Moumita Bagchi

Crime Others


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अध्यापिका अनुपमा

अध्यापिका अनुपमा

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अनुपमा एक प्राइवेट नर्सरी स्कूल में शिक्षिका है। प्राइवेट स्कूलों का हाल तो आप सभी जानते ही होंगे? वहाॅ शिक्षकों से ज्यादा मान चपरासियों को मिलता है। महीने में दो दिन से ज्यादा छुट्टी लेने पर वेतन काट दिए जाते हैं ( ऐसा तो अपने कामवाली बाई के साथ भी कोई नहीं करता होगा!) और तन्ख्वाह भी ऐसी कि पूरे दो टीचरों का काम करवाकर महीने के अंत में हाथ में आधी रकम पकड़वा दी जाती है। अब अड़तीस पार कर चुकी अनुपमा के पास जब रोजगार का दूसरा उपाय न बचा तो चुपचाप इस शोषण को उन्हें सहन कर लेना पड़ा। आखिर वे एकल माॅ ( सिंगल मादर) जो ठहरी। पति के रोज-रोज के रौब और मार-पीट को बर्दास्त करने के बजाय उन्हें यह स्कूल की नौकरी कहीं ज्यादा सम्मानजनक लगी थी ।वे और उनकी बेटी अहना कम से कम आजकल रात को चैन से सो तो पाते हैं।

पर ज्यादा समय तक चैन से सोना अनुपमा के नसीब में न लिखा था। उनके स्कूल में हुई एक वारदात की वजह से जल्द ही उनकी रातों की नींद और दिन का चैन दोनों रफूचक्कर हो गए । कुछ दिन पहले की बात है। उनकी कक्षा की नन्ही ॠचा एकदिन गेम्स पिरीयड में तबीयत खराब होने की वजह से खेलने नहीं जा पाई थी ।उस समय कक्षा में अकेली रह गई थी। पिरीयड समाप्त होने पर जब अनुपमा बाकी बच्चों को लेकर वापस आई तो ऋचा को फर्श पर लहूलुहान हालत में पाया। उन्होने तुरंत प्राचार्य को इत्तला किया और ऋचा को पास के क्लिनिक में ले गई। वहाॅ डाॅक्टर की बात सुनकर उन्हें भी चक्कर आने लगा। चार साल के उस मासूम के साथ किसी ने जबरदस्ती की थी। उसके प्राईवेट पार्ट्स को बुरी तरह से रौंदा गया था। यह बात सुनकर अनुपमा जी के तो मानो पैरो तले ज़मीन ही खिसक गई!!

"फूल-सी प्यारी बच्ची के साथ ऐसी दरंदगी? कौन कर सकता है भला!! यह तो अहना के हमउम्र है। हे भगवान!!" वे सोचने लगी।।

ऋचा को जब होश आया तो वह सदमें में थी, बेहद डरी हुई और थर-थर कांप उठती थी जबतब-- दो बार उसे खून की उल्टियाॅ भी हुई लेकिन उसके मुंह से एक भी शब्द भी नहीं निकला। वह बिलकुल निर्वाक गुड़िया-सी बन गई थी। उसकी यह हालत देखकर अनुपमा पछता रही थी कि उसे कक्षा में अकेला क्यों छोड़कर गई।परंतु कक्षा में इससे पहले भी बच्चे हमेशा ही महफूस रहे थे। अब वे उसके पेरेंट्स को कैसे बताएंगी? उसकी क्लास टीचर भी वही थी। उन्होंने अपने फोन पर सीसीटीवी का फूटेज देखा।(नामी प्राइवेट स्कूल होने के कारण उनके स्कूल में काफी विकसित तकनाॅलोजी का प्रयोग किया जाता था।) फिर भी बच्बे ऐसे असुरक्षित थे!! अभी कुछ दिन पहले जब एक चौथे वर्ग के बच्चे को सर पर चोट लगी थी तब उसे प्राथमिक सेवा पूरे डेड़ घंटे के बाद ही मिल पाई थी क्योंकि स्कूल में मौजूद नर्स प्राचार्य जी के कांफरेन्स की तैयारी में व्यस्त थी।

फूटेज देखकर अनुपमा जी बुरी तरह चौंक उठी । यह तो संतोष सर हैं!! जो एम डी साहब के भतीजे हैं और बतौर सीनियर टीचर स्कूल में पढ़ाते थे। रक्षक ही जब भक्षण करने पर उतारू हो जाए तो मासूमों की जान कौन बचाएं???

अनुपमा भागी-भागी प्राचार्य के कक्ष में पहुंची फुटेज के बारे में उन्हें अवगत कराने। पर वहाॅ पहुंचकर वे देखती है कि एक बहुत बड़ी मिटिंग चल रही है जिसमें संतोष जी और एम॰डी॰ साहब भी उपस्थित है। सभी चेहरों से गंभीरता टपक रही थी । कुछ देर के लिए अनुपमा को ऐसा लगा जैसे वे कोई गहन षड्यंत्र रच रहे हैं। अनुपमा बाहर इंतजार करने लगी। मिटिंग समाप्त होने पर प्राचार्य जी ने उन्हें अपने कमरे में बुलाया। उन्होंने उनपर बच्चों की ठीकठाक देखभाल न करने का आरोप लगाया। साथ ही अपनी जिम्मेदारी सही से न निभाने की शिकायत भी की।

प्राचार्य ने उनसे कहा ," मैनेजमेंट आपकी इस लापरवाही के कारण आपसे बहुत नाराज है । इसलिए वह चाहती है कि यह इलजाम आप अपने सिर पर ले लें। "

" पर सर, असली गुनहगार तो संतोष सर है।सीसीटीवी की फुटेज यह साबित करती है"-- अनुपमा ने कहना चाहा। पर बीच में ही प्राचार्य ने उसे रोक लिया। वे गुस्से में चिल्ला उठे। फिर थोड़ा नरम होकर बोले, " आपको अपनी नौकरी प्यारी है कि नहीं?" फिर उन्होंने उसे समझाते हुए कहा, " आप नई हैं। इसलिए आप इस स्कूल के कायदों को नहीं जानती । सो, मैं आपको जैसा कहता हूं वैसा कीजिए। इस बारे में मुंह खोला तो आपको नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है। " फिर सलाह देते हुए कहा,"एकबार यह नौकरी चली गई तो दूसरी नौकरी आपको मुश्कील से मिल पाएगी।"

"पर सर यह तो अन्याय है!" अनुपमा जी ने कहना चाहा। इस पर प्राचार्य ने अपनी बेबसी जताते हुए बताया कि उनके हाथ बंधे है। उन्हें भी अपने अपने बच्चे और परिवार के खातिर नौकरी करना पड़ता है।

अब अनुपमा जी के सामने अजीब स्थिति थी। ॠचा के पेरैन्टस , मिडिया सभी को जवाब उन्हें देने पड़ रहे थे। स्कूल के सम्मान रक्षार्थ उन्हें झूठ पर झूठ बोलने पड़ रहे थे। वह सचमुच अपने आपको अपराधी समझने लगी थी जब सभी पेरेन्टस उन्हें घेरकर गाली-गलौज पर उतारू हो गए। कुछ लोगों ने तो उन पर हाथ भी उठाया। इतनी जलील वह अपनी पूरी जिन्दगी में कभी नहीं हुई थी। इधर ऋचा के माता-पिता की हालत देखकर उन्हें भी बहुत रोना आ रहा था। स्कूल मेनैजमैंट ने अनुपमा को सबके सामने धकेलकर अपना पलड़ा साफ झाड़ लिया था। संतोष को भी उन्होंने लोगो के साथ बैठकर इस तरह हंसी मजाक करते हुए देखा मानो कुछ हुआ ही न!

घर पहुंचकर उनसे अपनी बेटी अहना की ओर देखा न गया। उसे यह अहसास हुआ कि वे अपनी बेटी और अपनी समस्त छात्राओं की गुनहगार है। आधी रात को संतोष जी के भेजे गए गुंडों ने उन माॅ-बेटी के घर पर हमला किया। उन दोनों को यह कहकर डराया धमकाया गया कि अगर अनुपमा ने संतोष के खिलाफ एक शब्द भी कहा तो उन दोनो की हालत भी ऋचा जैसी कर दी जाएगी! वे लोग उनका फोन छिनकर साथ ले गए ताकि वे पुलिस को फोन न कर पाए।

रातभर अनुपमा जी पल भल के लिए भी अपनी आंखे न बंद कर पाई। रह रहकर ऋचा का चेहरा आंखों के आगे आ जाता था। आखिर क्या बिगाड़ा था उसने किसी का। देखा तो अहना उनसे चिपक कर सो रही थी। उसकी ओर देखते हुए उन्हें यह ख्याल आया कि इन मासूमों पर अत्याचार दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा है। और हम लोग यूं बेबस हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। फिर उन्हें घर से चले आते समय उसके पति के अंतिम शब्द याद आ गए, " साल भर के अंदर तुम इस घर में वापस लौट कर आओगी। इसकी गारांटी मैं देता हूं। आखिर पैसे कमाना तुम जैसी औरतों के बस में नहीं है ।"

यह नौकरी छोड़ देगी तो वापस अपने आत्मसम्मान का गला घोंटना पड़ेगा। परंतु इन नौनिहालों की रक्षा की जिम्मेदारी भी उनकी है। आखिर वे एक शिक्षिका है। ये बच्चे हमारे देश के भविष्य है। अपने जमीर को, इंसानियत को भी तो जवाब देना पड़ेगा कभी उन्हें! अन्याय को सहने वाला भी अपराधी होता है।

बाहर देखा तो अंधेरा छंटकर दिन निकलना चाह रहा था। एक नया दिन, नई उम्मीदों को लेकर उदित होने के लिए तैयार था। वह निश्चय करके उठी। पहले अपना इस्तीफा लिखा फिर सीसीटीवी फुटेज जिसे उसने गूगल में पहले ही सेव कर लिया था, लेकर पुलिस स्टेशन की ओर चली अपने शिक्षक होने का उत्तरदायित्व निभाने।


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