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Harshita Dawar

Tragedy

3  

Harshita Dawar

Tragedy

उम्र मरहम की

उम्र मरहम की

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दिल ना माने क्या हुआ

कहीं देखा था हिस्से में बंटे धर को।


कहीं देखा था यूं आंखों में अधुरे सपने

जो बच्चों की आंखों में सजाएं थे।


कहीं देखा था हिस्सों में बांट दिया यूं बच्चों ने

एक ही बागबान के फलों को

तोड़ कर बांटते हुए देखा।


दिल ना माने क्यों हुआ

वहीं बचपन के पलों को बांटते हुए देखा।

बचपन की टॉफियों को पैसे के

तराजू में तुलते हुए देखा।


नादानियों को बुज़दिली

दिखाते हुए देखा।

अपनों के सपनों को शीशे की तरह

चकनाचूर होते देखा।


दिलों के प्यार की जगह पैसे को

मतलब से बातें करते देखा।

यूं ही नहीं दिल ना माने कड़वे जज्बात।

खोट भरे है दिल में मीठी जुबान से

दिखावा करते देखा।


दिलो में प्यार खोज के

थोड़ी इज्जत जो बाकी है

उसको एहसासों से भर दो।


बचपन के खेल को खेल ही रहने दो

दिलो से खेलना बंद करो

इज्जत जो बाकी है प्यार से

मरहम लगा लो।


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