वो सुनहरी मिट्टी
वो सुनहरी मिट्टी
वो सुनहरी मिट्टी,
गीली, सौंधी सी खुशबू वाली,
कुम्हार के हाथों से गुथकर,
जब चाक पर चढ़ती है,
ऐसा लगता है जैसे,
अपने भाग्य पर इठलाती है,
कुम्हार के हाथ बेरोकटोक,
चलते रहते चाक पर,
एक के बाद एक,
अनगिनत दीये बनाती है,
वो सुनहरी मिट्टी,
गीली, सौंधी सी खुशबू वाली,
अब पकने को तैयार हो जाती है,
अग्नि में तपकर रंग निखर जाता,
तेल और बाती का संग भाता,
जलने से द्वार जगमग हो जाता है
वो सुनहरी मिट्टी,
गीली, सौंधी सी खुशबू वाली,
जब दीप खुशियों का जलता है,
हर घर रोशन होकर महकता हैI
