रचना शर्मा "राही"

Drama Inspirational


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रचना शर्मा "राही"

Drama Inspirational


अनुभूति की उड़ान

अनुभूति की उड़ान

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तालियों की गड़गड़ाहट से हॉल गूँजने लगा जब आगे बढ़कर 'अनुभूति' ने महामहिम राष्ट्रपति जी से पुरस्कार प्राप्त किया। सबकी नज़र सिर्फ अनुभूति पर टिक गई। आख़िर काम ही ऐसा किया है उसने कि सब हैरान हैं। एक अपाहिज़ लड़की और गज़ब का साहस। आज हर अख़बार हर खबर में अनुभूति का ही ज़िक्र है। उसके मम्मी पापा गर्व से फूले नहीं समा रहे। 

      घर पहुंचते ही बधाइयों का तांता लग गया। ये वही लोग हैं जो कभी अनुभूति से कहते थे कि इन नकली पैरों से ज़्यादा दूर नहीं जा पाओगी। आज उसने सबको धता बता दिया। आज उसका मन शान्त है और होठों पर निश्चल मुस्कान। वो इस पल को जी लेना चाहती है। 

        धीरे - धीरे सब अपने घर जाने लगे। अब वो सिर्फ अपने मम्मी पापा के साथ थी। मां की गोद में सिर रखकर वो सपनों में खो जाना चाहती थी। उसने मां से कहा मां मुझे अपनी गोद में लिटा लो। मां भी उसे एक मासूम बच्चे की भांति लाड़ प्यार करने लगीं। अचानक अनुभूति की आँख से आँसू की एक बूंद टपक कर मां के आंचल पर गिरी। मां ने जैसे ही उसका चेहरा देखा तभी अनुभूति की आंखों से आँसू बह चले।

        अनुभूति को पिछली सारी बातें याद आ रही थीं। कितने अच्छे दिन थे उसके और फिर वो हादसा जिसने उसकी ज़िंदगी ही बदल दी। अपने कॉलेज में सबसे होनहार थी अनुभूति। बात पढ़ाई की हो संगीत की या अन्य किसी भी गतिविधि की अनुभूति सब में अव्वल ही रहती। अब की उसका फाइनल ईयर था कि अचानक सब बदल गया। हुआ यूं कि वो अपने कॉलेज से घर की ओर वापस आ रही थी कि अचानक उसकी नज़र एक बच्चे पर पड़ी जो बस के नीचे आने वाला था। वो अपनी जान की परवाह किए बगैर जल्दी से भागी और उसने बच्चे को तो धकेल कर बचा लिया पर ख़ुद बस के नीचे आ गई। उसने इस एक्सिडेंट में अपनी दोनों टांगे गंवा दी।

         इस एक्सिडेंट के बाद उसका जीवन ही बदल गया। पहले तो सब उससे सहानुभूति दिखाते फिर धीरे धीरे उससे बचने लगे। उसे अब अपने लिए सब ख़ुद ही करना था। उसका इलाज़ चला। घाव तो भरने लगे पर मन में बोझ बढ़ता गया। उसके मम्मी पापा चाहते कि वो पढ़ाई पूरी करे। डॉक्टर से संपर्क कर उन्होंने जानना चाहा कि वो बताएं कि आगे अनुभूति कैसे चल पाएगी। डॉक्टर ने कहा - आजकल ये बिल्कुल भी कठिन नहीं। कृत्रिम टांगों की सहायता से वो अपने पैरों पर खड़ी हो सकती है पर इसमें समय लगता है। आप लोगों को अनुभूति के आत्मबल व मनोबल को कम नहीं होने देना। उसके माता - पिता थोड़े शांत हुए। उन्होंने उसी डॉक्टर से अनुभूति के लिए कृत्रिम अंग लगवाने का फ़ैसला लिया। 

         डॉक्टर ने सारी जांच कर अनुभूति को कृत्रिम टांगे लगा दी। उसको हिदायत दी कि धीरे धीरे चलने की कोशिश करनी है। अनुभूति इन नकली पैरों को पा खुश थी पर जैसे ही वो चली गिर पड़ी। डॉक्टर ने समझाया धीरे धीरे सब ठीक हो जायेगा और वो सबकी तरह से चल पाएगी। घर आकर वो चल चल कर देखती। गिर पड़ती फिर उठती। अब रोज़ वो प्रयास करती गिरती फिर उठती फिर चलती। उनके यहां जो भी रिश्तेदार आते सहानुभूति दिखाते और उसको सांत्वना देते। कुछ रिश्तेदार अनर्गल बातें करते और उसको लाचार बताते। इस मुश्किल घड़ी में उसके मम्मी पापा और उसकी सहेली दीप्ति ने उसका साथ दिया। 

         अनुभूति के मम्मी पापा और दीप्ति उसका हौसला बढ़ाते। वो गिरती तो उसे उठने के लिए प्रोत्साहित करते। वो हार मानती तो उसे संभालते। आखिर उन सबके प्रयासों से कुछ ही महीनों में अनुभूति चलने लगी। उसने अपनी पढ़ाई पूरी करने का निर्णय लिया। यही नहीं वो अच्छे अंकों से उत्तीर्ण भी हुई। आगे की पढ़ाई के लिए उसने देहरादून जाने का मन बनाया। उसके माता पिता को भी इसमें कोई परेशानी नहीं नज़र आई। उन्होंने हां कर दी। 

         देहरादून के प्रसिद्ध विश्वविद्यालय से उसने पत्रकारिता में स्नातकोत्तर करने का मन बनाया और प्रवेश परीक्षा उसने आसानी से पास कर ली । उसे दाखिला मिल गया। अब मेहनत कर वो पढ़ाई करने लगी। बस कभी कभी उसे तकलीफ़ होती जब वो तेज़ चलती। पर उसने हार नहीं मानी वो तेज़ चलती । उसे तो बस हालातों को हराना था। ऐसे ही उसका पहला साल गुज़र गया। परीक्षाएं हुईं और अवकाश हो गए। उसके कॉलेज से छात्र छात्राओं ने मसूरी जाने का प्लान बनाया। वो भी जाना चाहती थी और उसने भी अपना नाम लिखा दिया। 

         मसूरी में सभी छात्र छात्राओं ने कैम्प -टी - फॉल, माल रोड घूमने का निश्चय किया। कुछ छात्र छात्राओं का समूह पर्वतारोहण पर जाना चाहता था। अनुभूति का भी बहुत मन हुआ कि वो पर्वतारोहण पर जाए। पर कोई इस बात के लिए तैयार नहीं हुआ कि उसे ले जाएं। सबका यही कहना था कि ये असंभव है। कृत्रिम टांगों से वो पर्वतारोहण नहीं कर सकती। ख़ैर सब अपने अपने समूह में शामिल हो घूमने निकल गए। अनुभूति का मन बहुत ख़राब हुआ और वो कहीं नहीं गई। दो चार दिन घूम कर सब वापस कॉलेज आ गए। सब उसको रास्ते भर समझाते रहे कि वो इसके अलावा कोई भी काम करे उसमें मन लगाए।

         अनुभूति का मन तो पर्वतों में खोया था। उसने हॉस्टल आकर नेट पर पर्वतारोहण संस्थान के बारे में खोजा। सारी जांच की। रिपोर्ट्स को पढ़ा। उसे एक अच्छे संस्थान का पता चला । उसने उनको मेल किया कि वो किस हालत में है और पर्वतारोही बनना चाहती है। संस्थान से उसको जवाबी मेल आया कि सामान्य व्यक्तियों के लिए ही पर्वतारोहण कठिन होता है और कृत्रिम टांगों से तो करना असंभव सा ही है। वो बिल्कुल निराश नहीं हुई उसने फिर से मेल किया - मैं असंभव को संभव करना चाहती हूं आप सहायता करें तो।

         उसके इस मेल के बाद संस्थान ने उसे मिलने के लिए बुलाया। वो तो इसी पल का इंतजार कर रही थी। अनुभूति के जज्बे को देख संस्थान ने उसका साथ देने का फैसला किया। उसका प्रशिक्षण शुरू हो गया। उसने मन में ठान लिया था कि उसे पर्वत चोटी फतेह करनी है । रोज़ वो समय से प्रशिक्षण कक्षाएं लेती। धीरे धीरे उसका प्रशिक्षण ख़त्म हो रहा था और उसके हौसले बुलंद हो रहे थे। सबसे पहले एक छोटी पर्वत चोटी पर उसे एक समूह के साथ भेजा गया। उसका प्रयास अविश्वसनीय था। पहले ही प्रयास में उसने बिना किसी बाधा के उस चोटी को पार कर लिया।

         अब तो उसके क़दम रुकने को तैयार ही नहीं थे। सब उसके हौसले को देखकर हैरान थे। उसने अब अपने मन की इच्छा जताई कि उसे मांउट एवरेस्ट फतह करनी है। सब उसकी बात सुनकर आश्चर्यचकित थे । संस्थान के निदेशक ने ख़ुद बछेंद्री पाल से उसे मिलवाया । बछेंद्री पाल अनुभूति से मिल उसके हौसले को देख उसे ख़ुद प्रशिक्षण देने के लिए तैयार हुईं। अनुभूति ने उनका भी दिल जीत लिया। ना वो हार मानती ना ही थक कर बैठती। वो तो जैसे कुछ बड़ा करना चाहती थी। प्रशिक्षण की हर बारीकी को उसने करीब से देखा। जल्दी उसने अपना प्रशिक्षण पूर्ण कर लिया।

         आज वो दिन आ गया अपने समूह के साथ अनुभूति को मांउट एवरेस्ट की चड़ाई शुरू करनी थी। अपने माता पिता व अपनी गुरु बछेंद्री पाल जी का आशीर्वाद ले वो निकल पड़ी अपनी उड़ान पर। लगभग एक सौ बारह दिनों में उसने अपनी चड़ाई पूर्ण की। माउंट एवरेस्ट को फतह किया तथा अतिविशिष्ट विकलांग व्यक्तियों की श्रेणी में पहली सफलता हासिल की। माउंट एवरेस्ट को फतह करने वाली पहली विकलांग महिला बनी। उसके हौसले की उड़ान को देख सब नतमस्तक थे।

         मां ने जैसे ही अनुभूति के सर पर हाथ रखा वो वर्तमान में लौट आई। अब उस दुख को उसने आंसूओं के संग सदा के लिए बहा दिया। वो बस बच्चा बन अब कुछ पल मां की गोद में निश्चल सो जाना चाहती थी। उसे बच्चों की भांति सोया देख मां आत्मविभोर हो रहीं थीं क्योंकि वो जानती हैं कि उनकी बेटी ने सब खो कर भी क्या हासिल किया है। उनका चित्त भी आज शांत है और अनुभूति उनकी गोद में ।

       


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