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Pradeep Kumar

Abstract Comedy

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Pradeep Kumar

Abstract Comedy

आनंद भवन में आनंद से ज्यादा धैर्य की परीक्षा

आनंद भवन में आनंद से ज्यादा धैर्य की परीक्षा

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मुझे पुणे से आधिकारिक कार्य पर मुंबई जाना था। वहाँ सरकारी अतिथि-गृहों की एक लंबी सूची मिली। सूची देखते-देखते मेरी नज़र एक नाम पर अटक गई—“आनंद भवन”। नाम सुनकर मन में कल्पनाएँ तैरने लगीं—समुद्र किनारे स्थित, हवादार कमरे, चाय की प्याली के साथ लहरों का संगीत और सरकारी दौरे के बीच थोड़ा-सा सुकून। मैंने अपने वरिष्ठ अधिकारी से विशेष अनुरोध कर अनुमति ले ली कि मैं वहीं ठहरूँगा।
बड़े उत्साह के साथ मैं पुणे से मुंबई पहुँचा और सीधे आनंद भवन जा पहुँचा। बाहर बड़े अक्षरों में लिखा था—“आनंद भवन”। पर जैसे ही भीतर गया, सारी कल्पनाएँ एक-एक कर टूटती चली गईं।
अंदर न कोई भव्य इमारत थी, न कोई आधुनिक सुविधाएँ। मुश्किल से तीन-चार साधारण टाइप के घर थे। रिसेप्शन पर एक पुरानी-सी टेबल-कुर्सी और कर्मचारी। उन्होंने मेरा पहचान पत्र और पत्र देखा और कहा—“जाइए, उस कमरे में ठहर जाइए।”
कमरा भी साधारण था—ऊपर से सीलन की गंध, पुरानी चारपाई और पंखा जो अपनी मर्जी से ही चलता था। थोड़ी देर बाद मैंने पानी और चाय माँगी। पानी तो मिल गया, लेकिन चाय पर जवाब मिला—“दूध नहीं है।” दूध लाने के लिए कोई बाज़ार गया और वह भी लगभग आठ घंटे बाद लौटा। तब तक मेरे “आनंद भवन” का आनंद आधा कम हो चुका था। जब आखिरकार चाय आई तो उसमें चाय-पत्ती के साथ-साथ अधकुचले कण भी तैरते मिले। जो छत से गिर रहे थे।
खैर, कार्य का समय हो गया। शाम को जब मैं लौटा तो पूछा—“खाने में क्या मिलेगा?”
उत्तर मिला—“आप पैसे दे दीजिए, तो हम दाल-चावल लेकर आएंगे। वही आपका भी खाना बन जाएगा।”रात को दाल-चावल और सब्ज़ी-रोटी बनी। सबने मिलकर खाया। उसमें भी एक अलग-सी सादगी का स्वाद था।
इसी बीच बाहर हल्की-सी बहस सुनाई दी। पता चला कि किसी और विभाग का व्यक्ति आ गया है और उसे वही कमरा चाहिए जिसमें मैं ठहरा था। कर्मचारी कह रहे थे—“एक बार कमरे का अलॉटमेंट हो गया तो बदल नहीं सकते।” फिर भी धीरे से मुझसे बोले—“अरे, आप जैसे लोग तो आते-जाते रहते हैं। अच्छा लगा कि आप सहयोगी स्वभाव के हैं और समय पर पैसे भी दे रहे हैं।”
अगले दिन मैं वापस पुणे लौट आया।

आज भी जब उस यात्रा को याद करता हूँ, तो मन में हँसी भी आती है और सीख भी—“नाम पर मत जाइए, अंदर क्या है वह देखना ज़रूरी है। कई बार नाम बड़े भव्य होते हैं, लेकिन हकीकत उतनी सुखद नहीं होती।”



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