Rati Choubey

Abstract


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Rati Choubey

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वसुधैव कुटुंबकम् --

वसुधैव कुटुंबकम् --

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अंतरतम से पूछो

अंतरतम में झांको

निकलेगी बस "ध्वनि"एक

वसुधैव कुटुंबकम्--


ईश्वर‌ , अल्ल्लाह, वाहेगुरु

भेद नहीं सब "एक" है

‌ "जात-पात" मज़हब" को ले

फिर क्यूं "खून खराबा है ये


"धरा एक" आकाश" एक"

हम क्यों होते हैं छिन्न -भिन्न

रंग एक, दर्द एक , प्रीत एक

" लहूं " रंग है। सबका लाल


बनों "वृक्ष " से दानवीर

खुद भूखा रह फल देता

‌ "बादल" से बन जाओ तरल

खुद भूखा रह , बरस पड़ो


लहराती नदियां बन जाओ

"खुद" प्यासी रह बहती जाओ

"पुष्प" बनों। महकाओ जंग को

" खुद" रह जाएं वंचित महक से


मलयाचल से चले "पवन"

दे शीतलता हर जन को

‌ "उर्जित" करें रवि। सबको

क्या छुपता वो "नभ" में कभी


"दीपक-बाती" से जलकर

‌‌‌ "तम" हरकर उजियारा करदो

"चंदा" बन बिखरा दो चांदनी

करदो " दुग्धमय " कण कण को


"धरा" अकेली बोझ सहे

वैसा अपना जीवन करलो

‌ बन जाओ तुम "निशा सांवरी"

‌‌‌‌‌‌ " खुद" जागो ,सबको सुलाओ


""मूर्तिकार" अपनी छैनी से

गढ़ता अनगिनत सुंदर "मूरत"

"खुद" को वो कभी ना गढ़ता

देख देख होता ही गदगद


ईर्षा ,घृणा , का करो "दफन"

संकल्प, प्रतिज्ञा,कर हो "एकाकार"

‌‌‌जड़ चेतन में जब " ब्रह्म" एक है

क्यों। फंसते हो तेरे मेरे‌ जाल में


हर प्राणी में ईश्वर एक है

सारी दुनिया एक" परिवार "

"वसुधैव कुटुंबकम्" मंत्र जाप कर

बढ़ते जाओ कदम ,कदम -++



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