वो एक टुकड़ा कागज़ का
वो एक टुकड़ा कागज़ का
पहली मोहब्बत का गवाह एक टुकड़ा काग़ज़।
बेवफ़ा फिर भी कोई काम न आया काग़ज़।।
हाल किस दर्जा कहूँ अपने दीवानेपन का।
नाम लिख लिख के तेरा दिल से लगाया काग़ज़।।
जिस पे लिक्खा था मेरे प्यार का अफ़साना वही।
गर्दिश-ए- वक़्त ने हर सू वो उड़ाया काग़ज़।।
जिसपे तस्वीरें- मुहब्बत थी बनाई मैंने।
दिल के दुश्मन ने वही आज जलाया काग़ज़।।
यूँ शबे- हिज्र की तहरीर पे आँसू टपके।
जैसे बरसात के पानी में नहाया काग़ज़।।
बेगुनाही की मेरी जिस पे लिखी थी तहरीर।
वो अदालत में भी कुछ काम न आया काग़ज़।।
इसकी दुनिया में है रिश्तों से ज़ियादा क़ीमत।
नोट की शक्ल में ये कैसा बनाया काग़ज़।।
ऐसे अरमानों पे है बोझ रखा सीने में।
जैसे पत्थर के तले कोई दबाया काग़ज़।।
उम्रभर साथ निभाने का था वादा जिसमें।
वक़्त आने पे वही मुझको न पाया काग़ज़।।
जिसमें पोशीदा मुहब्बत के थे छुपे कुछ राज़।
जाने किस किस से वही मैंने छुपाया काग़ज़।।

