17 नवंबर-(रहस्य )गर्ल्स हॉस्टल
17 नवंबर-(रहस्य )गर्ल्स हॉस्टल
नेहा को मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिल गया था। वह और घर के लोग फूले न समा रहे थे। अच्छा रैंक पाने के लिए उसने दो वर्षों तक इन्तज़ार किया था। नेहा इसलिये भी खुश थी कि अब स्कूल ड्रेस से छुटकारा मिला था। वह मनचाहे कपड़े पहन सकती थी, मनचाहे कॉस्मेटिक्स इस्तेमाल कर सकती थी। स्कूल के दौरान बहुत पाबंदियाँ होती हैं , अब वह स्वतंत्र रहेगी। हॉस्टल में जाना उसके लिए बहुत पसंद की बात थी।
निश्चित समय पर काउंसलिंग के बाद एडमिशन हो चुका था। अब बारी थी हॉस्टल के लिये रूममेट चुनने की। कुछ देर बाद वह भी मिल गई। सृष्टि नाम था उसका।
हॉस्टल का पहला तल्ला फर्स्ट इयर के लिए होता था। वहीं रूम नम्बर छह में उन दोनों ने अपने सामान जमा लिया। रूम की व्यवस्था ऐसी थी कि दो अलग बेड के साथ एक-एक आलमीरा, एक-एक टेबल, एक-एक कुर्सी और छोटे छोटे सामान रखने के लिए मेजनुमा ड्रेंसिंग टेबल भी था। बाथरूम कॉमन था।
कॉलेज के क्लासेज़ दो दिन बाद से शुरू होने थे। दोनों के पेरेन्ट्स जा चुके थे। दो अनजान लड़कियों को एक साथ रहना था। हमउम्र लड़कियाँ जल्दी मित्र बन जाती हैं। दो दिनों तक दोनों ने इधर- उधर घूमकर पूरे कॉलेज और हॉस्टल का मुआयना कर लिया। कैंपस खूबसूरत था। हरियाली भी भरपूर थी।
दो दिनों के बाद क्लासेस शुरू हो गईं । हॉस्टल का खाना भी समय पर तैयार रहता था। कुल मिलाकर दोनों को अच्छा लग रहा था। अन्य कमरों में भी छात्राएँ आ चुकी थीं।
रैगिंग का सिलसिला थम चुका था। उस कॉलेज में रैगिंग का पैमाना थोड़ा कम ही था। एक बार रैगिंग के दूरान एक छात्रा ने चुपके से वीडियो बनाकर वायरल कर दिया था। उस साल उन लड़कियों को सस्पेंड कर दिया गया था। तब से प्रशासन और स्वयं छात्राएँ भी डरी रहती थीं। रैगिंग जैसै भयावह स्थिति को लगाम लगा था।
हॉस्टल में रात सोने के पहले नेहा अपने सारे सामान सुव्यवस्थित करके सोती थी। रात को कमरे से बाहर न जाना पड़े इसके लिए पानी की बोतल भी रख लेती थी। सृष्टि थोड़ी लापरवाह थी। उसके सामान इधर- उधर बिखरे पड़े रहते। किन्तु वह अपनी तरफ जैसे भी रहे , नेहा को फर्क नहीं पड़ता था। अक्सर वह रात को पानी पीने नहीं ही उठती थी। एक रात उसकी नींद खुली और उसे प्यास लगी। उसने बोतल उठाया...पर यह क्या, बोतल तो खाली थी। उसमें पानी की एक बूँद भी न थी। नेहा को थोड़ी झुँझलाहट हुई। सृष्टि भले ही अपना सामान जैसे तैसे रखे लेकिन उसका रखा पानी पीना तो ज्यादती थी। उसे भी अपना बॉटल भर कर रखना चाहिए था। फिर उसने सोचा कि किसी को पानी के लिए नहीं टोकना चाहिए। उसे प्यास लगी होगी तो पी लिया होगा उसने। अब वह ध्यान देने लगी कि ऐसा अक्सर ही होने लगा था। पहले से ही हो रहा था शायद क्योंकि वह पानी पीए या नहीं, बोतल हमेशा खाली ही रहती थी।
एक रात नेहा कॉलेज के फंक्शन की वजह से थकी हुई थी तो पानी नहीं रख पाई। रात उसे प्यास लगी तो तब उसे याद आया लेकिन रात को वह अपना कमरा नहीं खोलती थी। मन मार कर फिर से सो गई। सुबह जब उसकी नींद खुली तब वह बॉटल नीचे जमीन में गिरी हुई थी। उसे लगा कि खाली बोतल हवा के झोंके से गिर गई होगी। दूसरी सुबह तो हद ही किया सृष्टि ने। उसने नेहा की कंघी इस्तेमाल की थी। कंघी में लगे बालों से नेहा को पता चल गया। लिपस्टिक भी खुली थी। सृष्टि कमरे में नहीं थी कि वह पूछ पाती। वह सवेरे ही कहीं चली गई थी। यदि आज वह कमरे में होती तो आज नेहा चुप नहीं रहने वाली थी।।
थोड़ी देर बाद सृष्टि घबरायी हुई कमरे में आई और बोली,”घर से फोन आया था नेहा। मम्मी सीरियस हैं। मुझे थोड़ी देर में निकलना होगा। अभी मैं वार्डन से यही पूछने गई थी। “
नेहा उससे कुछ पूछ न सकी। सृष्टि ने बैग में थोड़े कपड़े डाले और निकल गई। उसके जाने के बाद नेहा ने सब कुछ व्यवस्थित कर लिया। उसके बाद क्लास के लिये निकल गई। शाम को आने पर अपनी दिनचर्या के मुताबिक उसने बोतल में पानी रखा। अपने कॉस्मेटिक्स ठीक ढंग से सजाकर अपनी पढ़ाई करने लगी। पढ़ते पढ़ते उसकी आँख लग गई और वह सो गई।
आधी रात को उसकी नींद खुली तो कमरे की बत्ती बुझी हुई थी।
“मैने तो बत्ती नहीं बुझाई थी फिर कैसे...”सोचती हुई वह स्विच बोर्ड की ओर बढ़ी। उसने बत्ती जलाई। पानी की बॉटल खाली थी। यह देख नेहा की आँखें विस्फरित रह गईं। उसने इधर उधर देखा । शायद वह पानी रखना भूल गई होगी, यही सोचकर वापस बेड पर आ गई। उसने बत्ती जली ही छोड़ दी। काफी देर तक उसे नींद नहीं आई। वह आँखें बंद करके पड़ी रही। अचानक बत्ती बुझ गई। नेहा को लगा कि बिजली चली गई होगी। वह उठी नहीं। कुछ देर बाद उसे नींद आ गई। सुबह उठने में थोड़ी देर हुई। घड़ी की ओर देखा तो ब्रेकफास्ट का समय हो चुका था। जैसे थी वैसे ही कमरा बंद करके ब्रेकफास्ट के लिए चली गई। वापस आकर क्लास के लिये तैयार भी होना था। उसने जल्दी से स्नान किया और ड्रेसिंग टेबल के पास पहुँची। उसके सारे कॉस्मेटिक्स बिखरे पड़े थे। फाउंडेशन की शीशी खुली थी। लिपस्टिक भी खुला था। काजल स्टिक भी एक ओर लुढ़का पढ़ा था। और तो और कंघी में भी कुछ बाल लगे थे।
यह सब देख नेहा हैरान रह गई। अब तो सृष्टि भी नहीं थी तो यह सब कैसे। उसने इधर उधर देखा। उसकी आँखें फैल गईं जब उसने देखा कि सृष्टि के बिस्तर पर सिलवटें पड़ी थीं जैसे अभी अभी कोई सोकर बाहर गया हो। नेहा का कलेजा धक- धक करने लगा। उसने हड़बड़ी में माँ को फोन लगाया और सारी बातें बताईं।
“नेहा, तुम्हारी कोई दोस्त होगी बेटा,”मम्मी ने कहा।
“नहीं माँ, मेरी रूममेट सृष्टि घर गई है और मैंने रूम का दरवाजा लॉक करके रखा था,”वह घबराई आवाज में कहे जा रही थी।
“तो ऐसा करो, ये बातें अपनी वार्डन को बताओ। और हाँ, हनुमान चालीसा भी पढ़ लो। इससे तुम्हारा डर कुछ कम होगा।”
“अच्छा माँ, फोन रखती हूँ। क्लास के लिए देर हो रही। यह कहकर उसने मोबाइल बेड पर रखा और तैयार होकर निकलने लगी। ज्योंहि वह दरवाजे तक पहुँची अचानक दरवाजा बंद हो गया। वह हैंडल बार बार घुमाने लगी किंतु वह खुल ही नहीं रहा था। वह दौड़कर बेड के पास गई और मोबाइल से वार्डन को फोन लगाया।
“मैम , मैं अपने कमरे में लॉक हो गई हूँ। दरवाजा ही नहीं खुल रहा। रूम नम्बर सिक्स”, इतना ही बोल पाई थी कि उसे लगा किसी ने मोबाइल उसके हाथों से छीन ला हो। घबराहट के मारे वह बेहोशी महसूस करने लगी।
“माँ ने कहा था हनुमान चालीसा बोलने को”,यह सोच वह बोलने लगी ”भूत पिशाच निकट नहीं आवे, महावीर जब नाम सुनावे”...अभी इतना ही बोल पाई थी कि भड़ाक से दरवाजा खुल गया। लगा जैसे कोई बाहर निकल गया हो। वह बिस्तर पर अर्धमुर्छित सी पड़ी थी। तबतक वार्डन आ चुकी थीं। रूम का दरवाजा खुला देख अन्दर आ गई। नेहा बेसुध पड़ी थी। वार्डन ने उसके चेहरे पर पानी की छींटें मारीं तो नेहा ने आँखें खोलीं।
“क्या हुआ नेहा, तुम्हारी तबियत तो ठीक है न”
“मैम कोई था यहाँ, उसने मेरा पानी पी लिया, मेरे कॉस्मेटिक्स फैला दिये और सृष्टि के बेड पर सोया भी था।”
“नहीं नेहा, ऐसा कुछ नहीं हुआ होगा, यह तुम्हारा वहम है।”
“नहीं मैम , यह वहम नहीं था"
“अच्छा, मेरे साथ चलो,”नेहा को लेकर वार्डन अपने कमरे में आ गईं। उन्होंने उसे गर्म कॉफी पिलाई। और वहीं आराम करने को कहा। कुछ देर बाद नेहा को अच्छा लगा तो वह क्लास करने चली गई।
जैसे जैसे शाम हो रही थी , नेहा का मन घबराने लगा। उसे अपने कमरे में जाते हुए भी डर लगने लगा। उसने यह बात अपनी एक सहेली को बताई तो वह साथ आ गई। नेहा ने अपना बॉटल लिया । सारे बिखरे सामान आलमीरा में बंद कर के ताला लगा दया। बिस्तर ठीक किया और उसी सहेली के साथ उसके कमरे में आ गई। आज उसे अकेले रहने की हिम्मत नहीं थी। वार्डन ने भी अनुमति दे दी कि वह उसी सहेली के रूम में रात को सो जाए।
रात हुई। नेहा की आँखों में नींद नहीं थी । बस आँखें बंद करके लेटी हुई थी। रात गहराने लगी तो धीरे धीरे नींद की आगोश में आ गई। नींद में ही उसे लग रहा था जैसे कोई पानी माँग रहा हो। उसने सोचा कि वही सहेली होगी, पर वह तो गहरी निद्रा में थी। फिर कौन था। उसका दिल जोर जोर से धड़कने लगा किन्तु उसने सहेली को जगाना उचित नहीं समझा। कुछ ही देर बीते थे कि उसे लगा जैसे उसके कमरे का आलमीरा का दरवाजा कोई जोर जोर से झकझोर रहा था। वह निष्प्राण सी पड़ी थी। एकाएक आवाजें आनी बंद हो गई। वह चुपचाप सुबह होने का इन्तेजार करने लगी। सुबह हुई तो सहेली ने कहा,” गुड मॉर्निंग नेहा, रात अच्छी नींद आई न”।”
“नहीं, कोई पानी माँग रहा था और मेरे कमरे में कोई मेरा आलमीरा झकझोर रहा था।”
“अच्छा, पर मुझे तो कुछ भी सुनाई नहीं पड़ा। चलो तुम्हारे रूम में चलते हैं।”
आगे आगे उसकी सहेली थी और पीछे डरती हुई नेहा जा रही थी। सहेली अन्दर जाकर उल्टे पैरों वापस आ गई। “क्या हुआ”, कहती हुई नेहा रूम के दरवाजे पर आ गई। आज भी बिस्तर पर सलवटें पड़ी थीं। नेहा का आलमीरा खुला था और टूटा ताला वहीं पर गिरा हुआ था। दोनों सहेलियाँ दौड़कर वार्डन के पास पहुँचीं और सारी बातें बताईं।
वार्डन ने सब कुछ अपनी आँखों से देखा। जल्दी नेहा के घर में फोन करके वार्डन ने बथाया कि यहाँ कुछ तो हो रहा। आप नेहा को ले जाएँ या यहाँ आकर दो तीन रहकर सब कुछ देखें।
शाम होते होते नेहा के पेरेन्ट्स आ गए। उनके साथ तंत्र मंत्र जानने वाला भी कोई था। नेहा को देखते ही उसने कहा कि नेहा अकेली नहीं, कोई उसके बगल में खड़ी है।
“कौन”
“एक लड़की हाथों में पानी का गिलास लिए खड़ी है। उसके होंठ सूखे हैं। लगता है जैसे वह कितनी प्यासी है”।
“ओह! अब क्या होगा।”
“देखता हूँ,” कहकर तांत्रिक ने अपने झोले से एक लकड़ी निकाली और से जलाया। वह छटपटा गई।
“आग बुझाओ,” वह जोर से चीखी।
“नहीं, पहले सबके सामने आओ”
“नहीं, वह मारेगी”
“कौन मारेगा”
“वहीं , जिसने रैगिंग के लिए मुझे एक बिल्ली के साथ कमरे में बंद कर दिया था।”
“कहाँ है वह””
“यहीं खड़ी है हरे सूट में”
“ठीक है, पर अब तुम सामने आओ ताकि वह भी तुम्हें पहचान सके। वह तुम्हें मार नहीं सकती। हमलोग हैं यहाँ पर।’”
अचानक वहाँ पर हवा का झोंका सा आया और वह हाथों में गिलास लिए सामने खड़ी थी। हरे सूट वाली लड़की , जिसका अब फाइनल इयर था, उसे देखते ही घबरा गई।
उसे याद आया कि उसने उसे एक बिल्ली के साथ कमरे में बंद कर दिया था। उसके बाद कॉलेज में एक सप्ताह की छुट्टी हो गई थी। सभी अपने घर चले गये थे। स्टोर वाले उस कमरे की ओर किसी का ध्यान नहीं गया था।
जब वापस कॉलेज खुला तो उस कमरे से वह लड़की और बिल्ली की लाश मिली। यह सब किसने किया यह कोई नहीं जान पाया।
“प्यासी थी, बहुत प्यासी थी मैं। बिल्ली ने मेरा चेहरा नोंच लिया था। मैं तड़प- तड़प कर मर गई। मुझे प्यास मिटानी है और अपना चेहरा भी वापस सुन्दर बनाना है।”
उस लड़की की ये बातें सबने सुनीं। हरे सूट वाली लड़की का अपराध सबके सामने आ चुका था।
“अब तुम्हें क्या चाहिए। कैसे जाओगी यहाँ से”
“प्यास बुझाकर”
कैसे”
“उसी लड़की के हाथों से मुझे पानी पीना है। और वही मेरा चेहरा सँवार दे , फिर चली जाऊँगी।”
“उस सीनियर लड़की ने उसे अपने हाथों से उसे पानी दिया जिसे वह गटागट पी गई। अब चेहरा सँवारने की बात हुई तो वह आगे बढ़ी। बिल्ली ने उसका चेहरा लहुलुहान किया हुआ था जिसे देख वह चीख पड़ी। फिर भी उसने अपने दुपट्टे से उसका चेहरा पोंछा। उसका हरा दुपट्टा लाल हो चुका था। अब वह सिर झुकाकर हाथ जोड़कर उसके सामने खड़ी हो गई।
“हा हा हा हा, चलो माफ किया। अब जाती हूँ। मेरी प्यास बुझ गई। अब नहीं आऊँगी।”
उसके बाद सबने हवा का झोंका महसूस किया। अब वहाँ पर वह नहीं थी।
रैगिंग का भयानक परिणाम सामने था जो हॉस्टल के कमरे में दबा ही रह जाता, पर नहीं...अपराध कभी न कभी सिर उठाकर सामने आ ही जाता है।

