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ashok kumar bhatnagar

Tragedy

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ashok kumar bhatnagar

Tragedy

अस्वीकार की उम्र में अपनापन (2)"

अस्वीकार की उम्र में अपनापन (2)"

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  आज सुबह जब अखबार पर नजर डाली, तो एक इश्तिहार देखकर मैं चौंक गया। उस इश्तिहार ने मुझे गहराई से सोचने पर मजबूर कर दिया। इश्तिहार कुछ इस प्रकार था:

"सत्तर और पैंसठ साल के वृद्ध पति-पत्नी को एक जवान बेटे या बेटी को गोद लेने की आवश्यकता है। यदि उनके साथ बहू, दामाद या बच्चे हों, तो भी कोई समस्या नहीं है। हम उनके घर में रह सकते हैं या वे हमारे घर में आ सकते हैं, जैसा उन्हें सुविधाजनक लगे। हम उन पर बोझ नहीं बनेंगे, बल्कि अपना खर्च खुद उठाएंगे। आवश्यकता पड़ने पर हम उनकी मदद भी करेंगे। बदले में हमें केवल उनका मुस्कराता चेहरा चाहिए। सुबह-शाम बस एक 'गुड मॉर्निंग' और 'गुड इवनिंग' सुनने की उम्मीद रखते हैं। जब वे 'बेटा, बेटी कैसे हो?' कहें, तो एक मुस्कान भरा जवाब मिल जाए—बस इतना सा सपना है। इच्छुक व्यक्ति कृपया संपर्क करें।"

यह इश्तिहार किसी हंसी-मजाक या हल्की-फुल्की बात नहीं थी, बल्कि यह हमारे समाज की एक बहुत गहरी और दुखद सच्चाई को उजागर कर रहा था। एक उम्रदराज़ दंपति, जिन्होंने शायद अपना पूरा जीवन दूसरों की सेवा और देखभाल में बिताया, अब अपनी ही उम्र के इस अंतिम पड़ाव पर इतने अकेले हो गए हैं कि उन्हें किसी अजनबी बेटे या बेटी को गोद लेने की जरूरत महसूस हो रही है।

उनकी जरूरतें बहुत साधारण हैं—ना तो उन्हें आर्थिक मदद चाहिए, ना कोई बड़ी सुविधा। बस इंसानियत के कुछ छोटे-छोटे पल चाहिए, थोड़ी सी भावनात्मक सहानुभूति और किसी का मुस्कुराता हुआ चेहरा। उन पर कोई बोझ बनने की बजाय, वे खुद का खर्चा उठा रहे हैं और मदद करने का भी वादा कर रहे हैं। लेकिन बदले में केवल कुछ प्यार और अपनापन चाहते हैं।

यह इश्तिहार न केवल उस वृद्ध दंपति की भावना को प्रकट करता है, बल्कि यह हमारे समाज में फैलती हुई उस समस्या की ओर भी इशारा करता है, जिसमें परिवारों के भीतर भावनात्मक जुड़ाव कहीं खो सा गया है। रिश्तों की जगह अब औपचारिकताएं और जिम्मेदारियों का बोझ ज्यादा हो गया है। बुजुर्ग, जो कभी परिवार का आधार हुआ करते थे, अब खुद को इस समाज में तन्हा और उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।

इस इश्तिहार ने मेरी आँखों में आँसू ला दिए। क्या हमारी ज़िन्दगी इतनी व्यस्त हो गई है कि हम अपने ही माता-पिता या बुजुर्गों के लिए इतना समय भी नहीं निकाल पा रहे हैं कि उन्हें सुबह-शाम बस एक मुस्कान के साथ देख सकें?

          हमारी जिंदगी पहले की तरह चल रही थी, लेकिन उस इश्तहार ने मुझे अंदर तक बेचैन कर दिया। आखिर एक बुजुर्ग दंपति, जो आर्थिक रूप से पूरी तरह से संपन्न हैं, इस उम्र में एक जवान बेटे या बेटी को गोद लेने की जरूरत क्यों महसूस कर रहा है? इस सवाल ने मुझे इतना विचलित किया कि मैंने उन बुजुर्गों से मिलने का फैसला किया।

कुछ दिनों बाद, जब मैं उस दंपति के घर पहुंचा, तो मेरे मन में कई सवाल थे। मैंने सीधे तौर पर उनसे पूछा, "आपके इश्तहार ने मुझे बहुत प्रभावित किया। आप तो आर्थिक रूप से सक्षम लगते हैं, फिर भी इस उम्र में किसी जवान बेटे या बेटी को गोद लेने की जरूरत क्यों महसूस हुई?"

बुजुर्ग दंपति ने एक गहरी सांस ली, और धीरे-धीरे बोलना शुरू किया। उनकी आवाज में एक गहरा दर्द था, जो सीधे मेरे दिल तक पहुंचा। उन्होंने कहा, "हमारा भी एक भरा-पूरा परिवार है। दो बेटे हैं, जिन्हें हमने अपने जीवन की सारी मेहनत, प्यार और त्याग के साथ बड़ा किया। उन्हें अच्छी शिक्षा दिलाई, ताकि वे अपने जीवन में सफल हो सकें।"

उन्होंने थोड़ी देर के लिए रुककर अपनी पत्नी की ओर देखा, जो चुपचाप आंखों में नमी लिए बैठी थी। फिर वह आगे बोले, "लेकिन जब उनके जीवन में शादी हुई और उनकी अपनी गृहस्थी बस गई, तो वे धीरे-धीरे हमसे दूर होते चले गए। शुरू में यह दूरी सिर्फ भौतिक थी, लेकिन फिर यह भावनात्मक भी हो गई। उनकी पत्नियाँ हमारे साथ ढंग से बात नहीं करती थीं, बल्कि हमें अपमानित करतीं। उनकी बातों में ताने होते थे, मजाक होता था, और एक तरह से हमें जैसे 'पुराना' समझकर अनदेखा किया जाने लगा।"

उनकी बातों में गहरी पीड़ा और टूटे हुए रिश्तों की गूंज सुनाई दे रही थी। "हमने अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा अपने बच्चों की भलाई में लगा दिया, लेकिन अब हम उनके जीवन में किसी बोझ से कम नहीं हैं। वे हमारे प्रति अपनी जिम्मेदारी महसूस नहीं करते, और उनकी पत्नियाँ हमें घर में रहने लायक नहीं समझतीं।"

उनकी आंखों में बेबसी और दर्द साफ झलक रहा था। "अब हम दोनों अकेले हैं। भले ही आर्थिक रूप से सक्षम हों, लेकिन हमें केवल प्यार और सम्मान चाहिए। इसीलिए, हमने सोचा कि अगर हमारे अपने बच्चे हमें नहीं अपना सकते, तो शायद कोई और हमें इस उम्र में अपना ले। हमें कोई बड़ा त्याग नहीं चाहिए, बस कुछ प्यार भरे पल, एक मुस्कान, और यह एहसास कि हम भी किसी के लिए महत्वपूर्ण हैं।"

उनकी इस बात ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया। उनके शब्दों में छुपी पीड़ा, वह अस्वीकार, वह खालीपन—यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं थी, बल्कि हमारे समाज में बुजुर्गों के साथ हो रहे व्यवहार की एक सच्चाई थी।


 वो दम्पत्ति बोले जा रहे थे ,”हम तो अपनी पोती पोतों की वजह से उनके पास रहने के लिए आतुर थे ,इस लिए उनके पास रहना चाहते थे ,किन्तु एक सम्मान एक इज्जत के साथ। जब वो सम्मान और इज्जत नहीं मिली ,हमने उनका घर छोड़ने का फैसला कर लिया हालांकि उनका घर छोड़ते समय काफी कष्ट हुआ था और इसका कारण पोता पोती थे। पर किया कर सकते थे। फिर हमें तो इस दुनिया से जाना हे ही। अच्छा ही हैं जितनी जल्दी पोती पोते को इस बात का अहसास हो जाय। 

वो लोग बोले ही जा रहे थे। कह रहे थे ओल्ड ऐज में दिल बहुत घबराता हैं। बस इच्छा होती हैं कोई बात कर लें। घर में चलता फिरता कोई दिखाई दे जाय तो मन को अच्छा लगता हैं। अपने अपने नहीं हुए तो क्या हुआ ,गे रो को भी अपना बनाया जा सकता हैं। इस लिए हमने किसी को गोद लेने का फैसला किया हैं। “

बुजुर्ग व्यक्ति ने आगे कहा, "जब बच्चे छोटे होते हैं, तो उनके हर सपने और जरूरत को पूरा करने के लिए हम माँ-बाप अपनी जिंदगी का हर पल समर्पित कर देते हैं। हम यह सोचते हैं कि जब वे बड़े होंगे, तो वही प्यार और सम्मान हमें लौटाएंगे। लेकिन जैसे-जैसे उनकी दुनिया बड़ी होती जाती है, हमारा महत्व घटता चला जाता है। हमने अपने बेटों के लिए क्या कुछ नहीं किया, लेकिन अब उनके जीवन में हमारे लिए कोई स्थान नहीं बचा। उनकी पत्नियाँ हमें अपने घर में नहीं चाहतीं और हमारे बेटे चुपचाप इस दूरी को स्वीकार कर चुके हैं।"

श्रीमती जी, जो अब तक चुप थीं, धीरे-धीरे बोलने लगीं, "शुरुआत में हमें यह बदलाव समझ में नहीं आया। हमने सोचा, शायद वे अपने काम में व्यस्त हैं। लेकिन धीरे-धीरे हमें एहसास हुआ कि यह केवल व्यस्तता नहीं, बल्कि एक अनदेखी थी, जो हमें आहत करने लगी। हमें केवल यह एहसास चाहिए कि हम अभी भी किसी के लिए महत्वपूर्ण हैं, कि हमारे जीवन का कुछ उद्देश्य बचा हुआ है।"

उनकी बातों में छिपी निराशा मेरे मन को झकझोर रही थी। मैंने पूछा, "क्या आपने कभी अपने बेटों से इस बारे में बात करने की कोशिश की?"

बुजुर्ग व्यक्ति ने हल्के से सिर हिलाया और कहा, "कई बार कोशिश की। लेकिन हर बार जवाब वही रहा—'पापा, हम बहुत व्यस्त हैं। आपसे मिलने का समय निकालेंगे।' और यह समय कभी आया ही नहीं। अब हमें यह समझ आ चुका है कि शायद वे हमें अपने जीवन में नहीं चाहते। इसी कारण, हम किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश में हैं, जो हमें अपने परिवार का हिस्सा बना ले। हमें बस थोड़ी सी भावनात्मक सहारा चाहिए, और कुछ नहीं।"

उन बुजुर्ग दंपति की बातों ने मेरे मन को गहरे तक प्रभावित किया। उनका दर्द, उनकी अकेलापन, और वह भावनात्मक खालीपन जिसे वे महसूस कर रहे थे, मेरे लिए सोचने का एक बड़ा विषय बन गया। मैंने उनकी ओर देखा, उनकी झुर्रियों में जीवन के संघर्षों और त्याग की कहानी छिपी हुई थी।

रात के दस बज रहे हैं। अभी अभी में उस दम्पति के घर से आया हूं। बड़े प्यार से उन लोगों ने खाना खिला या। घंटों बात करते रहे। आज मैंने महसूस  किया कि मैं अकेला ही  दुखी नहीं हूँ  । “




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