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Sanjay Jain

Abstract


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Sanjay Jain

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वतन से प्यार

वतन से प्यार

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निभा गये मोहब्बत हम  

वतन से कुछ इस तरह।

छुड़ा दिये छक्के हमने

दुश्मनों के जंग में।

पड़ गया भारी उसे

कायराना हमला ये।

जब जवाब से पहले ही 

टेक दिए घुटने उसने।

आओ मिलकर हम सब 

खाये एक कसम।

झुकने देंगे नहीं

अपने तिरंगे को हम।।


छोड़ कर सारी हदें 

हम पार कर जाते हैं।

जब आती है वतन की

रक्षा की बात।

तब लगा देते हैं

जिंदगी अपनी दाव पर।

पर गुसने देते नहीं  

दुश्मनों को हम।

आओ मिलकर ले 

एक शपथ हम सब।

आंच आने नहीं देंगे

अपने वतन पर हम।।


जान जाये तो जाये

इसका कोई गम नहीं ।

पीछे हटेंगे नहीं  

अपने फर्ज से हम।

आएगी मरने मारने की

बात जब भी समाने।

खोलकर सीना अपना

हम डट जाएंगे।

पर वतन पर कोई 

आंच आने न देंगे।

और इस तिरंगे को 

झुकने देंगे नहीं ।।



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