वह पेड़
वह पेड़
वह पेड़
वह पेड़ खड़ा रहा ,
तपती धूप में तपता रहा
अपनी ज़मीं से जुड़ा रहा ,
अपनों की सुख की खातिर ,
पल - पल मौसम की मार सहता रहा ,
वह पेड़ खड़ा रहा I
शाखाएँ बढ़ती रही ,
औ वह सबको छाया देता रहा ,
टूटकर भी सबकी छत बना रहा ,
स्वयं जलकर राख हुआ ,
किंतुं सबकी क्षुधा मिटाता रहा ,
वह पेड़ खड़ा रहा I
स्वार्थलोलुप अपनों ने ,
आज नाता तोड़ दिया ,
पर फिर भी वह सब पर ,
सुमन स्नेह बरसाता रहा ,
वह पेड़ खड़ा रहा I
आज है अकेला वह ,
बन गया है एक ठूँठ ,
तक रहा अपनों को ,
कोई फिर उसकी सुधी लेगा ,
प्यार की शीतल छाया ,
फिर अपनों से मिलेगी ,
इसी आस में वह सारा जीवन बिताता रहा I
वह पेड़ खड़ा रहा .......
संसार के हर कर्तव्यनिष्ठ एवं परिवार के प्रति समर्पित हर पिता को समर्पित।
