की से मिलने के लिए । अपने बेटे पवन को भी फोन करके बुला लिया और चल दी रितिका से मिलने।

रमा के रिश्तेदार हरिओम जी की बेटी रितिका बहुत ही सुन्दर सुशील और समझदार लड़की थी। बिन मां की बच्ची को बडे़ ही लाड़ प्यार से पाल पोसकर बड़ा किया था हरिओम जी ने। बहुत छोटी थी रितिका जब उसकी मां का देहान्त हो गया। दादी ने तो बहुत बार कहा हरिओम जी से दूसरा विवाह करने के लिए मगर वह तैयार नहीं हुये। उन्होंने फैसला लिया कि वह रितिका की माँ और पापा दोनों बनकर उसे पालेंगे। रितिका और हरिओम जी एक दूसरे की दुनिया थे।

मंजु जी रितिका को देखने पहुंची रितिका इतनी प्यारी थी कि पवन को एक नजर में भा गई लेकिन दहेज की लोभी मंजु को उसमें एक कमी दिखाई दे गई और उसी का फायदा उठाकर वह बोली, " देखिए भाईसाहब आपकी बेटी हमें पसन्द है। पढ़ी लिखी है होशियार है लेकिन उसकी लम्बाई बहुत कम है हमारे लम्बे चौड़े हट्टे कट्टे बेटे के साथ जोगी नहीं और जोड़ी फीकी सी लगेगी इनकी। अब हम आये हैं आपके घर आपकी बेटी को देखने, इसे फेल करेंगे तो बदनामी होगी आपकी हमें ये अच्छा नहीं लगेगा हम समझ सकते हैं एक बेटी के पिता का दर्द लेकिन अगर आप 20 लाख कैश एक गाड़ी और अपना ये आलीशान घर हमारे पवन के नाम कर दे तो हम ये शादी कर लेंगे। "

मंजु जी के मुख से ऐसी बातें सुनकर हरिओम जी मुस्कराये और बोले, "अच्छा भाभी जी ये घर, गाड़ी और बीस लाख देने से जोड़ी जम जायेगी इनकी। आप बिल्कुल गलत जगह आ गई हैं भाभी जी अपने बेटे का सौदा आप कहीं और करिये हमें ये शादी मंजूर नहीं और हमें कोई अफसोस नहीं होगा आप शादी के लिए मना कर देगी तो बल्कि खुशी होगी इस बात की कि बच गए हम आप जैसे लालची लोगों से रिश्ता जोड़ने से हमसे मिलने के लिए धन्यवाद। अब आप जा सकते हैं। "

हरिओम जी की बात सुनकर मंजु जी बोली, " ये क्या तरीका होता है बात करने का आप भूल रहे हैं आप एक बेटी के पिता हैं और इतना घमंड और अकड़ एक बेटी के पिता को शोभा नहीं देती। ऐसे तो कोई शादी नहीं करेगा आपकी बेटी से भाईसाहब बेटी के पिता हो और बेटियों के पिता को झुकना ही पड़ता है। "

हरिओम जी फिर से मुस्कराने लगे और बोले, "भाभी जी बेटी का पिता हूं और घमंड है मुझे इस बात पर तभी तो आप जैसे लोग तैयार बैठे हैं अपने बेटे की बोली लगाने के लिए। वो जमाना गया जब लाचारी होती थी बेटी के पिता होने पर। अब वो घबराते, डरते और लाचार पिता नहीं मिलते अब बेटियों के पिता गर्वित होते हैं इस बात को लेकर कि वो दे रहे हैं दान एक ऐसी कन्या का जो किसी के घर की लक्ष्मी बनेगी, उनके वंश को आगे बढ़ायेगी और उनके घर को स्वर्ग बनायेगी। अच्छा हुआ आपने अपनी हकीकत आज ही दिखा दी वरना बहुत पछतावा होता मुझे अपनी बेटी को आप जैसे लोगों से जोड़कर। अब आप जा सकते हैं मुझे और भी बहुत काम है।"

मंजू जी और राकेश जी देखते ही रह गये एक बेटी के पिता को। आज पहली बार किसी बेटी के पिता ने उनसे ऐसे बात की थी वरना अब तक जितनी भी लड़कियां देखी उन्होंने अपने बेटों के लिए सब के पिता हाथ जोड़ते, अनुनय विनय करते ही दिखे। मंजू जी और राकेश जी बड़बड़ाते हुए वहां से चलते बने और राकेश जी ने बड़े ही शान से अपनी मूंछों पर हाथ फेरते हुए कहा, "बेटियाँ तो लक्ष्मी का रूप होती हैं ऐसे दहेज के लालची और लोभी लोगों के हाथ में तो हरगिज नहीं दूंगा मैं अपनी बेटी को। मेरी बेटी उस घर में जायेगी जहां उसे मान सम्मान मिलेगा प्यार मिलेगा और उसके गुणों की कदर होगी। जहां उसकी आन्तरिक सुन्दरता देखी जायेगी नाकि बाहरी। "

दोस्तों, हरिओम जी की तरह ही हर पिता को गर्व होना चाहिए कि वो बेटी का पिता है और ये अहसास भी कि वह बेटे के पिता से कम नहीं है, कहीं ज़्यादा है। क्योंकि वह अपनी बेटी दान कर रहा है, उन्हें उनके वंश को आगे बढ़ाने के लिए और उनके घर को स्वर्ग बनाने के लिए। एक बेटी का पिता होना लाचारी नहीं, गर्व और सौभाग्य की बात होनी चाहिए और ये गर्व हर पिता के अन्दर बेटी के जन्म से ही आना चाहिए। लाचारी दिखाने की कोई आवश्यकता नहीं है, ना ही लड़के के परिवार के सामने झुकने की। बेटी के पिता का ओहदा बहुत ऊंचा होता है, बस हमें उस नजरिये की आवश्यकता है जिससे समाज इस बात को समझ सके और मान सके। ये नजरिया हर बेटी के पिता को अपने अन्दर लाना ही होगा, समाज की कुंठित सोच को बदलने के लिए ।



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