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Prem Bajaj

Romance

4  

Prem Bajaj

Romance

यज्ञ प्यार का

यज्ञ प्यार का

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हर दिन, हर पल करती हूं यज्ञ में ,

हवन - कुण्ड में तेरी यादों की आहुतियां डाली कर

आंसुओं का डाला घी , तन को जलाया

हवन - कुण्ड की लकड़ी बना कर ।

जो की थी तुमने मुझसे वो प्यार भरी बातें ,

तेरे उन शब्दों को बनाया मंत्र मैंने

बढ़ी जब त्रिशनगी शबे- हिज्रा में तो

तारे भी नज़र आने लगे हवन की जलती लपटों से ।

भड़की जो ज्वाला तेरी यादों की ,

छुअन तुम्हारी का एहसास दिला कर ,

स्वाहा कर गई मुझे ।

तुम्हारे प्रेम सुधा रस का प्यासा हृदय ,

चाह इन अधरों को तुम्हारे अधरों का चरणामृत पीने की ,

बना लो जो अपने प्यार के हवन -कुंड की समिधा ,

यज्ञ की पूर्णाहुति से मिल जाए चिर शांति ,

धधक कर तुम्हारे प्यार की आहुति में हो जाऊं स्वाहा ।

चुप रह कर ही मोहब्बत निभाई मैंने जला कर अपने मन को हवन कुण्ड में ,

बस और ना अब सहन होगा ,

लगता है खुद ही जल जाऊंगी मैं इस हवन कुण्ड में ,

तब होगा संपूर्ण यज्ञ मेरे प्यार का ।


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