vasant
vasant
गीत : सखी, वसंत देखो झूम रही है सखी, वसंत देखो झूम रही है, पीली धूप हथेली चूम रही है। आँगन में उतरी सरस बहार, धरती भी मुस्कान बुन रही है। वीणा के तारों पर गूँज उठी माँ सरस्वती की शुभ वंदना, ज्ञान-दीप जले कण–कण में, मौन बने आज मधुर साधना। पुस्तक खुली है, कलम जागी, सोई हुई चेतना बोल रही है, अज्ञान के तम को चीर-चीरकर बुद्धि स्वयं दीप हो रही है। इसी वसंत की पावन तिथि में जन्मा था आज़ादी का तूफ़ान, सुभाष नाम, ललाट पर ज्वाला, जो डर को किया था चुनौती दान। “तुम मुझे खून दो” की दहाड़ अब भी नसों में दौड़ रही है, भारत माँ की आँखों में आज भी उसकी प्रतिज्ञा सो रही है। इसी वसंत की उजली भोर में मालवीय ने सपना बोया था, काशी की मिट्टी से उठकर ज्ञान का गंगाजल ढोया था। बनी थी नींव जब BHU की, तो केवल ईंट-पत्थर न थे, वह भारत के भविष्य का संस्कारों से गढ़ा स्वप्न थे। जहाँ विद्या राष्ट्र बने दीपक, जहाँ चरित्र हो पहली पहचान, जहाँ पढ़ाई केवल नौकरी नहीं बल्कि मानवता का हो विधान। सखी, वसंत केवल ऋतु नहीं, यह चेतना की मुस्कान है, ज्ञान, त्याग और स्वाभिमान से रचा गया भारत का गान है। आज फूल नहीं — विचार खिलें, आज रंग नहीं — संकल्प चढ़े, सरस्वती, सुभाष और मालवीय तीनों आत्मा में दीप बन जले। सखी, वसंत देखो झूम रही है… भारत की आत्मा गूँज रही है। ©बिमल तिवारी आत्मबोध
