ये खामोशियाँ
ये खामोशियाँ
क्या सुनी है कभी तुमने खामोशिया,
जो बुला रही हैं तुझे भी और मुझे भी,
एक पल जरा तुम भी रुकना,
और सुन लेना यह खामोशिया,
जो सुन रही हूं मैं,
न जाने कब से।
पर शायद सुन नहीं पाए तुम,
तू भागना चाहते थे,
वक्त के आगे
और मैं ठहर गयी,
एक पगली दीवानी सी,
इन खामोशियो में उलझ,
एक खामोश पुस्तक बन,
जो लिखती गयी,
न जाने कितनी खामोशियाँ,
वह अनकहे,अनसुलझे अल्फ़ाज़,
जो युगों युगों से कह रहे है अपनी बात,
खामोश रह कर,कर्म पुजारी बन कर।
कभी तुम भी करना,
इन वृक्षो,इन शैलो,इन नदियों
और इन पशु पक्षियों से बाते,
शायद तब समझोगे तुम,
तुम्हारी करुनाहीनता ने,
न जाने कितनों को मजबूर किया,
केवल खामोशी में बात करने को,
केवल खामोशी ही सुनने को।
सुनो न,
मानव तुम्हे ही बनाया था न,
उस परमात्मा ने,
दे इतने गुण,
भेजा रक्षा करने धरा की,
और तुम भूल गए
कि धरा का सब धरा पर ही रहता हैं,
जाता कुछ नहीं संग हमारे
कर दिया तुमने सबको खामोश,
अश्रुप्रित नयन दे
कौन सी दुनिया सजायी तुमने,
देखो वही खामोशियाँ,
मंडरा रही तेरे चारों ओर,
सुनना जरूर और
समझना अपनी करुनाहीनता को।।
