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Sanjay Jain

Abstract

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Sanjay Jain

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आदि सा हो गया हूँ*

आदि सा हो गया हूँ*

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सागर से भी गहरा है,

हमारा रिश्ता।

आसमान से भी ऊंचा है,

हमारा रिश्ता।

दुआ करता हूँ 

ईश्वर से की।

ऐसा ही बना रहे

 हमारा रिश्ता।।


देखे बिना जान लेता हूँ।

बोले बिना ही तुम्हे, 

पहचान लेता हूँ।

रूह का रूह से जो है, 

हमारा रिश्ता।

इसलिए तो हर आहट,

तेरी जान लेता हूँ मैं।।


अब तो खुशियों से, 

दूर रहा करता हूँ मैं।

अंधेरों मैं जीने का, 

आदि हो गया हूँ मैं।

जब से गई है वो,

मेरी जिंदगी से दूर।

तभी से अंधेरों मैं,

जीने का आदि हो गया।।




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