वफ़ा का प्रारंभ हो
वफ़ा का प्रारंभ हो
सुनो तुमसे मैं कुछ कहना चाहता हूं
जवानी न सही अब साथ रहना चाहता हूं,
अपनों की खुशी का सोचता रहा हमेशा
सबकी जेबें भरता रहा हमेशा
जब ख्वाब थे जोश था दिल में
किसी के साथ के अरमान थे दिल में
मैं ने वह वक्त अपनों को दे दिया
सारा जीवन आदर्श बनने को दे दिया
कभी पिता का मान रखना था
कभी मां का अरमान पूरा करना था
कभी पत्नी के आशाएं थीं
औलादके सपने सच करना था
यह ज़िन्दगी जो मैं ने जी
कभी अपने लिए जिया ही नहीं
मगर अब जो किसी काम का न रहा
कहते हैं कुछ किया ही नहीं
जब बोझ मेरा पड़ा उन पर
ला के मुझे फेंक दिया इधर
मैं अपनी जिंदगी से उकता गया था
खिज़ा के फूल जैसे मुरझा गया था
तुम्हारा साथ मुझे अच्छा लगा
तुम्हारा हर दुख अपना सा लगा
तुम्हें हंसते देख हर दुख पराया लगता है
ज़िन्दगी की धुप में कोई घना साया लगता है
सुनो मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूं
जवानी न सही अब साथ रहना चाहता हूं
क्यों न ज़िन्दगी का नया आरंभ हो
आखरी सांस तक वफ़ा का प्रारंभ हो!

