आखिरी कदम !

आखिरी कदम !

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उन दिनों की बात है जब हम आगरा में रहते थे , मेरे पति महोदय एयरफोर्स में होने के उनकी पोस्टिंग हर दो-तीन साल में होती रहती थी, कभी - कभी एकाध साल में भी ! अब तक सर्विस क्वार्टर नहीं मिला था अतः किराए के मकान में रहते थे ! एयरफोर्स स्टेशन शहर से करीब सात-आठ किलोमीटर दूर था । मिस्टर सिकक्वार्टर में कार्यरत थे , मेरी तबीयत खराब होने कारण सिकक्वार्टर दिखाने गई थी , रास्ते में श्मशान पड़ता था।

जब जा रही थी तब भी कोई चिता जल रही थी और लौटते वक्त भी ! वहां अस्पताल (सिकक्वार्टर) में उस दिन किसी का देहांत हुआ था, उससे मेरे भीतर एक अजीब सी हलचल मच रही थी , एक अजीब- से, दुख भरे निराशाजनक अवसाद ने घेर लिया था !

जाते वक्त की चिता और वहां की मौत का अवसाद लिये लौटते वक्त की चिता, इन तीनों घटनाओं ने ऐसा झिंझोड़ा कि जैसे श्मशान कुछ कह रहा है मुझसे ! बस ,,,,, जो श्मशान कह रहा था और रिक्शे में बैठी मैं एक मुड़े-तुड़े कागज़ पर उतारती जा रही थी, आंसू बह रहे थे । आंसुओं से भीगे उस मुड़े-तुड़े कागज़ पर मेरी पहली कविता - " श्मशान " का जन्म हुआ था ! बस तब से कुछ न कुछ लिखती रहती हूं और गद्य-पद्य दोनों विधाओं में ! यह भी एक अजीब इत्तेफाक है मुझे लिखने की प्रेरणा जिन्दगी के मिटते हुए आखिरी कदम से मिली !


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