मुज़फ्फर इक़बाल सिद्दीकी

Tragedy


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मुज़फ्फर इक़बाल सिद्दीकी

Tragedy


ऐ माँ तुझे सलाम (कहानी)

ऐ माँ तुझे सलाम (कहानी)

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आज ज़ूबी बहुत बोल्ड फैसला कर चुकी थी। उसने निश्चय कर लिया था कि आज मम्मी-पापा को सब कुछ बता देगी।

ये ज़िन्दगी भी अजीब है। इसके अनेक रंग हैं। हर रंग की अपनी एक कहानी है। कब किस रंग में कौन सा रंग मिल जाए तो कैसा रंगा बनेगा ये तो एक अलग बात है। लेकिन प्यार का एक अपना अलग रंग है, जब जिस पर चढ़ जाता है, तो फिर कोई दूसरा रंग नहीं चढ़ता। तभी तो रंगरेज़न की कहानी में, जब एक प्रेमी अपने रुमाल पर रंगरेज़न से कलर करने को कहता है तो वह उसे काले रंग से रंग देती है और कहती है। लो अब इस पर कोई और रंग नहीं चढ़ेगा। या यूँ कह सकते हैं कि वह ये नहीं चाहती कि अब इस पर मेरे अलावा किसी और का कोई और रंग चढ़े। बात तो पुराने ज़माने की है। जब कपड़ों में रंग करने का चलन था। लेकिन आज के ज़माने में तो हर रंग का कपड़ा बाज़ार में मिलता है या सेट मिलता है। जब जिससे चाहो मैचिंग हो जाएगी अब तो एक सी मैचिंग का ज़माना भी ख़त्म हो गया कभी-कभी तो अपोजिट कलर से मैच किया जाता है। लेकिन बात कपड़ों के रंग तक ही सिमित नहीं है। बात तो उस प्यार के रंग की है जो एक बार चढ़ जाए तो गुज़रा हुआ वक़्त भले ही उसको फीका कर दे लेकिन छुड़ा नहीं सकता।

ज़ूबी की ज़िन्दगी में जवानी की दहलीज़ पर अभी क़दम जमे भी नहीं थे कि बेंजामिन के प्यार का रंग चढ़ना शुरू हो गया। बेंजामिन लारेंस एक कामयाब बिज़निस मैन थे। और ज़ूबी अपने ज़माने की मशहूर डांसर थी। जयपुर के एक कॉन्सर्ट में बेंजामिन लारेंस चीफ गेस्ट बन कर आए थे। एंकर ने सभी आर्टिस्ट का परिचय करवाया। जिसमें ज़ूबी अपने डांस ग्रुप की टीम लीडर थी। कंसर्ट ख़त्म होते-होते ज़ूबी का रंग उनके दिल और दिमाग़ पर चढ़ चुका था। अब ये परिचय महज़ औपचारिकता नहीं रहा गया था। मुलाकातों का सिलसिला आगे भी चल निकला। जहाँ भी ज़ूबी का प्रोग्राम होता पहुँच जाते। ज़ूबी को भी उनका साथ अच्छा लग रहा था। दोनों की उम्रों में बहुत फासला था। इसलिए बहुत ज़्यादा शक की गुंजाईश भी नहीं थी।

बेंजामिन ट्रांसफार्मर्स प्राइवेट लिमिटेड का टर्न ओवर हर साल बढ़ रहा था। सेल्स एन्ड परचेस वे स्वयं ही देखते थे। इसलिए अक्सर टूर पर ही रहते थे। अब उन दोनों की दोस्ती में प्यार का रंग चढ़ने लगा था। ज़ूबी शुरू से ही आज़ाद ख्याल की लड़की थी। शिमला के बोर्डिंग स्कूल से लेकर दिल्ली के कॉलेज तक का सफर ऐसा ही था। जो मर्ज़ी चाहा किया। कभी किसी की परवाह नहीं थी। मम्मी-पापा भी उसकी हर ख़ुशी में ही अपनी ख़ुशी समझते थे।

अब तो बेंजामिन लारेंस जहाँ भी टूर पर रहते ज़ूबी साथ होती। बस फासला भी उम्रों तक ही सीमित था। लेकिन जब दिल मिले हों तो दूरी कोई मायने नहीं रखती फिर चाहे भौगोलिक हो या फिर उम्रों की हो। वैचारिक दृष्टिकोण से ज़ूबी, बेंजामिन को पसंद करती थी। उनकी सोच समझ की तो वह कायल थी। कभी-कभी तो वह उनको अपना गुरु भी मानने लगी थी।

इस बार वह मुम्बई टूर पर थे।मुम्बई माया नगरी में ज़ूबी को कुछ फ़िल्मी हस्तियों से मिलवाना चाहते थे। ताकि ज़ूबी वालीवुड में इंट्री कर सके। ज़ूबी भी साथ थी। दिन भर फिल्म स्टूडियोज़ के चक्कर लगने लगे। शाम होते होते बड़ी-बड़ी होटलों में पार्टी। कब किसका रंग किस पर चढ़ा, पता ही नहीं चला। ये अच्छा रहा ज़ूबी को एक फिल्म में आइटम सांग पर डांस करने का मौका मिल गया। सूटिंग एक माह बाद थी। इस बार मुम्बई का टूर कामयाब रहा था। दोनों वापस हो लिए।

ज़ूबी ने अपनी रिहर्सल में पूरी जान लगा दी थी। वह इस मौके से आगे भी फायदा उठाना चाहती थी। अब एक माह बाद पहुंचना था। बेंजामिन ने होटल ओबेरॉय बुक कर दी। जितने दिन सूटिंग चली ज़ूबी और बेंजामिन साथ ही रहे। उनका ये साथ अब बहुत आगे तक बढ़ चुका था। जिसे अब किसी अंजाम तक पहुँचना था।

ज़ूबी ने जब बेंजामिन को ख़ुशी-खुशी ये बताया कि वह माँ बनाने वाली है तो उन्होंने बजाय खुश होने के चिंता ज़ाहिर की और इसे किसी भी तरह न अपना ने की सलाह दी। ज़ूबी के दिल को बड़ी ठेस लगी। उसे यूँ लगा जैसे उसके वजूद को किसी ने भिगो कर निचोड़ दिया हो। उसे अपने जज़्बातों का गला खुद ही घोंटने की सलाह दे रहे थे बेंजामिन लारेंस। वह तो चाहती थी कि वे उसे किसी भी तरह स्वीकार करें।लेकिन उनको तो दुनिया की फ़िक्र थी। इस उम्र में जब, सब को पता चलेगा तो जग हसाई के अलावा और कोई चारा न होगा। बहुत तर्क-वितर्क के बाद भी वह ज़ूबी को पूरी तरह अपनाने को तैयार नहीं थे।

ज़ूबी ने भी फैसला कर लिए वह माँ तो बनेगी। वह भी धुन की पक्की थी। ज़माने से लड़ने में कोई डर नहीं था। आज उसने यही फैसला मम्मी को सुनाते हुए कहा।

- "मम्मी मैं माँ बनूँगी। वह भी बिन ब्याही।"

- "अरे ये तू क्या कह रही है। जानती भी है। हम तो दुनिया में मुँह दिखाने लायक ही नहीं रहेंगे बेटी। हम तो जीतेजी मर जाएंगे। ऐसा कर तू हमें कहीं से ज़हर ला कर खिला दे। फिर जो तेरी मर्जी आए करना।"

- "नहीं मम्मी, आप लोग मेरा साथ दो या न दो। मैं तो मेरे गर्भ में पल रही नन्हीं सी जान की हत्या नहीं कर सकती।"

- "अरे तो बात यहाँ तक पहुंच गई और तू ने बताया भी नहीं। बता कौन है वह कमबख्त। हमें भी तो पता चले। हम बात करेंगे। उससे शादी कर लो हम तैयार हैं। लेकिन तुम्हारा ये फैसला दुर्भाग्य पूर्ण है। एक बार फिर सोचो। पुनर्विचार करो इतने बड़े निर्णय ऐसे नहीं लिए जाते। केवल जन्म देने की बात थोड़े न है। उसकी इतनी बड़ी ज़िन्दगी होगी। तुम अकेले कैसे करोगी सब। उसको हर पल बाप के नाम की ज़रुरत होगी। कैसे करोगी दुनिया के सवालों का मुक़ाबला? एक दिन टूट कर बिखर जाओगी। एक पश्चाताप की आग हमेशा जलती रहेगी। तुम किसी भी तरह उस से छुटकारा नहीं पा, पाओगी। अगर लड़का हुआ तो फिर भी तुम्हारी मुसीबत कुछ कम होगी और लड़की हुई तो उसकी ज़िम्मेदारियाँ फिर एक नई कहानी को जन्म देंगी। तब तक तो हम भी ज़िन्दा नहीं रहेंगे। मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ तुम अपना निर्णय बदल लो। ग़लतियाँ इस संसार में सबसे होती हैं। एबॉर्शन करवा लो । और एक दुःस्वप्न की तरह इस घटना को भूल जाओ। हम सब तुम्हारे साथ हैं।"

- "लेकिन मम्मी, मैं ने तो एक बार निर्णय ले लिया तो ले लिया। अब आप पापा से बात कर लो और बता दो साथ दोगे या नहीं।अब निर्णय आप लोगों को लेना है।"

आख़िरकार घर वालों को ज़ूबी की ज़िद के आगे झुकना ही पड़ा।ज़ूबी ने एक खूबसूरत बेटे को जन्म दिया। जिसका नाम उसने अंश रखा। अपनी पूरी ज़िन्दगी इस नन्ही सी जान पर क़ुर्बान कर दी। फिल्मों के सभी ऑफर ठुकरा दिए। गुमनामी की ज़िंदगी में चली गई। जहाँ उसे कोई न जाने न पहचाने। अंश की शिक्षा-दीक्षा में कोई कोर कसार नही छोड़ी।बेंजामिन ने बहुत मिलने की कोशिश की। तमाम मिन्नतें कीं।हर तरह से मदद करने का ऑफर दिया। ज़ूबी ने सभी कुछ ठुकरा दिया। 

बेटे अंश ने एमबीए करके कुछ दिन नौकरी की फिर अपना बिज़नेस स्टार्ट कर दिया। आज का उसका बिसनेस रवानी पर था।आज अंश "मदर्स डे" पर माँ को विश करते हुए कह रहा था।

ए माँ तुझे सलाम। हे ईश्वर, मेरी जैसी माँ सभी को दे।



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