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वो पहली नज़र

वो पहली नज़र

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कैसे भूलूँ वो पहली नज़र, जो मेले में टकराई थी

तुझे मुस्कुरता देख के मैं भी, मन्द मन्द मुस्काई थी

अदाओं से तू घायल करता, पर सूरत तेरी भोली थी

और भरी महफ़िल में हमने, खेली आँख मिचौली थी।


 हुई शरारत नज़रों से तेरी, मैं भी तो शरमाई थी

 ‎कैसे भूलूँ वो पहली नज़र, जो मेले में टकराई थी

 ‎लगा था मेरे दिल पर आकर, तीर जो तूने फेंका था

 ‎मतवाले नैना थे तेरे, जिससे दिल मेरा बहका था।


 ‎हमें देख मौसम भी बहका, और उसने ली अंगड़ाई थी

 ‎बसन्त ऋतु थी, मधुर मिलन था, कुछ बूँदें भी बरसाई थी

 ‎कैसे भूलूँ वो पहली नज़र, जो मेले में टकराई थी

 ‎असर तेरी ख़ामोशी का, मेरे लबों पर भी तो छाई थी।


 ‎नज़रों ने की वो बातें जो मैं, तुझसे ना कह पाई थी

 ‎जिन आँखों में खोई थी मैं,उनमें बसने की ख़्वाहिश थी

 ‎तू मेरा हो जाये जाना, बस इतनी फ़रमाइश थी

 ‎अभी तो मन भर मिले भी ना हम, घड़ी बिछरन की आई थी।


 ‎पल भर में जिसे समझा सबकुछ, वो बस इक परछाईं थी

 ‎कैसे भूलूँ वो पहली नज़र, जो मेले में टकराई थी

 ‎यूँ नज़रों से दूर हुआ तू, जैसे टूटा कोई सपना था

 ‎टूट रही थी मैं भी ऐसे, जैसे छूटा कोई अपना था।


 ‎बिख़र गया वो ख़्वाब टूटकर, जिसकी जोड़ी पाई-पाई थी

 ‎कैसे भूलूँ वो पहली नज़र, जो मेले में टकराई थी

 ‎कुछ पल की मनमानी थी, पर दुनिया से अनजानी थी

नज़रों हीं नज़रों में सिमटी, मेरी पहली प्रेम कहानी थी।


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