यह कैसा वैशाख
यह कैसा वैशाख
जिंदगी की बैसाखियों पर
चलकर यह आज
कैसा वैशाख आया।
न आज भांगड़े हैं
न मेले सजे हैं।
फसल कटने -काटने का
किसे ख्याल आया।
ज़िंदगी की बैसाखियों पर
चलकर आज
कितना मजबूर वैशाख आया।
गेहूँ की फसल का
घर के
आंगन में आज न ढेर आया।
वह मेलों की रौनक को
आज मैंने घरों में बंद पाया।
दिहाड़ी -दार अपना दर्द
ढोल की तान पर ना भूल पाया।
जिंदगी की बैसाखियों पर
चलकर यह कैसा वैशाख आया।
वह हल्की गर्म हवाओं के साथ
न तेरी धानी चुनर का
पैगाम आया।
यह कैसा
उदास ऊबा हुआ वैशाख आया।
