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ritesh deo

Tragedy

4  

ritesh deo

Tragedy

वक्त

वक्त

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मेरे पास कोई अपना नहीं था

अपनों के साथ कोई सपना नहीं था

मंजिलें अनगिनत थी कोई नाम नहीं था

मंजिलों के आगे कोई साथ नहीं था !


मैं खोजता रहा अपने आस पास कुछ बिखरे पन्ने

समेटता रहा यादें कि कुछ तो जी लूँ इसके सहारे

सब अर्थहीन थें बेमोल बेरंग बेहिसाब अनकहे

मैं ढूंढता रहा कुछ तो मिले अवशेष मेरे अपनों का !


सब बिखरे थें अपने आप में.........


कहीं चाहत उलझ रही थी कहीं नफरत उलझ रही थी

कहीं प्रेम उलझ रहा था कहीं घृणा उलझ रही थी

कहीं सोच पलट रही थी कहीं समझ बिखर रही थी

मेरे अनगिनत सवाल खुद में उलझ रहें थें !


कहीं बातें बन रही थीं कहीं बातें चल रही थी

कहना सुनना अपना था और बातें उलझ रहीं थीं

कहीं सांसे चल रहीं थीं कहीं सांसे थम रहीं थीं

बस सांसों में कोई अपना सांसों से मिल रहा था !


मुमकिन नहीं था चलते चलते मिलना

आसान नहीं था उस रूह तक पहुंचना

जहाँ सब होता है अपना सिर्फ अपना

मुझे रुकना पड़ा चलने से पहले....... !


वक्त था जो साथ नहीं दिया मैं तो चाहता था चलना

हर मोड़ पर रोकता गया मंजिल बदलता गया

वक्त भी मेरे साथ बेईमानी करता गया

मेरे अपनों को मुझसे क्रूर बन छिनता गया !


मैं समेटता गया वह बिखेरता गया

मैं सहता गया वह भेदता गया

मैं देता गया वह लेता गया

एक दिन कहा वह चुपके से.....


चलना होगा तुझे अब साथ मेरे बन कर वक्त


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