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Ruchi Madan

Abstract


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Ruchi Madan

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ज़िन्दगी की रेल

ज़िन्दगी की रेल

1 min 323 1 min 323

अपनी ज़िन्दगी की रेल अब थक गई है

झूठे रिश्तों की पटरी पे चलते चलते

थक चुका हूँ अब मैं इन का मोल चुकाते चुकाते

रोक दो मैं अब उतरना चाहता हूँ

अब अकेले ही गुनगुनाना चाहता हूँ



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