युद्ध का शोर
युद्ध का शोर
द्वंद है दुनिया में किस बात का है ये शोर
हर ध्वनि में छुपा है किस में कितना जोर
सागर तेरी छाती फटती क्यों नहीं आज
बरस रही ज्वाला उतरता नहीं किंतु ताज
मिसाइलों का शोर है सत्ता है डांवाडोल
किसने कितना किया तबाह गर्वित हैं बोल
जीत के इन नारों में दब गई सबकी चीख
महल सजाते खंडहरों पर कैसी यह रीत
नक्शों की इन लकीरों ने लहू बहुत पी डाला
सरहदों की धूं धूं आग ने शांति को है निगला
ईरान की इन गलियों से वाशिंग्टन की मेज तक
है बारूद की गंध सिर्फ विध्वंस की सेज तक
दाम चढ़े आकाश को खाली हाथ पसार
चूल्हे पड़ गए ठंडे अब महंगाई की है मार
अनाज के हर दाने पर सियासत का पहरा है
भूख का ये जख्म अब नासूर से भी तगड़ा है
छूट गया वो आंगन अकारण छूट गई वो राहें
अनजानी मंजिल की ओर फैली है सूनी बाहें
कंधे पर गृहस्थी का बोझ आंखों में है पानी
शरणार्थी बन भटक रही आज की ये जवानी
ये जीत नहीं है हार है यदि मानवता रोती है
बारूद की कोख से भला क्या शांति भी होती है
उतरेगा एक दिन वो नशा जो सर चढ़ कर बोल रहा
जब वक्त तराजू खोलकर हर पाप को तोल रहा
©®जीवन समीर
