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Surendra kumar singh

Abstract

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Surendra kumar singh

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उम्मीद के शहर में

उम्मीद के शहर में

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उम्मीद का शहर है ये

प्यासे तृप्त हो रहे हैं

सपने सच में बदल रहे हैं

तुम्हारे होने की झंकार से

खुशियां उग रही हैं

मुस्कराहटें रौशनी कर रही हैं

आदमी ठीक ठीक

आदमी जैसे दिख रहे हैं

तुम्हारी दुनिया में जिसकी

तलाश है तुम्हारी

यहाँ अस्तित्व में है

दो कदम चलो और आ जाओ

उम्मीद के शहर में।


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